Gandh Gatha
Author:
Mrinal PandePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Available
‘गंध गाथा’ समकालीन हिन्दी साहित्य के अग्रणी कथाकारों में एक मृणाल पाण्डे का नया संग्रह है जिसमें शामिल कहानियाँ देखन और कहन दोनों स्तरों पर न सिर्फ़ हमारे सोच को प्रभावित करती हैं बल्कि मर्म को भी गहरे छूती हैं। ‘गंध गाथा’ की कहानियाँ अपने समय के चाक पर रची गई ऐसी कहानियाँ हैं जिनकी जड़ें बौद्ध और जैन जातक कथाओं के सोतों से भी अपनी नमी हासिल करती हैं, और स्त्री-प्रश्न हो या समाज-सत्ता के अन्य मसले, एक बड़े कैनवस पर एक नए आस्वाद को रचते हैं। </p>
<p>मृणाल जी के इस संग्रह को पाठक उनके शब्दों में इस तरह भी देख सकते हैं—‘‘हर कथा मेरे लिए कहीं न कहीं टुकड़ा-टुकड़ा मिले जीवन-ज्ञान के बीच सचाई की घनचक्करी तलाश है।...केदारघाटी का हादसा, पार्टीशन की विभीषिका, मनुष्य और पशु के बीच का शब्दहीन प्रेम और बतकही, इनकी बाबत मोटामोटी हम सब जानते हैं। पर इस संकलन की कथाओं में जहाँ, जिस तरह और जिस लिए कुदरत और व्यक्तित्वों के पास-पास सरकने से जो कई तरह के ब्रह्मांड टूटते, मिलते और दूर होते दिखते थे, उनका पीछा मेरे लिए अधिक महत्त्व रखता रहा है। इनमें कई बार जीवन के गहरे लेकिन अनुत्तरित प्रश्नों के छोर पर, जवाब की जो-जो सम्भावनाएँ झिलमिल करती मुझे दिखी हैं, उनका चित्रण सरलीकृत रिपोर्टिंग के परे कहीं अधिक महत्त्व का है।’’</p>
<p>हम कह सकते हैं कि ‘गंध गाथा’ एक ऐसा संग्रह है जिसमें रचित लोक अपनी चिन्ताओं से अवगत तो कराता ही है, अपने चिन्तन से समृद्ध भी करता है।
ISBN: 9788183619387
Pages: 136
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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पंकज मित्र हिन्दी के सर्वप्रिय कथाकारों में हैं जिन्हें हमेशा ही पढ़ा जाता है। ग्रामीण और क़स्बाई समाज की गहरी पड़ताल और सघन संवेदना तथा थोड़े व्यंग्य के साथ समाज के ठेठ देसी यथार्थ की अक्काशी करनेवाले कथाकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया है।
इस संग्रह में शामिल कहानियाँ गाँव-समाज में होनेवाले नित नए बदलावों को रेखांकित करते हुए देश का एक नया कथा-वृत्तान्त रचती हैं जिसमें युवा पीढ़ी, उसकी उम्मीदें, निराशाएँ, बदलते जीवन-मूल्य और चाकू के फल की तरह गाँव की हवा में घुसता शहर कई तरह से उजागर हुआ है। ये कहानियाँ बताती हैं कि गाँव या कहें वह भारतीय चेतना जो एक भाव-धारा की तरह गाँव से चलकर क़स्बों और फिर शहरों तक में हमारी ख़ास पहचान होती हैं, भूमंडलीय वास्तविकता के सामने जो रूप धारण करती हैं, वह एक अलग ही भाव-भूमि है। उसका सम्बन्ध न योरोप-अमेरिका से जुड़ता है और न भारत की अपनी मिट्टी से। यह एक ख़तरनाक भूगोल है जिसके समतल होने तक शायद हम बहुत कुछ गँवा दें। ‘फ़ेसबुक मेन्स पार्लर’, ‘अधिग्रहण’ आदि कहानियाँ इस यथार्थ को बहुत कलात्मकता के साथ रेखांकित करती हैं।
देश के इस बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक भूगोल में स्त्री फिर एक उम्मीद की तरह दिखती है, वह शायद इसलिए कि उसे अपना रास्ता बनाना है, ऐसा कोई रास्ता उसके पास था नहीं जिसके खो जाने का भय उसे हो। ‘जलेबीबाई डॉट कॉम’ इस सन्दर्भ में पठनीय है। ‘मनेकि लबरा नाई की दास्तान’ अपने शिल्प और अपने मंतव्य दोनों में कथाकार की क्षमता को गहराई से रेखांकित करती है।
Mansarovar Vol. 1 : Idgaah Aur Anya kahaniyan
- Author Name:
Premchand
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Pratinidhi Kahaniyan : Premchand
- Author Name:
Premchand
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- Description: भारतीय ग्रामीण जीवन और जनमानस की विभिन्न स्थितियों के अप्रतिम चितेरे मुंशी प्रेमचन्द विश्वविख्यात साहित्यकारों की पंक्ति में आते हैं। उनकी ये प्रतिनिधि कहानियाँ प्रायः पूरी दुनिया की पाठकीय चेतना का हिस्सा बन चुकी हैं। सुप्रसिद्ध प्रगतिशील कथाकार भीष्म साहनी द्वारा चयनित ये कहानियाँ भारतीय समाज और उसके स्वभाव के जिन विभिन्न मसलों को उठाती हैं, ‘आज़ादी’ के बावजूद वे आज और भी विकराल हो उठे हैं, और जैसा कि भीष्म जी ने संकलन की भूमिका में कहा है कि प्रेमचन्द की मृत्यु के पचास साल बाद आज उनका साहित्य हमारे लिए एक चेतावनी के रूप में उपस्थित है। जिन विषमताओं से प्रेमचन्द अपने साहित्य में जूझते रहे, उनमें से केवल ब्रिटिश शासन हमारे बीच मौजूद नहीं है, शेष सब तो किसी-न-किसी रूप में वैसी-की-वैसी मौजूद हैं! वस्तुतः प्रेमचन्द ने हमारे साहित्य में जिस नए युग का सूत्रपात किया था, साहित्य को वे जिस तरह जीवन के निकट अथवा जीवन को साहित्य के केन्द्र में ले आए थे, वह हमारे लिए आज भी प्रासंगिक है।
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