Kanniya Dan
(0)
Author:
Mehr Alam KhanPublisher:
Rekhta FoundationLanguage:
UrduCategory:
Short-story-collections₹
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Ismat Chughtai’s new short story collection, “Kanyadaan: Ismat Chughtai”, published by Rekhta Publications, comprises a selection of her well-known stories along with new and previously unpublished short storys. The collection includes notable stories such as “Jaal”, “Chhui-Mui”, “Do Haath”, “Lihaaf”, “Kanyadaan”, “Zehr Ka Pyala”, “Ghoonghat”, “Charpai”, “Kaamchor”, “Kaisi Biwi Kaisa Shohar”, and “Chhoti Aapa”. These stories vividly depict women’s emotions, the suffocation of social constraints, and their defiance against them, making this collection highly worth reading. Famed for her novel “Tedhi Lakeer” and short story “Lihaaf”, Ismat Chughtai was one of urduliterature’s most prominent fiction writers, novelists, and playwrights. She was born on August 21, 1915, in Badayun (Uttar Pradesh). Chughtai portrayed women’s lives, emotions, and the restrictions of society with bold realism. Associated with the Progressive Writers’ Movement, her writings gave a new identity and voice to women in urduliterature. She passed away on October 24, 1991.
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Ismat Chughtai’s new short story collection, “Kanyadaan: Ismat Chughtai”, published by Rekhta Publications, comprises a selection of her well-known stories along with new and previously unpublished short storys. The collection includes notable stories such as “Jaal”, “Chhui-Mui”, “Do Haath”, “Lihaaf”, “Kanyadaan”, “Zehr Ka Pyala”, “Ghoonghat”, “Charpai”, “Kaamchor”, “Kaisi Biwi Kaisa Shohar”, and “Chhoti Aapa”. These stories vividly depict women’s emotions, the suffocation of social constraints, and their defiance against them, making this collection highly worth reading. Famed for her novel “Tedhi Lakeer” and short story “Lihaaf”, Ismat Chughtai was one of urduliterature’s most prominent fiction writers, novelists, and playwrights. She was born on August 21, 1915, in Badayun (Uttar Pradesh). Chughtai portrayed women’s lives, emotions, and the restrictions of society with bold realism. Associated with the Progressive Writers’ Movement, her writings gave a new identity and voice to women in urduliterature. She passed away on October 24, 1991.
Book Details
-
ISBN9788199502154
-
Pages307
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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"नजरा गईली गुईंयां" एक मौन प्रतिरोध की कहानी है। एक स्त्री जो अपना प्रतिरोध मौन रहकर जताती है, लेकिन वो अपना प्रतिरोध स्थानांतरित कर देती है। अपनी बेटी में जो पितृसत्ता पर वार कर देती है। कहानी में वही बेटी अपनी माँ से सवाल करती है कि माँ क्या तुम्हारा सपना भी मेरी शादी है तो वो जवाब देती हैं। "भक्क... हम ऐसा सपना देखते तो तुम आज वहाँ से हमसे मज़ाक कर रही होती का... दो तीन बच्चा-खच्चा लेकर किचकिचा रही होती... हम वैसी माँ नहीं, हम तो तुमको पैर पर खड़ा होते देखने का सपना देखते रहे, खुदमुख्तार बनने का सपना... मेरी तरह नहीं बनाना चाहती थी कि दिन भर टेटियाती रहो- "ऐ जी... सुनते हैं, हमको सौ रुपया दीजिए... हमको चूड़ी खरीदना है..." इसके साथ ही जो गीताश्री जी की कहानियों की ख़ासियत है कि वे उनकी हर कहानी के माध्यम से संस्कृति से परिचय कराती हैं। रुदाली तो जानते थे, एक विलुप्त परंपरा हंकपड़वा से उन्होंने परिचय कराया। 'ट्राम नंबर 5 और बोहेमियन धुन' को पढ़ते हुए याद आते हैं निर्मल वर्मा। कहानी प्रेम की उदास कहानी है। प्रेम के होते हुए जो उदासी होती है, यह कहानी उसी उदासी को रचती है। यह हिज्र वाली उदासी नहीं है, यह तो प्रेम के होने की उदासी है। इस कहानी की भाषा सप्तक की सारी कहानियों से एकदम अलग है। कहानी अपने पीछे एक गहरा सन्नाटा छोड़ जाती है। मैगनोलिया का फूल हमारी स्मृति बसा रह जाता है। उनकी सभी कहानियाँ पाठक को बांध देती हैं। जिनके ख़त्म होने तक उनके पाश से मुक्त होना संभव नहीं होता। कथा सप्तक में सभी कहानियाँ इसी तरह की हैं। -आकाश माथुर
Mansarovar Vol. 8 : Uddhar Aur Anya Kahaniyan
- Author Name:
Premchand
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प्रेमचन्द मनुष्य और मानवीय स्थितियों में दिलचस्पी रखते थे।... प्रेमचन्द के लिए मनुष्य की स्थिति ही समाज की स्थिति थी। उनकी कहानियों में मनुष्य को स्वयं में सम्पूर्ण इकाई के रूप में शायद ही कहीं प्रस्तुत किया गया हो। मनुष्य के अन्तर्मन की उथल-पुथल और दुविधाएँ हमेशा समाज और
आस-पास के माहौल से जुड़ी
होती हैं। यहाँ तक कि पारिवारिक सम्बन्धों को भी सामाजिक तर्कों से प्रभावित होता दिखाया गया है। उनका गहरा सामाजिक निरीक्षण उनकी कहानियों में झलकता है जिनमें उन्होंने हर 'प्रकार' के इनसानों को और लगभग हर व्यवसाय को शामिल किया है।
—विश्वनाथ एस. नरवणे
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