Ichchaon Ke Jivashm
Author:
Usman KhanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
उस्मान ख़ान की कविता उखड़े हुए नागरिक के एलिएनेशन की कविता है। आततायी राज्य, अन्याय, सत्तात्मक दम्भ, लूट, निर्बुद्धिकरण और कुबुद्धिकरण, राजनीतिक पतन, सामाजिक विषमता और विभाजन ने उस्मान को आन्दोलित कर रखा है। वे बेज़ार हैं। यह मामूली मोहभंग नहीं है। लेकिन यह ग़ैरमामूली असन्तोष उन्हें न तो निरुपाय बनाता है और न ही असंयत। उनके यहाँ भाषा एक बड़े उपाय में बदल जाती है। लोकतंत्र, सत्ता और समाज के स्लम को वर्णित करने के लिए उस्मान को ‘स्ट्रीट लैंग्वेज’ उपलब्ध होती जाती है जो हिन्दुस्तानी विपन्नता, दारिद्र्य, असहमति और बेदखली की अस्ल अभिव्यंजना है। इस जन भाषा, जो नई हिन्दुस्तानियत की द्रोह-भाषा सरीखी है, को पाने के बाद उस्मान ख़ान समकालीन हिन्दी के मध्यवर्गीय टकसाली भाषिक रूप-बन्ध को आहिस्ता से परे हटा देते हैं और अपने निहंग अनुभवों और देखन को किसी निचाट ज़बान के हवाले कर देते हैं। इसीलिए उस्मान को पढ़ना काफ़ी कुछ ख़ुसरो की याद दिलाता है। तब यह बात भी खुल जाती है कि कविता के अपने कारोबार में वह ला-सानी हैं। कोई उन जैसा नहीं, वह किसी जैसे नहीं। फिर भी मुक्तिबोध की चिन्ताओं और राजकमल की उखड़ी हुई साँसों वाली कविता का यदि कोई काव्याकार देखना हो तो उस्मान ख़ान की बेचैन चहलक़दमियों में वह दिख जाएगा। और अपनी इस बेचैनी में वह मुक्तिबोध की तरह एक बडे भूभाग में नहीं भटकते—उनकी दुविधाएँ और द्वन्द्व बेहद संघनित और आन्तरिक होने के साथ ही प्रतिरोधात्मक और वैचारिक होते जाते है। जीवन के नष्ट होने की वजह यदि जनविरोधी तंत्र है तो इसका विकल्प ढूँढ़ना पड़ेगा जो तुरत-फुरत तो हासिल नहीं हो सकता। कह लीजिए कि उस्मान सामूहिक आत्मन् के निर्माण को किसी सतत् धीरज का परिणाम मानने से विरत नहीं होते। विपत्तियों को देखने-समझने का जो हुनर उन्होंने हासिल किया है और फ़कीरी बेबाक़ी, बाँकपन और तंज़ के साथ कहने की जो शैली उन्होंने पा ली है, हिन्दी कविता के समकाल में वह बड़ी रचनात्मक उपलिब्ध है जो उस्मान की क़द-काठी को नायाब और अप्रतिम बनाती है और अपनी पीढ़ी का सबसे निराला राजनीतिक काव्य-व्यक्तित्व।
-देवी प्रसाद मिश्र
ISBN: 9789349180956
Pages: 128
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Dharati Aaba Birsa Munda
- Author Name:
Joydev Das
- Book Type:

