Sugandh Ki Awaaz Me
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अशोक शाह के अनुभव का संसार बहुत विस्तृत है और उनमें बहुत कुछ को अपनी कविता में ले आने की आकुलता और बेचैनी है। आत्मिक सवालों से जूझने के साथ ही अनेक सामाजिक, आर्थिक, विकास की नयी धारणाओं, स्त्री, पर्यावरण, समय, ईश्वर और दर्शन जैसे अनेक विषयों पर नये तरह से सोचने और कहने की बेचैनी इन कविताओं में लक्ष्य की जा सकती है। वो यादों में जीने वाले, रीति-रिवाजों की बेडिय़ों में जकड़े रहने वाले, अतीत की रखवाली करते रहने वाले और यादों में ही दफ्न हो जाने वाले व्यक्ति नहीं होना चाहते। इस संग्रह में एक लम्बी कविता है—समय और मेरी कहानी। यह कविता अपने आपको जानने की कोशिश से शुरू होकर मानव जीवन की विकास यात्रा के अनेक सवालों से जूझती कविता है। अमीबा जैसे एककोशीय जीव से बहुकोशीय जीवों से होती हुई मनुष्य के धरती पर आने की यह एक लम्बी कथा है। मनुष्य द्वारा आग को खोजने और उसके साथ ही प्रकृति और स्वयं उसकी ही देह में होने वाले परिवर्तनों के अनेकानेक संदर्भ यहाँ हैं। यह कविता मनुष्य की पूरी जीवन यात्रा पर सवाल खड़े करती है। यहाँ तक कि औद्योगिक क्रांति पर भी उसका संदेह है कि वह उसकी दूसरी बड़ी बेवकूफी हो सकती है। यह जि़न्दगी जो आदमी बनकर ठहर गयी है, यह आगे कौन से रूप धरेगी? उसे पता नहीं है, लेकिन वह इस बात के प्रति पूरी तरह आश्वस्त है कि कुछ भी अमिट नहीं है। जीवन निरन्तर परिवर्तनशील है। अशोक शाह की नज़र जीवन की विडम्बनाओं को कई स्तरों पर छूती है। यहाँ तक कि उसे पता है कि ईश्वर मात्र हमारे स्वार्थ, डर और महत्वाकांक्षाओं की प्रतिमूर्ति भर है। अशोक शाह की इन पंक्तियों से इन कविताओं के मिजाज को समझने का कोई इशारा शायद मिल सकता है : मैं ही दुनिया का पहला और आखिरी पाठ हूँ अभी-अभी पढ़ा है और बयां कुछ भी नहीं। —राजेश जोश
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अशोक शाह के अनुभव का संसार बहुत विस्तृत है और उनमें बहुत कुछ को अपनी कविता में ले आने की आकुलता और बेचैनी है। आत्मिक सवालों से जूझने के साथ ही अनेक सामाजिक, आर्थिक, विकास की नयी धारणाओं, स्त्री, पर्यावरण, समय, ईश्वर और दर्शन जैसे अनेक विषयों पर नये तरह से सोचने और कहने की बेचैनी इन कविताओं में लक्ष्य की जा सकती है। वो यादों में जीने वाले, रीति-रिवाजों की बेडिय़ों में जकड़े रहने वाले, अतीत की रखवाली करते रहने वाले और यादों में ही दफ्न हो जाने वाले व्यक्ति नहीं होना चाहते। इस संग्रह में एक लम्बी कविता है—समय और मेरी कहानी। यह कविता अपने आपको जानने की कोशिश से शुरू होकर मानव जीवन की विकास यात्रा के अनेक सवालों से जूझती कविता है। अमीबा जैसे एककोशीय जीव से बहुकोशीय जीवों से होती हुई मनुष्य के धरती पर आने की यह एक लम्बी कथा है। मनुष्य द्वारा आग को खोजने और उसके साथ ही प्रकृति और स्वयं उसकी ही देह में होने वाले परिवर्तनों के अनेकानेक संदर्भ यहाँ हैं। यह कविता मनुष्य की पूरी जीवन यात्रा पर सवाल खड़े करती है। यहाँ तक कि औद्योगिक क्रांति पर भी उसका संदेह है कि वह उसकी दूसरी बड़ी बेवकूफी हो सकती है। यह जि़न्दगी जो आदमी बनकर ठहर गयी है, यह आगे कौन से रूप धरेगी? उसे पता नहीं है, लेकिन वह इस बात के प्रति पूरी तरह आश्वस्त है कि कुछ भी अमिट नहीं है। जीवन निरन्तर परिवर्तनशील है। अशोक शाह की नज़र जीवन की विडम्बनाओं को कई स्तरों पर छूती है। यहाँ तक कि उसे पता है कि ईश्वर मात्र हमारे स्वार्थ, डर और महत्वाकांक्षाओं की प्रतिमूर्ति भर है। अशोक शाह की इन पंक्तियों से इन कविताओं के मिजाज को समझने का कोई इशारा शायद मिल सकता है : मैं ही दुनिया का पहला और आखिरी पाठ हूँ अभी-अभी पढ़ा है और बयां कुछ भी नहीं। —राजेश जोश
Book Details
