Pratinidhi Kahaniyan : Muktibodh
(0)
Author:
Rohini Agrawal, Gajanan Madhav MuktibodhPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
199
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मुक्तिबोध यानी वैचारिकता, दार्शनिकता और रोमानी आदर्शवाद के साथ जीवन के जटिल, गूढ़, गहन, संश्लिष्ट रहस्यों की बेतरह उलझी महीन परतों की सतत जाँच करती हठपूर्ण, अपराजेय, संकल्प-दृढ़ता। नून-तेल-लकड़ी की दुश्चिन्ताओं में घिरकर अपनी उदात्त मनुष्यता से गिरते व्यक्ति की पीड़ा और बेबसी, सीमा और संकीर्णता को मुक्तिबोध ने पोर-पोर में महसूसा है। लेकिन अपराजेय जिजीविषा और जीवन का उच्छल-उद्दाम प्रवाह क्या ‘मनुष्य’ को तिनके की तरह बहा ले जानेवाली हर ताक़त का विरोध नहीं करता? जिजीविषा प्रतिरोध, संघर्ष, दृढ़ता, आस्था और सृजनशीलता बनकर क्या मनुष्य को अपने भीतर के विराटत्व से परिचित नहीं कराती? मुक्तिबोध की कहानियाँ अखंड उदात्त आस्था के साथ आम आदमी को उसके भीतर छिपे इस स्रष्टा महामानव तक ले जाती हैं। अजीब अन्तर्विरोध है कि मुक्तिबोध की कहानियाँ एक साथ विचार कहानियाँ हैं और आत्मकथात्मक भी। मुक्तिबोध की कहानियाँ प्रश्न उठाती हैं—नुकीले और चुभते सवाल कि ‘ठाठ से रहने के चक्कर से बँधे हुए बुराई के चक्कर’ तोड़ने के लिए अपने-अपने स्तर पर कितना प्रयत्नशील है व्यक्ति? मुक्तिबोध की जिजीविषा-जड़ी कहानियाँ आत्माभिमान को बनाए रखनेवाले आत्मविश्वास और आत्मबल को जिलाए रखने का सन्देश देती हैं—भीतर के ‘मनुष्य’ से साक्षात्कार करने के अनिर्वचनीय सुख से सराबोर करने के उपरान्त।
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मुक्तिबोध यानी वैचारिकता, दार्शनिकता और रोमानी आदर्शवाद के साथ जीवन के जटिल, गूढ़, गहन, संश्लिष्ट रहस्यों की बेतरह उलझी महीन परतों की सतत जाँच करती हठपूर्ण, अपराजेय, संकल्प-दृढ़ता।
नून-तेल-लकड़ी की दुश्चिन्ताओं में घिरकर अपनी उदात्त मनुष्यता से गिरते व्यक्ति की पीड़ा और बेबसी, सीमा और संकीर्णता को मुक्तिबोध ने पोर-पोर में महसूसा है। लेकिन अपराजेय जिजीविषा और जीवन का उच्छल-उद्दाम प्रवाह क्या ‘मनुष्य’ को तिनके की तरह बहा ले जानेवाली हर ताक़त का विरोध नहीं करता? जिजीविषा प्रतिरोध, संघर्ष, दृढ़ता, आस्था और सृजनशीलता बनकर क्या मनुष्य को अपने भीतर के विराटत्व से परिचित नहीं कराती? मुक्तिबोध की कहानियाँ अखंड उदात्त आस्था के साथ आम आदमी को उसके भीतर छिपे इस स्रष्टा महामानव तक ले जाती हैं।
अजीब अन्तर्विरोध है कि मुक्तिबोध की कहानियाँ एक साथ विचार कहानियाँ हैं और आत्मकथात्मक भी। मुक्तिबोध की कहानियाँ प्रश्न उठाती हैं—नुकीले और चुभते सवाल कि ‘ठाठ से रहने के चक्कर से बँधे हुए बुराई के चक्कर’ तोड़ने के लिए अपने-अपने स्तर पर कितना प्रयत्नशील है व्यक्ति?
मुक्तिबोध की जिजीविषा-जड़ी कहानियाँ आत्माभिमान को बनाए रखनेवाले आत्मविश्वास और आत्मबल को जिलाए रखने का सन्देश देती हैं—भीतर के ‘मनुष्य’ से साक्षात्कार करने के अनिर्वचनीय सुख से सराबोर करने के उपरान्त।
Book Details
-
ISBN9788126724147
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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स्त्री-लेखन स्त्री की आकांक्षाओं का दर्पण है। यह स्त्री की मानवीय इयत्ता को पाने और जीने का स्वप्न है; मुक्ति की राहों के अन्वेषण का संघर्ष है; और उन राहों पर अविराम चलने की संकल्पदृढ़ता भी। स्त्री-लेखन स्त्री मानस के तलघर को बिना किसी छेड़छाड़ के सामने रखता है जहाँ व्यवस्था के विरोध में उफनते हुंकारों के साथ व्यवस्था में परित्राण पाने की बेचारगियाँ भी हैं और भेड़ की तरह जिबह होने की यंत्रणा के साथ भेड़िया बनकर दूसरों को लील जाने की कुटिलताएँ भी। इसे मानवीय दुर्बलताओं की नैसर्गिक अभिव्यक्ति कहिए या अन्तर्विरोधों का स्वीकार—स्त्री-लेखन पारम्परिक ‘माइंड सेट’ से लड़ने की कोशिश में परम्परा और ‘माइंड सेट’ दोनों की ताक़त को एक ठोस सामाजिक-मानसिक सच्चाई और चुनौती के रूप में सतह पर लाता है। लेकिन क्या वास्तव में स्त्री-लेखन इतनी निःसंग विश्लेषणपरकता के साथ अपने स्व को और समाज के शास्त्र को जाँच सका है?
यह पुस्तक स्त्री के नज़रिए से स्त्री-लेखन का पाठ है; उसकी क्षमताओं, सीमाओं और अन्तर्विरोधों का आकलन करते हुए युग की नब्ज़ को टटोलने का जतन भी। यह पुस्तक उन दरारों-दरकनों में झाँकने का प्रयास भी है जहाँ स्त्री को ‘स्त्री’ बनाए रखने की ‘प्रगतिशील साज़िशों’ में स्त्री-मुक्ति के एजेंडे को गुमराह करने और स्त्री-विमर्श को देह-विमर्श में रिड्यूस करने की कोशिशें निहित हैं। दुर्भाग्यवश हिन्दी आलोचना ‘आरोप’ लगाकर स्त्री-लेखन के महत्त्व को ख़ारिज करती आई है या उसे घर-सम्बन्धों के संकुचित दायरे से बाहर निकलकर बृहत्तर मुद्दों से जुड़ने की ‘सीख’ देती रही है। प्रकारान्तर से दोनों ही स्थितियाँ स्त्री-लेखन के बुनियादी सरोकारों से मुँह चुराने की कोशिशें हैं। यह पुस्तक पहली बार इस तथ्य को रेखांकित करती है कि स्त्री-विमर्श का लक्ष्य पाठक में अब तक के ‘अनदेखे’ को देखने और गुनने की संवेदनशीलता विकसित करना है ताकि लैंगिक विभाजन से मुक्त मनुष्य और समाज की रचना के स्वप्न को साकार किया जा सके।
Chhattisgarh Mein Muktibodh
- Author Name:
Gajanan Madhav Muktibodh +1
- Book Type:

- Description:
छत्तीसगढ़ मुक्तिबोध की परिपक्व सर्जनात्मकता का अन्तरंग है। सिर्फ़ इस अर्थ में नहीं कि यहाँ आकर उन्हें रचने और जीने की अपेक्षाकृत शान्त अवकाश मिला, बल्कि इस गहरे अर्थ में कि यहाँ आकर उन्हें आत्मसंघर्ष की वह दिशा मिली, जिस पर चलकर वे अपनी रचना में उन लोगों के संघर्ष का भी सृजनात्मक आत्मसातीकरण सम्भव कर सके, जिनका जीवन सहज-सरल अर्थ में संघर्ष का ही जीवन था। उनके संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना की रचना के लिए यहाँ का परिवेश, यहाँ के लोग, यहाँ के तालाब, यहाँ के वृक्ष, यहाँ का समूचा साँवला समय उन्हें अँधेरे की आत्मीय आवाज़ में पुकारते थे, और बहुवाचकता से भरे इन स्वरों और पुकारों को, वे अपने सृजन क्षणों में इस तरह सुनते थे, जैसे वे उनकी अपनी धड़कनों में बसी आवाज़ें हैं, जैसे वे अँधेरे में कहीं हमेशा के लिए खो गई अनजानी ज्योति को जगाने के लिए ही उनके क़रीब आ रही हैं। बिम्बात्मकता के स्तर पर राजनांदगाँव के परिवेश के अनेक दृश्यों को उनकी कविता की बहुविध भावनाओं, विचारों की विविधरंगी भाषा में सहज ही पढ़ा जा सकता है, लेकिन इसके भीतर हर कहीं आत्मीयता और प्रेम की जो अन्त:सलिला है, उसमें मानो यहाँ की वह पूरी बिरादरी ही समाई हुई है, जिसके साथ उन्होंने रात-रात भर बातें की थीं। इसी गहरे प्रेम के अर्थ में ही उन्होंने इस भयावह संसार की मानवीय और मानवेतर उपस्थितियों के साथ एक अटूट रिश्ता बनाया था। इसी रिश्ते ने उन्हें अपने आत्मसंघर्ष की एक सर्वथा नई पहचान का वह रास्ता सुझाया था, जिस पर अनथक चलते हुए वे अनुभव कर पाए थे, कि नहीं होती, कहीं भी कविता ख़तम नहीं होती।
Sanskritik Rashtravad : Hashiye Ka Samaj Aur Hindi Upanyas
- Author Name:
Rohini Aggarwal +1
- Book Type:

- Description:
‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : हाशिए का समाज और हिन्दी उपन्यास’ वरिष्ठ आलोचक रोहिणी अग्रवाल की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है जहाँ इतिहास-चेतना, राजनीतिक-दृष्टि और सामाजिक प्रतिबद्धता को आलोचनात्मक विश्लेषण की अनिवार्य दृष्टि बनाकर सत्ता-संरचना की जटिलताओं से वैचारिक मुठभेड़ की गई है। इस प्रक्रिया में वे जिस वैचारिक सजगता के साथ मुख्यधारा बनाम हाशिया, वर्चस्व बनाम प्रतिरोध, दमन बनाम संघर्ष की अपरिहार्य द्वन्द्वात्मक टकराहट की बारीकियों को पकड़ती हैं, उतनी ही प्रखरता के साथ विचार एवं अस्तित्व की गतिशील निर्मितियों को समय की सांस्कृतिक विकास-यात्रा के प्रमुख पड़ावों की तरह परखती हैं। यही कारण है कि उनकी आलोचना-दृष्टि का वितान सभ्यता-समीक्षा के गहन नैतिक दायित्व का दृष्टान्त बन जाता है। हिन्दी व हिन्दीतर उपन्यासों के विखंडनपरक विश्लेषण के क्रम में यह पुस्तक किसानों, आदिवासियों, स्त्रियों, थर्ड जेंडर और झोंपड़पट्टी समाज के संघर्ष की विडम्बनात्मक ध्वनियों के समानान्तर सत्ता-संरचना के विविध उपकेन्द्रों की कूटनीतिक रणनीतियों को ही उजागर नहीं करती, साहित्य को सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का सक्रिय और जवाबदेह उपकरण भी बनाती है। इसलिए यहाँ उपन्यास कंटेंट के मालगोदाम की तरह नहीं, बल्कि एक समग्र वैचारिक कलाकृति की तरह विश्लेषित किये गए हैं। ‘पाठ’ के रूप में उभरते विश्लेषण को अर्थ-निर्माण की रचनात्मक प्रविधि का रूप देना, भाषा में बहुव्यंजक अर्थध्वनियों को भरना, और संवाद की सहभागिता में पाठक की सक्रियता को शामिल करना इसकी सबसे बड़ी ताकत है। ज़ाहिर है कि इस पुस्तक को पढ़ना हमारे समय की प्रश्नाकुल बेचैनियों को आलोचनात्मक विवेक के साथ जाँचना है।
Sanskritik Rashtravad : Hashiye Ka Samaj Aur Hindi Upanyas
Rohini Aggarwal
20% off₹ 499
₹ 399.2
Available
Hindi Upanyas Ka Stree-Path
- Author Name:
Rohini Agrawal
- Book Type:

- Description:
कहा जाता है कि आज की ज़मीन पर खड़े होकर पुरानी कृतियों का पाठ नहीं किया जाना चाहिए, ख़ासकर स्त्री एवं दलित दृष्टि से क्योंकि उस समय समाज स्त्री एवं दलित प्रश्नों को लेकर न इतना संवेदनशील था, न सजग। यह भी तर्क दिया जाता है कि लेखक अपने युग की वैचारिक हदबन्दियों के बीच रहकर ही अभिव्यक्ति की राह चुनता है। मुझे इस मान्यता पर आपत्ति है। एक, यदि युगीन वैचारिक हदबन्दियाँ ही रचना की घेरेबन्दी करती हैं, तब वह कालजयी कृति कैसे हुई? दूसरे, यदि साहित्यकार रचयिता/स्रष्टा है तो उसे अपनी गहन अन्तर्दृष्टि, उन्नत भावबोध और प्रखर कल्पना द्वारा वह सब साक्षात् करना है जो उसके अन्य समकालीनों की कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से बाहर छूट रहा है। सृजन के समय अन्तर्दृष्टि के पंखों पर सवार लेखक जब कल्पनाशीलता के आकाश में विचरण करता है तो सोलहों आने लेखक होता है। मुक्ति की आकांक्षा से दिपदिपाती उसकी चेतना जड़ता और पराधीनता, बन्धन और व्यवस्थागत दबावों का निषेध कर व्यक्ति को ‘मनुष्य’ रूप में देखने लगती है।
मनुष्य को केन्द्र में रखनेवाला, मनुष्य-संसार की गति, ऊर्जा और सपनों से स्पन्दित होनेवाला साहित्य निर्वैयक्तिक हो ही नहीं सकता। एक ठोस सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान मनुष्य और समाज की तरह साहित्य और साहित्यकार की भी है। लाख छुपाने की कोशिश करे इंसान, बड़े-बड़े दावों और डींगों के बीच अपनी क्षुद्रताओं और शातिरबाज़ियों को रंचमात्र भी नहीं छुपा पाता। लेखक भी इसका अपवाद नहीं।
पात्रों-स्थितियों-घटनाओं के ज़रिए बेशक वह नए वक़्त की आहटें लेने में सजग भाव से सन्नद्ध रहे, लेकिन इन्हें पाटती दरारों के बीच वह अभिव्यक्त हो ही जाता है। प्रेमचन्द से बहुत पहले पहली स्त्री शिक्षिका सावित्रीबाई फुले पर सड़े अंडे-टमाटर फेंककर स्त्रीद्वेषी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता रहा है पुरुष-समाज।
यह पुस्तक प्रतिष्ठित रचनाकारों के दायित्वपूर्ण योगदान को धुँधलाने की धृष्टता नहीं, आलोचना के पुंसवादी स्वर के बरअक्स स्त्री-स्वर को धार देने की कोशिश है। यों भी साहित्य शब्दों-पंक्तियों-पन्नों-जिल्द में बँधी हदबन्दियों का मोहताज नहीं कि लाइब्रेरियों में पड़ा सड़ता रहे। जब वह एक नई समाज-संस्कृति, विचार या चरित्र बनकर लौकिक जगत के बीचोबीच आ बैठता है, तब उसे नई चुनौतियों और नए बदलावों के बीच निरन्तर अपने को प्रमाणित भी करते रहना पड़ता है।
Prem Ke Pahle Basant Me
- Author Name:
Rashmi Bhardwaj
- Book Type:


- Description:
ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।
Achchhe Aadmee
- Author Name:
Phanishwarnath Renu +1
- Book Type:

- Description:
रेणु ने अपने आत्म-कथ्य में चित्रगुप्त महाराज द्वारा निर्मित भाग्य-लेख के अंशों में अपना परिचय देते हुए कहा है कि यह आदमी ‘एक ही साथ सुर और असुर, सुन्दर और असुन्दर, पापी और विवेकी, दुरात्मा और सन्त, आदमी और साँप, जड़ और चेतन—सब कुछ होगा।’ क्या यही परिचय अपने विविध और विस्तृत रूप में उनकी समस्त रचनाओं में नहीं लहरा रहा है? जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि को गतिशील और व्यापक फ़लक प्रदान करनेवाली रेणु की कहानियों ने हिन्दी कथा-साहित्य को एक नई दिशा दी है—सामाजिक परिवर्तन ही एकमात्र विकल्प है। यह दिशा ही रेणु की रचनाओं की मूल सोच है। बड़े चुपके से कभी उनकी कहानियाँ किसानों और खेत मज़दूरों के कान में कह देती हैं कि ज़मींदारी प्रथा अब नहीं रह सकती और ज़मीन जोतनेवाले की ही होनी चाहिए। कभी मज़दूरों को यह सन्देश देने लगती हैं कि तुम्हारी मुक्ति में ही असली सुराज का अर्थ छिपा है—भूल-भुलैया में पड़ने की जरूरत नहीं। क्या कला, क्या भाषा, क्या अन्तर्वस्तु और विचारधारा, कोई भी कसौटी क्यों न हो, रेणु की कहानियाँ एकदम खरी उतरती हैं, लोगों का रुझान बदल देती हैं और यही रचनात्मक गतिविधि रेणु के साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान को अक्षुण्ण बनाती है। ‘अच्छे आदमी’ में संग्रहीत विधित रंगों की ये कहानियाँ रेणु की इसी विशिष्ट रचना-यात्रा का अगला पड़ाव हैं।
Gyandan
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

- Description:
यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है। ‘ज्ञानदान’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘ज्ञानदानֺ’, ‘एक राज़’, ‘गण्डेरी’, ‘कुछ समझ न सका’, ‘दु:ख का अधिकार’, ‘पराया सुख’, ‘80/100’, या ‘सांई सच्चे!’, ‘ज़बरदस्ती’, ‘हलाल का टुकड़ा’, ‘मनुष्य’, ‘बदनाम’ और ‘अपनी चीज़’।
Sandigdh
- Author Name:
Tejendra Sharma
- Book Type:


- Description:
पंद्रह बेहतरीन कहानियों का संग्रह।
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