Sapne Mein Kabeer
(0)
Author:
Premkumar maniPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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हिन्दी कथा-साहित्य को जिन चुने हुए रचनाकारों ने उसकी जड़ता और अपठनीयता से मुक्ति दिलाई, उनमें प्रेमकुमार मणि प्रमुख हैं। पिछली सदी के सातवें दशक के आख़िर से उन्होंने लिखना आरम्भ किया और आठवें दशक में कथाकार के रूप में पहचान बनाई। मणि ने कहानियों को जनसरोकारों और समकालीनता की धड़कन से नत्थी किया और सहज भाव से भाषा व मिज़ाज के नए आयाम उद्घाटित किये। उनकी कहानियों में उत्तर भारतीय जनजीवन के ऐसे अनछुए परिदृश्य उभरते हैं, जो हमें आंतरिक स्तर तक आश्वस्त और कभी-कभार उद्वेलित करते हैं। प्रचलित अर्थों में न वह गाँव के कथाकार हैं और न ही शहर के। उन पर साहित्यिक आंदोलनों का भी कोई चंदोवा कभी प्रभावी नहीं हुआ। बदलते हुए सामाजिक-राजनीतिक जीवन के अंतर राग और उसमें व्याप्त विविध किस्म के मिथ्याचार उनकी कहानियों में हम पा सकते हैं। सबसे बढ़ कर यह कि इन्हें पढ़ते हुए हम ज्ञानात्मक संवेदना से स्वत: निमज्जित और संस्कारित अनुभव करते हैं। इस संकलन में उनकी कुछ ऐसी कहानियाँ भी हैं, जिन्हें आमतौर पर लघु कथा कहने का प्रचलन है। लेखक का आग्रह उन्हें कथा मानने का है। इनका एक अलग आस्वाद और बुनावट है। बहुत हौले-से हमारी संवेदना को ये गहरे स्तर पर प्रभावित करती हैं। इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में बीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध में उभरे एक कथाकार की कहानियों का पढऩा एक अलग अनुभव दे सकता है।
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हिन्दी कथा-साहित्य को जिन चुने हुए रचनाकारों ने उसकी जड़ता और अपठनीयता से मुक्ति दिलाई, उनमें प्रेमकुमार मणि प्रमुख हैं। पिछली सदी के सातवें दशक के आख़िर से उन्होंने लिखना आरम्भ किया और आठवें दशक में कथाकार के रूप में पहचान बनाई। मणि ने कहानियों को जनसरोकारों और समकालीनता की धड़कन से नत्थी किया और सहज भाव से भाषा व मिज़ाज के नए आयाम उद्घाटित किये। उनकी कहानियों में उत्तर भारतीय जनजीवन के ऐसे अनछुए परिदृश्य उभरते हैं, जो हमें आंतरिक स्तर तक आश्वस्त और कभी-कभार उद्वेलित करते हैं। प्रचलित अर्थों में न वह गाँव के कथाकार हैं और न ही शहर के। उन पर साहित्यिक आंदोलनों का भी कोई चंदोवा कभी प्रभावी नहीं हुआ। बदलते हुए सामाजिक-राजनीतिक जीवन के अंतर राग और उसमें व्याप्त विविध किस्म के मिथ्याचार उनकी कहानियों में हम पा सकते हैं। सबसे बढ़ कर यह कि इन्हें पढ़ते हुए हम ज्ञानात्मक संवेदना से स्वत: निमज्जित और संस्कारित अनुभव करते हैं। इस संकलन में उनकी कुछ ऐसी कहानियाँ भी हैं, जिन्हें आमतौर पर लघु कथा कहने का प्रचलन है। लेखक का आग्रह उन्हें कथा मानने का है। इनका एक अलग आस्वाद और बुनावट है। बहुत हौले-से हमारी संवेदना को ये गहरे स्तर पर प्रभावित करती हैं। इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में बीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध में उभरे एक कथाकार की कहानियों का पढऩा एक अलग अनुभव दे सकता है।
Book Details
-
ISBN9788196185848
-
Pages96
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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