Punarsrijan Mein Renu
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पूर्वज कथाकारों की कालजयी कहानियों से गुजरते हुए यह प्रश्न कई बार सामने आता है कि आज यदि वे कथाकार हमारे साथ होते और अपनी उन्हीं कहानियों को फिर से लिखते तो उनका स्वरूप क्या होता? अपने पूर्ववर्ती कथाकारों की उन खास कहानियों को बार-बार पढ़ते हुये बाद के किसी कथाकार के भीतर यह भाव आना भी अस्वाभाविक नहीं कि ‘यदि इन कहानियों को मैं लिखता तो कैसे लिखता’? अमर कथाशिल्पी फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की छ: प्रतिनिधि कहानियों की पुनर्रचना और उनके विश्लेषण के बहाने यह पुस्तक स्वप्न, चुनौती और जोखिम से भरे ऐसे ही प्रश्नों के उत्तरों की तलाश करता है। पुनर्सृजित कहानियों का ऐसा संग्रह विश्व साहित्य के इतिहास में पहली बार प्रकाशित हो रहा है।
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पूर्वज कथाकारों की कालजयी कहानियों से गुजरते हुए यह प्रश्न कई बार सामने आता है कि आज यदि वे कथाकार हमारे साथ होते और अपनी उन्हीं कहानियों को फिर से लिखते तो उनका स्वरूप क्या होता? अपने पूर्ववर्ती कथाकारों की उन खास कहानियों को बार-बार पढ़ते हुये बाद के किसी कथाकार के भीतर यह भाव आना भी अस्वाभाविक नहीं कि ‘यदि इन कहानियों को मैं लिखता तो कैसे लिखता’? अमर कथाशिल्पी फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की छ: प्रतिनिधि कहानियों की पुनर्रचना और उनके विश्लेषण के बहाने यह पुस्तक स्वप्न, चुनौती और जोखिम से भरे ऐसे ही प्रश्नों के उत्तरों की तलाश करता है। पुनर्सृजित कहानियों का ऐसा संग्रह विश्व साहित्य के इतिहास में पहली बार प्रकाशित हो रहा है।
Book Details
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ISBN9789392581533
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Pages208
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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संग्रह की अधिकांश कहानियाँ स्वतंत्रता के बाद के पतनशील सामन्त वर्ग की क्रमिक मृत्यु का प्राय: अनुक्षण साक्षी बनकर उसे अंकित करती गई हैं किन्तु यह ‘सामन्त वर्ग’ रूढ़ अर्थ में एक परिभाषित सामन्तवर्ग ही नहीं है : वह नवधनाढ्य सपनों का सामन्त वर्ग भी है और अपनी विरूपता में भी अपने को सहेजने में सचेष्ट, कभी हास्यास्पद परिणतियों में बिखरता हुआ और कभी त्रासदीय विडम्बनाओं में विलीन होता हुआ वर्ग विशेष भी।
इन कहानियों में सामान्यीकृत तथा सरलीकृत स्थितियों तथा निष्कर्षों से भरसक बचा गया है, क्योंकि इधर की हिन्दी की अधिसंख्य कहानियाँ उसी का शिकार होती गई हैं। इसलिए यह? एक वर्ग ऐसा भी है जो उपनिवेशी अवशेषों को ढोता हुआ, अपनी सलवटों को सहेजता हुआ ‘डॉनस्कघेंटिक’ लीलाओं में लिप्त है। वह दूसरों की पू्रनिंग करता हुआ इस तथ्य से अनभिज्ञ रहता है कि वह इस क्रम में निरन्तर अपनी ही पू्रनिंग करता हुआ अस्तित्वहीन हुआ जा रहा है। इन कहानियों में मृत्यु एक केन्द्रीय विषय है, लेकिन हमेशा वह अभिधा में नहीं है, कभी वह रूपक, कभी प्रतीक और कभी केवल एक बुनियादी तथा अन्तिम सत्य का अहसास-भर है। ये कहानियाँ आधुनिकता से ग्रस्त नहीं हैं, न शीत-युद्धकालीन ‘रेटारिक’ आक्रमण-प्रत्याक्रमण से। ये महज़ आज के मानवीय परिदृश्य की रचनात्मक अंकितियाँ हैं।