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ISBN9789391925550
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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डायरी से :
दु:ख का गर्भपात नहीं होता है। दु:ख सतमासे भी नहीं होते हैं। दु:ख तो सम्पूर्ण रूप से जन्मते हैं जीवन की कोख से, इस विचार मात्र से मेरे भीतर दु:खों की ज्वालामुखी उमड़ पड़ती है। उसी बहते हुए लावे में हैं हज़ारों दु:खों के भ्रूण, जो एक क्षण में पूर्ण रूप से जन्म लेते हैं। जो मेरे पतन के कारण हैं या उन्नति के, मैं नहीं जानती। मैंने स्वयं से बाहर निकलकर कभी कुछ देखने का साहस या प्रयास नहीं किया। मैं भीतर ही भीतर जीवन की खाई को गहरा करने में लगी रहती हूँ। मुझे याद है, मुझे चाँद ने कभी नहीं छुआ लेकिन बन्द कमरों में आकर सूरज की आग मेरी कोमल देह को झुलसाती रही, पीड़ा देती रही।
11 जुलाई, 1999
मेरी प्रत्येक कविता जीवन की प्रत्येक साँस का ऋण चुकाती है। मेरे जाने पर जीवन मुझ पर एहसान या दया की दुहाई न दे। मैं नहीं कहूँगी अपनी व्यथा, पर मेरी कविता जीवन के मुझ पर किए हुए अन्याय की कथा कहेगी। मृत्यु के बाद भी मेरी कविता ख़ामोश नहीं होगी। मेरी कविता की सत्यता से यह जीवन मृत्यु के बाद भी नहीं बच पाएगा।
25 जनवरी, 1999
कितना बचाया पर आज आख़िरकार गिन्नी चिड़िया के एक बच्चे को खा गई। हम क्या कर सकते हैं! ईश्वर ने जीवों की यही नियति निर्धारित की है। उसकी लीला वो ही जाने, चिड़िया जैसी कितनी इच्छाएँ मेरी रोज़ मरती हैं और आँसुओं में बहा दी जाती हैं।
20 मई, 2011
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सर्पकुण्डली राज छंद, मुक्तक विन्यास, पद जैसी शैली , जनकछन्द, लययुक्त हाइकुदार, वर्णिक छंद में तेवरियाँ
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जीवन को अनुभूति और चिन्तन के विभिन्न धरातलों पर ग्रहण करनेवाले कवि कुँवर नारायण अपनी कविताओं में सीमाएँ नहीं बनाते; उनकी ज़्यादातर कविताएँ किसी एक ही तरह की भाषा या विषय में विसर्जित-सी हो गई नहीं लगतीं—दोनों को विस्तृत करती लगती हैं। अनेक कविताएँ मानो समाप्त नहीं होतीं, एक ख़ास तरह की हमारी बेचैनियों का हिस्सा बन जाती हैं। इस तरह से देखें तो वे अपने को सिद्ध करनेवाले कवि हमें नहीं नज़र आते। वे बराबर अपनी कविताओं में मुहावरों से बचते हैं और अपने ढंग से उनसे लड़ते भी हैं। उनकी कविता की भाषा में धोखे नहीं हैं। अधिकांश कविताओं का पैनापन ज़िन्दगी के कई हिस्सों को बिलकुल नये ढंग से छूता है।
वे मानते हैं कि दैनिक यथार्थ के साथ कविता का रिश्ता नज़दीक का भी हो सकता है और दूर का भी और दोनों ही तरह वह जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है—सवाल है, कविता कितने सच्चे और उदार अर्थों में हमें आदमी बनाने की ताक़त रखती है। कविता उनके लिए जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र नहीं, जीवन का सबसे आत्मीय प्रसंग है—कविता, जो अपने चारों तरफ़ भी देखती है और अपने को सामने रखकर भी। उनकी कविताओं में हमें बहुत सतर्क क़िस्म की भाषा का इस्तेमाल मिलता है; वह कभी बहुत गहराई से किसी ऐतिहासिक या दार्शनिक अनुभव की तहों में चली जाती है और कभी इतनी सरल दिखती है कि वह हमें अपने बहुत क़रीब नज़र आती है। बहुआयामी स्तरों पर भाषा से यह लड़ाई और प्यार कुँवर नारायण को चुनौती देता है, ख़ास तौर पर एक ऐसे वक़्त में जब कविता का एक बड़ा हिस्सा एक ही तरह की भाषा में अपने को अभिव्यक्त किए चला जा रहा है।
हिन्दी के अग्रणी आधुनिक कवि कुँवर नारायण की कविता की दुनिया में जाने का मतलब ज़िन्दगी को गहराई और विस्तार से देखने और जानने का अच्छा मौक़ा पा लेना है।
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