- Description: बिरसा मुंडा का दृष्टांत बना व्यक्तित्व सहज ही प्रेरित और प्रभावित करता है। इस व्यक्तित्व, इसकी क्रांतिधर्मी चेतना और संघर्षों की प्रेरणा नाटक विधा में उतर कर दूरगामी प्रभाव रच सकती है। बिरसा मुंडा के जीवन की प्रमुख घटनाओं पर आधारित रंगकर्मी जयदेव दास द्वारा रचित नाटक ‘धरती आबा-बिरसा मुंडा’ एक ऐतिहासिक क्रांतिकारी चरित्र को उसकी पूरी संघर्षशीलता के साथ सामने लाता है। ‘धरती आबा’ यानी धरती का पिता-बिरसा मुंडा को यह समान सहज ही प्राप्त नहीं हुआ। अंग्रेजों की आदिवासी विरोधी आर्थिक नीतियों के विरुद्ध लामबंद होने और ब्रिटिश साम्राय की सामंतशाही के तमाम उत्पीन झेलने के साथ आदिवासी और स्त्री केंद्रित मुद्दों के प्रति व्यापक समाज में अपनी अस्मिता की लाई को धारदार बनाने का काम बिरसा मुंडा ने किया। जिसके लिए अन्यायी शासन ने उन्हें कैद किया और धोखे से पककर जहर देकर मौत के घाट उतारा। निश्चय ही एक अति पठनीय नाटक।
Lalak
- Author Name:
Ravindra Kumar
- Book Type:

- Description: "जब हमारे अंतस से बाह्य चीजें मेल नहीं खातीं, तब मन और मस्तिष्क में विक्षोभ और विद्रोह स्वाभाविक है। युवावस्था में यह स्थिति और भी तीव्रतम होती है। श्री रविन्द्र कुमार के कविता संकलन ‘ललक’ की सभी कविताएँ इसी तीव्रतम अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं। रविन्द्रजी की कविताएँ सामाजिक परिवेश की कविताएँ हैं। उनकी कविता में मानवीय संवेदना, समाज की असमानता, वर्गभेद, पूँजीवाद व बाजारवाद के शोषण तथा अंध परंपराओं एवं कुरीतियों के दुष्परिणाम आदि पहलू प्रभावशाली तरीके से अभिव्यक्त हुए हैं। इसलिए ये कविताएँ पाठक को जागरूक करती हैं तथा उन्हें एक जिम्मेदार दृष्टि सौंपती हैं। संग्रह की शीर्षक कविता ‘ललक’ इस मायने में अति विशिष्ट कविता है क्योंकि यह कवि द्वारा बचपन में देखे गए स्वप्नों एवं सम्यक संकल्पों का लिखित दस्तावेज है। इस कविता में कवि रविन्द्र अपनी तरुणावस्था में (सन् 1997 में) लिखते हैं—‘‘मोटर गाडि़यों से करने की, मसूरी की सैर/ललक मुझे है इसकी/पर चढ़कर हिमगिरि की चोटी पर/ ललक है हिंद का तिरंगा फहराऊँ।’’ आज जब दिसंबर 2020 में मैं रविन्द्रजी की इस कविता की पांडुलिपि पढ़ रहा हूँ, तो मुझे कवि की यह कविता उनके द्वारा करीब ढाई दशक पहले अपने भविष्य की उपलब्धियों के बारे में की गई भविष्यवाणी लगती है। रविन्द्रजी विश्व की सबसे ऊँची पर्वत शृंखला माउंट एवरेस्ट पर दो बार चढ़कर राष्ट्रध्वज फहरा चुके हैं। इस प्रकार, कवि की काव्य-पंक्तियाँ वास्तविक रूप से मूर्त हुई हैं।’’ —डॉ. अश्वघोष वरिष्ठ कवि "
Subhadra Samagra
- Author Name:
Subhadra Kumari Chauhan
- Book Type:

- Description: Subhadra Samagra
Jab Har Hansi Sandigdh Thi
- Author Name:
Pragya Pathak
- Book Type:

- Description: ‘मैंने जिसे देश समझकर प्यार किया वह विचारों की क़त्लगाह था।’ अपने आक्रोश और असहमति में पराग पावन जितने युवा हैं, अन्याय और शोषण की संरचना को समझने में उतने ही वयस्क। उनके इस पहले संग्रह में शामिल कविताओं का भावात्मक और भाषिक वैविध्य बताता है कि एक विधा के रूप में कविता को उन्होंने जितनी गम्भीरता से लिया है, वैसा कम ही युवा कवि करते हैं। स्मृतियों में बसी ‘चूल्हे की राख’ से आरम्भ होकर ‘कथा कहूँ कवि गंग की’ शीर्षक एक सुदीर्घ आख्यानपरक कविता तक उठनेवाला यह संग्रह उन हत्यारों की पहचान भी करता है जो कभी आपकी अस्मिता तो कभी असमर्थता पर आक्रमण कर बिना हथियार ही आपको संसार से नफ़ी कर देते हैं; और उन प्रातिभ चापलूसों को भी दिखाता है जो ‘दुखी किसी-किसी को, ख़ुश अधिकांश को करते हुए’ सब कुछ को अपने अनुकूल करने में तल्लीन हैं। पराग जहाँ ज़रूरी समझते हैं व्यंग्य को और जहाँ ज़रूरी समझते हैं करुणा को उसकी पूरी सम्भावना के साथ प्रयोग करते हैं। व्यक्ति और व्यवस्था, दोनों जगह निहित ख़तरों की पर्याप्त पहचान उन्हें हैं—‘गाँव 2020’ का अतियथार्थ हो या उस अध्यापक को याद करना जिसे बताना पड़ता है कि ‘प्रेम आदमी का अवैतनिक चिकित्सक है।’ ‘बेरोज़गार’ शीर्षक पराग की बहुत चर्चित कविता-शृंखला के अलावा न्यायाकांक्षी युवा चेतना के और भी आयामों को रेखांकित करने वाली कविताएँ इस संग्रह में मिलेंगी, और एक नागरिक मन की उदासी भी जिसे कोई धोखा नहीं देता, सिवा उसकी उम्मीदों के। साथ ही प्रेम के कंधे पर कुहनी टिकाए खड़ी उम्मीद भी यहाँ है—जहाँ शाम ख़त्म होती है/रात वहीं से शुरू नहीं होती/रात शुरू होती है तुम्हारे मेरा बाज़ू पकड़ने से/और उस बेआवाज़ वाक्य से/कि थक गए हो/चलो, घर चलें।
Phir Bhi Kuchh Log
- Author Name:
Vyomesh Shukla
- Book Type:

-
Description:
व्योमेश शुक्ल के यहाँ राजनीति कुछ तेवर या अमर्षपूर्ण वक्तव्य लेकर ही नहीं आती, बल्कि उनके पास पोलिंग बूथ के वे दृश्य हैं जहाँ भारतीय चुनावी राजनीति अपने सबसे नंगे, षड्यंत्रपूर्ण और ख़तरनाक रूप में प्रत्यक्ष होती है। वहाँ संघियों और संघ-विरोधियों के बीच टकराव है, फ़र्ज़ी वोट डालने की सरेआम प्रथा है, यहाँ कभी भी चाकू और लाठी चल सकते हैं लेकिन कुछ ऐसे निर्भीक, प्रतिबद्ध लोग भी हैं जो पूरी तैयारी से आते हैं और हर साम्प्रदायिक धाँधली रोकना चाहते हैं। ‘बूथ पर लड़ना’ शायद हिन्दी की पहली कविता है जो इतने ईमानदार कार्यकर्ताओं की बात करती है जिनसे ख़ुद उनकी ‘सेकुलर’ पार्टियों के नेता आजिज आ जाते हैं, फिर भी वे हैं कि अपनी लड़ाई लड़ते रहने की तरक़ीबें सोचते रहते हैं।
ऐसा ही इरादा और उम्मीद ‘बाईस हज़ार की संख्या बाईस हज़ार से बहुत बड़ी होती है’ में है जिसमें भूतपूर्व कुलपति और गांधीवादी अर्थशास्त्र के बीहड़ अध्येता दूधनाथ चतुर्वेदी को लोकसभा का कांग्रेस का टिकट मिलता है किन्तु समूचे देश की राजनीति इस 75 वर्षीय आदर्शवादी प्रत्याशी के इतने विरुद्ध हैं कि चतुर्वेदी छठवें स्थान पर बाईस हज़ार वोट जुटाकर अपनी जमानत ज़ब्त करवा बैठते हैं और बाक़ी बची प्रचार सामग्री का हिसाब करने बैठ जाते हैं तथा कविता की अन्तिम पंक्तियाँ यह मार्मिक, स्निग्ध, सकारात्मक नैतिक एसर्शन करती हैं कि ‘बाईस हज़ार एक ऐसी संख्या है जो कभी भी बाईस हज़ार से कम नहीं होती’।
व्योमेश की ऐसी राजनीतिक कविताएँ लगातार भूलने के ख़िलाफ़ खड़ी हुई हैं और वे एक भागीदार सक्रियतावादी और चश्मदीद गवाह की रचनाएँ हैं जिनमें त्रासद प्रतिबद्धता, आशा और एक करुणापूर्ण संकल्प हमेशा मौजूद हैं।...यहाँ यह संकेत भी दे दिया जाना चाहिए कि व्योमेश शुक्ल की धोखादेह ढंग से अलग चलनेवाली कविताओं में राजनीति कैसे और कब आ जाएगी, या बिलकुल मासूम और असम्बद्ध दिखनेवाली रचना में पूरा एक भूमिगत राजनीतिक पाठ पैठा हुआ है, यह बतलाना आसान नहीं है।...ये वे कविताएँ हैं जो ‘एजेंडा’, ‘पोलेमिक’ और कला की तिहरी शर्तों पर खरी उतरती हैं।
—विष्णु खरे
Sang Samay Ke
- Author Name:
Mahaprakash
- Book Type:

- Description: Collection of Maithili Poems
Parimal
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

-
Description:
महाकवि ‘निराला’ की युगान्तरकारी कविताओं का अति विशिष्ट और सुविख्यात संग्रह है—‘परिमल’।
इसी में है ‘तुम और मैं’, ‘तरंगों के प्रति’, ‘ध्वनि’, ‘विधवा’, ‘भिक्षुक’, ‘संध्या-सुन्दरी’, ‘जूही की कली’, ‘बादल-राग’, ‘जागो फिर एक बार’—जैसी श्रेष्ठ कविताएँ, जो समय के वृक्ष पर अपनी अमिट लकीर खींच चुकी हैं।
‘परिमल’ में छाया-युग और प्रगति-युग अपनी सीमाएँ भूलकर मानो परस्पर एकाकार हो गए हैं। इसमें दो-दो काव्य-युगों की गंगा-जमुनी छटा है, दो-दो भावधाराओं का सहजमुक्त विलास है।
Rangandha
- Author Name:
Alaka Naik
- Book Type:

- Description: The best poetry collection
Man Kastoori Re
- Author Name:
Anju Sharma
- Book Type:

- Description: Book
Yeh Prithvi Tumhein Deta Hoon
- Author Name:
Markandey
- Book Type:

-
Description:
मार्कण्डेय की ख्याति एक कथाकार के रूप में विशेष है। लेकिन उन्होंने कविता और कहानी साथ-साथ लिखना शुरू किया था। सन् 1954 में उनका पहला कहानी-संग्रह ‘पान-फूल’ और सन् 1956 में पहला कविता-संग्रह—‘सपने तुम्हारे थे’ नाम से आया था।
‘सपने तुम्हारे थे’ के बाद उनका फिर कोई दूसरा काव्य-संग्रह नहीं आया। लेकिन फिर सन् 2006 की जनवरी में सतीश जमाली द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘नई कहानी’ का अंक एकाएक हाथ लगा। देखा, उसमें मार्कण्डेय की भी छह कविताएँ थीं। मार्कण्डेय जी से पूछा तो पता चला कि ये कविताएँ 1980 के दशक में लिखी गई कविताओं में से छाँटकर ‘नई कहानी’ में छपने को दी गई थीं। इस तरह यह भेद खुला कि मार्कण्डेय ने अपने कवि को ‘सपने तुम्हारे थे’ के साथ कोई अन्तिम विदाई नहीं दे दी थी। अलबत्ता काव्य-रचना के क्षेत्र में एक लम्बा मौन ज़रूर उन्होंने साध रखा था, जो शायद सन् 1980 के दशक में टूटा—भले ही बहुत थोड़े समय के लिए ही सही।
बहरहाल, प्रस्तुत संग्रह में मार्कण्डेय के पहले काव्य-संकलन ‘सपने तुम्हारे थे’ की कविताओं के साथ सन् 1980 के दशक में लिखी गई उनकी कविताओं को भी सम्मिलित किया गया है।