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- Description: मन के भीतर न जाने कितनी परतें होती हैं, जिन्हें स्त्री कभी छीलकर अलग कर देती है तो कभी फिर से कई और परतों में ढककर छिपा देती है। लेकिन इस दौरान वह पीड़ा के सागर में लगातार गोते लगाती रहती है। इसके बावजूद वह हर बार किनारे पर आ खड़ी होती है। स्त्री का संघर्ष ही तो है जो उसे टूटने से बचाता है। परिस्थितियाँ कई बार अवरोध बनकर उसके सामने आ खड़ी होती हैं, तब बेशक पहाड़ों-सी दृढ़ता उसमें न आ पाए, गगनचुंबी चोटियों की तरह वह सतर्क रहती है, हर बाधा को पार करने के लिए। वह हारती नहीं है, वह बस निरंतर एक नदी की तरह प्रवाहमान होती रहती है। यह स्त्री पुरुष विरोधी नहीं है, पर अपने हक़ के लिए लड़ना जानती है। स्त्री से हर रिश्ते में एक अहम भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है क्योंकि पुरुष जानता है कि वही ऐसा कर सकती है और सच में, वह ऐसा करने में सफल होती भी रही है। स्त्री जीवन के विविध पहलुओं पर केंद्रित इन कहानियों में अगर कोई उलझन है तो उसका समाधान भी है। कुछ अछूते विषयों को उजागर और स्त्री की सोच को निरूपित करती हैं इस संग्रह की कहानियाँ।
Chhote Shahar Ki Ladki
- Author Name:
Kalpana Verma
- Book Type:

- Description: "छोटे शहर की लड़की कहानी-संग्रह में स्त्री को उसके 'सम्पूर्णता' के आइने में देखा गया है। पुरुष मानसिकता के बीच से स्त्री के अस्तित्व की तलाश की गयी है। प्रकृति ने जिस नर और नारी की संरचना की थी वह एक-दूसरे के पूरक के रूप में हैं। नैसर्गिक नियमों की वास्तविकता को आज नये परिवेश में तमाम सच्चाइयों से रूबरू होना पड़ रहा है। स्त्री-विमर्श के प्लेटफार्म पर स्त्री नये अन्दाज में दिख रही है। यह उसका पुरुष हो जाना कतई नहीं है। वह एक कोमल संरचना ही रहेगी। नजर और नज़रिया तभी मायने रखता है जब पारखी सामने हो। पारखी पाठकों के समक्ष यह पुस्तक है।
Lawaris Nahi, Meri Maan Hai !
- Author Name:
Anil Kumar Pathak
- Book Type:

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Description:
‘लावारिस नहीं, मेरी माँ हैं' यद्यपि लेखक का प्रथम कहानी-संग्रह है किन्तु कथ्य की इस विधा में लेखक लम्बे समय से सक्रिय हैं। इनकी कहानियाँ कई दशक पूर्व से आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारित हो रही हैं। इन कहानियों में एक ओर जहाँ सहजता एवं सरसता है वहीं दूसरी ओर इनकी किस्सागोई पाठकों को आद्योपान्त बाँधकर रखने में भी सक्षम है।
प्रस्तुत संग्रह में कुल 11 कहानियाँ हैं। संग्रह की सभी कहानियों के कथानक नारी के विभिन्न स्वरूपों–माँ, मौसी, काकी, बुआ, सौतेली माँ आदि–के इर्द-गिर्द घूमते हैं जिनमें स्त्री के मूलभूत गुणों, यथा–प्रेम, दया, करुणा, सबको अपनाने की प्रवृत्ति एवं संघर्ष के बावजूद विपरीत परिस्थितियों में भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अनवरत तत्पर रहना इत्यादि–का मर्मस्पर्शी चित्रण है। जहाँ ये कहानियाँ काव्य के विभिन्न गुणों को अपने अन्दर समाहित करते हुए विशेषतया नारी के दृष्टिगत समाज में व्याप्त प्रतिकूल परिस्थितियों को उजागर करती हैं, वहीं सुखद वातावरण का सृजन करते हुए आशा की उजली किरणों की ओर भी ले जाती हैं।
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