Atar
(0)
Author:
PratyakshaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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प्रत्यक्षा की कहानियाँ अपने पूरे रचाव में जाड़े की गुनगुनी धूप-सी मालूम पड़ती हैं—जो जलन या चुभन पैदा नहीं करतीं, मगर त्वचा को ऊष्मा से भरती जाती हैं, इतने करीने से कि आप खुले से उठकर छाँव में जाना ही नहीं चाहते। उनकी गरमाई आपको देर तक, दूर तक महसूस होती है।</p> <p>पात्रों की पृष्ठभूमि चाहे जो हो, परिवेश चाहे जैसा हो, वे अपनी हरेक कहानी में, धागा-दर-धागा इस कौशल से जोड़ती हैं कि अपनी परिणति तक पहुँचते-पहुँचते वह ऐसी कसीदाकारी बन जाती है, जिसके तमाम बेल-बूटे सजीव हो उठते हैं।</p> <p>इन कहानियों में एक ख़ास तरह का धीमापन है, इसकी वजह ये है कि वे दृश्य के दायरे में आनेवाली छोटी-से-छोटी चीज़ को भी अनदेखा नहीं छोड़ देतीं। इसी तरह पात्रों के व्यवहार-व्यापार और मन:स्थितियों को भी शब्दों के जरिये प्रत्यक्ष करती चलती हैं। दृश्य और अदृश्य को सम्पूर्णता में उकेरने का यह धीरज जैसा प्रत्यक्षा के पास है, वैसा अन्यत्र कम ही मिलता है।
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प्रत्यक्षा की कहानियाँ अपने पूरे रचाव में जाड़े की गुनगुनी धूप-सी मालूम पड़ती हैं—जो जलन या चुभन पैदा नहीं करतीं, मगर त्वचा को ऊष्मा से भरती जाती हैं, इतने करीने से कि आप खुले से उठकर छाँव में जाना ही नहीं चाहते। उनकी गरमाई आपको देर तक, दूर तक महसूस होती है।</p>
<p>पात्रों की पृष्ठभूमि चाहे जो हो, परिवेश चाहे जैसा हो, वे अपनी हरेक कहानी में, धागा-दर-धागा इस कौशल से जोड़ती हैं कि अपनी परिणति तक पहुँचते-पहुँचते वह ऐसी कसीदाकारी बन जाती है, जिसके तमाम बेल-बूटे सजीव हो उठते हैं।</p>
<p>इन कहानियों में एक ख़ास तरह का धीमापन है, इसकी वजह ये है कि वे दृश्य के दायरे में आनेवाली छोटी-से-छोटी चीज़ को भी अनदेखा नहीं छोड़ देतीं। इसी तरह पात्रों के व्यवहार-व्यापार और मन:स्थितियों को भी शब्दों के जरिये प्रत्यक्ष करती चलती हैं। दृश्य और अदृश्य को सम्पूर्णता में उकेरने का यह धीरज जैसा प्रत्यक्षा के पास है, वैसा अन्यत्र कम ही मिलता है।
Book Details
-
ISBN9789360864828
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
समकालीन रचना जगत् में अपने मौलिक और प्रखर लेखन से हिन्दी साहित्य की शीर्ष पंक्ति में अपनी जगह बनाती, स्थापित और सम्भावनाशील महिला कथाकारों की रचनाओं का यह संकलन नई सदी की पहचान है। श्रेष्ठ महिला कथाकार लेखन आज का उत्कृष्ट मानचित्र है जिसमें कहानियों के सोपान खुलकर सामने आते हैं।
इस संकलन में रचनाकारों द्वारा यथार्थपरक, समाजोन्मुखी लेखन की नींव रखी गई है। साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेताओं की कहानियाँ इसमें सम्मिलित हैं। पाठकों और छात्रों की सुविधा के लिए कहानीकारों का परिचय तथा कहानी के समग्र स्वरूप पर विस्तृत भूमिका प्रस्तुत संकलन में दिया गया है।
Dharmayudh
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

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Description:
यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।
‘धर्मयुद्ध’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘धर्मयुद्ध’, ‘मनु की लगाम’, ‘विश्वास की बात’, ‘जनगणमन अधिनायक जय हे...’, ‘खतडुआ’, ‘मतिराम की बहादुरी’, ‘420’, ‘आत्मिक प्रेम’, ‘मंगला और डॉक्टर’।
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