Sochiye To Sahi
Author:
Narendra DabholkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
साने गुरुजी द्वारा ‘साधना’ पत्रिका की शुरुआत 15 अगस्त, 1948 को की गई थी। इसी पत्रिका की स्वर्ण जयंती (1 मई,1998) पर डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और जयदेव डोले को इसके संपादक पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। छह महीने बाद जयदेव डोले ने संपादक पद छोड़ दिया। इसके बाद 15 साल (20 अगस्त, 2013 तक) डॉ. दाभोलकर ने संपादक पद की जिम्मेदारी बखूबी निभाई। लगभग डेढ़ दशक के इस काल में उन्होंने दो सौ से ज्यादा संपादकीय लेख लिखे। उन्हीं लेखों में से चुनिंदा 60 लेखों का संकलन इस पुस्तक में किया गया है जो मराठी में ‘समता संगर’ नाम से छपी थी।</p>
<p>जिस समय डॉ. दाभोलकर ‘साधना’ के संपादक बने, उस समय उनकी पहचान राज्य स्तर पर ‘अंधविश्वास निर्मूलन समिति’ के आंदोलन के प्रवर्तक के रूप में थी। समूचा महाराष्ट्र उनसे परिचित था। अंधविश्वास उन्मूलन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जातिवाद आदि विषयों पर उनका यह लेखन अत्यंत प्रभावशाली रहा। इन विषयों पर लिखी उनकी किताबें भी बड़ी लोकप्रिय हुई थीं। यहाँ संकलित उनके ये संपादकीय स्पष्ट कथन, सीधे सवाल-जवाब और अपने व्यंग्य के लिए बहुत सराहे जाते हैं। लेकिन उनके अन्य लेखन की तरह इन आलेखों में भी जोर सामाजिक परिवर्तन पर ही है।
ISBN: 9788119835003
Pages: 192
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
तेलगू के ख्यात लेखक तापी धर्माराव के लेखन का आधार इतिहास व किंवदन्तियों का वैज्ञानिक अन्वेषण है। प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर उन्होंने सामाजिक यथार्थ की पुस्तकें लिखी हैं। स्थापित रूढ़ मान्यताओं के पैरवीकारों को थोड़ी आपत्ति अवश्य हो सकती है, लेकिन इन मुद्दों पर विचार करने के लेखकीय आग्रह को वे टाल नहीं सकते।
यह पुस्तक विवाह संस्कार के स्वरूप और विकास का बख़ूबी मनोविश्लेषण करती है। नर तथा नारी के सम्बन्धों के समाज पर पड़े प्रभाव के कारण बहुतेरी कुप्रथाएँ भी प्रचलित हो जाती हैं और उचित जानकारी के अभाव में यह यथावत् रहती हैं। यदि समाज के सम्मुख इन कुप्रथाओं को उजागर किया जाए तो इसके नैतिक स्वरूप में परिवर्तन सम्भव है। समस्याओं की यथावत् पहचान कर उन्हें स्पष्ट कर दिया जाए तो स्वयमेव उनके नैतिक स्वरूप में अन्तर आ जाता है। ऐसा ही सार्थक प्रयास तापी धर्माराव ने अपनी इस समाज–मनोविज्ञान की पुस्तक में किया है।
Udati Stree : Nari-Mukti Ke Arddh-Kathanak
- Author Name:
Mrinal Pande
- Book Type:

- Description: थेरीगाथा का नारीवाद ठीक वही नारीवाद नहीं है, जिसे पश्चिम की देखादेखी हमने स्वीकार कर लिया। थेरियों की रचनाओं से हम उसके लिए कुछ समर्थन पा सकते हैं, लेकिन उसे उसका प्रतिरूप नहीं कह सकते। थेरियों ने अपने समय में एक प्रतिसमय रचा था जिसे पूरी तरह स्वीकारने में स्वयं बुद्ध को भी समय लगा। उन प्रौढ़ा थेरियों ने अपने शब्दहीन लेकिन स्वानुभूत सच को साकार करने के लिए बुद्ध के धम्म की भट्टी में अपने समय की परम्पराओं, लोक मान्यताओं और दर्शन को पहले किस तरह पिघलाया, और कैसे उसे जनभाषा में ढाला, उसे समझना स्त्री-स्वातंत्र्य की एक बड़ी अवधारणा की तरफ जाना है। थेरीगाथा की रचनाओं का लक्ष्य केवल सामाजिक, नैतिक प्रतिबन्धों से ही नहीं सांसारिकता से भी मुक्ति है और केवल मुक्ति नहीं एक नई स्त्री के रूप में एक नए प्रस्थान की नींव डालना है, एक नई उड़ान भरना है। इन रचनाओं से केवल उनकी कामना को नहीं, उस समय के राज-समाज की शक्ल, स्त्रियों के भौतिक संसार और धर्म-जाति सम्बन्धी प्रतिबन्धों को भी समझना ज़रूरी है, और थेरियों के स्त्रीवाद की संभावनाओं को भी। थेरियों के प्रतिसमय से लेकर हमारे वर्तमान तक फैले स्त्री विरोध की परतें टटोलती यह किताब इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक प्रस्ताव भी है और आरम्भ भी।
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