मार्कण्डेय कविता की ‘कला’ सीखने से ज़्यादा चाव रखते हैं यह सीखने में कि कविता में शब्दों को किसी सार्थक उद्देश्य से कैसे जोड़ा जाए। ‘अभी तो मैं सीख रहा हूँ’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ देखिए—‘‘अगर सम्भव हुआ तो निहाई ले आऊँगा/हथौड़े से पीटूँगा, हँसिया बनाऊँगा/फिर मैं सीखूँगा शब्दों को गर्म करना/नाबदानों और वेश्यालयों में पड़े-पड़े/वे घिनौने, बदकार और चापलूस हो गए हैं...’’
सीखने की कोई उम्र नहीं होती। मगर यह सब सीखने में मार्कण्डेय के कवि-रूप को कितनी सफलता मिली या यह सब सीखने में कविता का क्या-क्या दाँव पर लगा—इसकी जाँच–परख इन कविताओं के पाठक अपने विवेक से करेंगे, ऐसी आशा है।
—राजेन्द्र कुमार
Aanch
- Author Name:
Sumita Kumari
- Book Type:

-
Description:
सुमिता कुमारी प्रतिभावान कवि और गद्यकार हैं। उन्होंने अपने आस-पास के जीवन को कविता में ढाला है और कुछ मर्मस्पर्शी कविताओं की रचना की है। यहाँ स्त्रियों के पारिवारिक जीवन और श्रमिक स्त्रियों के संघर्ष तथा जीवट के नए चित्र मिलते हैं। ‘आँच’ शीर्षक कविता जीवन-संग्राम और प्रतिरोध की विशिष्ट कविता है। धान रोपती स्त्रियों और वृद्धाओं के जीवन के विश्वसनीय रेखांकन द्रवीभूत करते हैं। इन कविताओं की तेज आँच हमें तप्त कर देती है। अधिकांशतः ये कविताएँ गद्यबद्ध हैं। कहीं-कहीं लय का भी मिश्रण है। भाषा सरल, सहज और मुहावरेदार है। मगही के अनेक शब्दों का निपुण व्यवहार कवि की सृजन-क्षमता को दर्शाता है और उनकी रचनाओं को अद्वितीय बनाता है। कुछ नए बिम्ब और अलंकरण भी कवि ने सिरजे हैं। मगही भाषा की समृद्धि का समुचित उपयोग हिन्दी कविता में कम ही हो पाया है।
पेशे से प्रशासनिक पदाधिकारी होते हुए भी सुमिता जी ने निरन्तर काव्य-साधना की है और जीवन को बहुत ध्यान से देखा है। वास्तव में बाहरी दुनिया के साथ-साथ आन्तरिक दुनिया का भी अनवरत अवलोकन करती रहती हैं और अत्यन्त व्यस्त दिनचर्या के बीच काव्य-रचना के लिए किंचित अवकाश निकाल ही लेती हैं। इसीलिए इन कविताओं में आवेग और त्वरा है जो सुमिता जी को बाक़ी सभी समकालीनों से पृथक एक विशिष्ट स्थान पर स्थापित करती है।
आशा है कि सहृदय पाठक इन कविताओं का स्वागत करेंगे। हम यह भी आशा करते हैं कि भविष्य में सुमिता जी से परिपक्वतर एवं श्रेष्ठतर कविताएँ मिलेंगी और एक दिन वह कविता के शिखर की ओर उन्मुख होंगी। अस्तु। —अरुण कमल
Har Koshish Hai Ek Baghawat
- Author Name:
Rajendra Kumar
- Book Type:

- Description: collection of poems
Pratinidhi Kavitayen : Vinod Kumar Shukla
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla
- Book Type:

-
Description:
विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में आज ऐसे कवि के रूप में बहुप्रतिष्ठित हैं जिनकी कविता को बिना उनके नाम के भी जागरूक पाठक पहचान लेते हैं।
उनकी कविता, कविता के तुमुल कोलाहल के बीच चुपचाप अपने सृजन में व्यस्त दिखती है। किसी भी तरह के दिखावे, छलावे, भुलावे से दूर अपनी राह का ख़ुद निर्माण करती और उस पर निर्भय अकेले चलने की हिम्मत रखती, वह अपनी मंज़िलें तय करने में संलग्न है।
विनोद की काव्य-संवेदना के विस्तार को देखने के लिए उनकी कविताओं की गहराई में उतरना होगा। उनकी काव्यात्मक जटिलता इसीलिए ऊपर से दिखाई पड़ती है क्योंकि उनकी काव्य संवेदना की तहें इकहरी न होकर दुहरी और कहीं तिहरी हैं।
देखा जाए तो उनकी काव्योपलब्धि में सिर्फ़ अनोखे काव्य-शिल्प का ही योगदान नहीं है, बल्कि उनकी काव्य-वस्तु में यथार्थ को ‘देखने’ का नज़रिया भी उनके अपने समकालीनों से अलहदा रहा है।
कहना चाहिए कि विनोद कुमार शुक्ल की कविता समकालीन कविता के दृश्य पर समकालीन जीवनानुभव को प्राचीनता से, प्रकृति से मनुष्य को जिस तरह उद्घाटित करती है, उससे कविता की एक दूसरी दुनिया की खिड़की खुलती है। इस दुनिया को देखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल जैसी ‘अतिरिक्त’ देखने की दृष्टि और कला चाहिए।
Tulsi Rachnawali Vol-3
- Author Name:
Dr. Ramji Tiwari
- Book Type:

- Description: गोस्वामी तुलसीदास की विलक्षण प्रतिभा से प्रसूत अनंत काव्य-कीर्ति-कौमुदी में स्नात होकर समस्त विश्व के काव्य-रसिक धन्य, रससिक्त और श्रद्धानवत होते रहे हैं, किंतु सभी के दृष्टि-पथ में 'रामचरितमानस' ही आकाशदीप की भाँति विराजमान है। अन्य ग्रंथरत्न छायावेष्टित ही रह जाते हैं। जबकि लोक-परलोक चिंतन, व्यावहारिक चेतन जीवन और अध्यात्मबोध, संस्कृति और संस्कार, संघर्ष और आस्था तथा जय और पराजय से युक्त विलक्षण व्यक्तित्व उनके सभी ग्रंथ-रत्नों को देखने के बाद ही सगुण साकार हो पाता है। संस्कारशील और सुरुचि-संपन्न पाठक भी इस विश्वकवि के संपूर्ण वाड्मय का रसास्वादन कर लेने के बाद ही पूर्ण परितोष का लाभ ले पाता है। गोस्वामीजी के सभी ग्रंथरत्नों को एकत्र उपलब्ध कराने के पुनीत उद्देश्य से ही इस 'रचनावली' की योजना बनाई गई है। ग्रंथावली का प्रथम खंड सुविज्ञ पाठकों को समर्पित है। इसमें गोस्वामीजी की 'रामलला नहछू', 'वैराग्य संदीपनी', 'बरवै रामायण', 'जानकी मंगल', 'पार्वती मंगल', 'रामाज्ञा-प्रश्न', 'दोहावली', 'श्रीकृष्ण गीतावली' कृतियों का समावेश है। आशा है, सुधी पाठकों को अभीप्सित परितोष मिल सकेगा।
Deh Gatha
- Author Name:
Pankaj Subeer
- Book Type:

- Description: Description Awaited
Fir Ugana
- Author Name:
Parwati Tirkey
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी कविता की युवतम पीढ़ी में पार्वती तिर्की का स्वर एकदम अलग है। झारखंड के कुड़ुख समुदाय से आनेवाली पार्वती आदिवासी जीवन-बोध के आधारभूत तत्त्वों से अपनी कविता की काया रचती हैं जिसमें प्रकृति की बड़ी और निर्णायक भूमिका रहती है। धरती, चाँद-तारे, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु—ये सब जैसे आदिवासी जीवन में अभिन्न हैं, उसी तरह पार्वती की इन कविताओं में भी उनकी मौजूदगी दिखाई देती है।
अभिव्यक्ति की सरल भंगिमाओं में उनकी कविताएँ अनायास ही प्रकृति और मनुष्य के आपसी सम्बन्धों को देखने की हमारी दृष्टि को बदल देती हैं। ये कविताएँ बताती हैं कि सृष्टि के प्राकृतिक अनुशासन के भीतर ही मनुष्य की तमाम चेष्टाएँ अपना स्थान ग्रहण करती हैं, और उसी के अनुकूलन में मनुष्य अपना स्वाभाविक विकास कर पाता है।
पार्वती की कविताओं की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता यह है कि वे बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के प्रकृति के सान्निध्य में बनते-बढ़ते जीवन की सहज छवियों, बिम्बों, लोक के विश्वासों और मान्यताओं को कविता का हिस्सा बना देती हैं।
आदिवासी बोध के बाहर पनप रही सभ्यता के आक्रामक प्रभावों और ख़तरों को रेखांकित करना भी पार्वती नहीं भूलतीं। इस संग्रह की कई कविताएँ प्रकृति के साहचर्य और उसके बरक्स खड़े शहरी दबावों के तनाव को सफलतापूर्वक अंकित करती हैं।
‘फिर उगना’ के पन्नों से गुज़रना कविता-सुधी पाठकों के लिए निश्चय ही एक नए इलाक़े से वाक़िफ़ होने जैसा होगा।
Aur Thodi Door
- Author Name:
Sachchidanand Visakh
- Book Type:

- Description: Poems
Akshat
- Author Name:
Pushpita Awasthi
- Book Type:

-
Description:
style="line-height: 10px;">तुम
मेरी एकमात्र पुस्तक हो
मेरे मन का धर्मग्रन्थ तुम
मेरी एकमात्र कविता हो
मेरे सृजन के सच्चे दस्तावेज़
तुम मेरा एकमात्र विश्वास हो
मेरी आत्मा के वास्तविक सहचर
प्रेम का यही अकुंठ भाव इन कविताओं का मूल स्वर है। यह प्रेम-कविताओं का संग्रह है जिनकी कमी इधर आकर बहुत खलने लगी है। कविता के केन्द्र से प्रेम का हटना बेशक जीवन का अनुगमन ही है, क्योंकि जीवन का केन्द्र भी आज प्रेम नहीं है, लेकिन इसीलिए प्रेम अपनी तमाम पारदर्शिताओं, स्वच्छताओं और उदात्तताओं के साथ और भी ज़रूरी हो जाता है। वह एक अमूर्त भाव है लेकिन दुनिया में उसका अभाव हमें किसी चीज़ की तरह कचोटता है, जिसे इतनी तमाम चीज़ों की उपस्थिति भी पूर नहीं पाती।
ये कविताएँ हमें प्रेम की याद दिलाती हैं, उसकी उस ताक़त की याद दिलाती हैं जो हमें देह में देह को और आत्मा में आत्मा को अनुभव करने की क्षमता देता है, हमें ज़्यादा सहनशील, सहिष्णु और संसार को ज़्यादा रहने लायक़ बनाता है।
तुम
मेरे पास
सुख की तरह हो
जैसे जड़ों के पास ज़मीन
तुम्हारा स्पर्श मुझे छूता है
जैसे सूरज छूता है पृथ्वी।
Jai Kanhaiyalal Ki
- Author Name:
Rameshraaj
- Rating:
- Book Type:

- Description: कवि ने प्रथम पृष्ठ पर ही शीर्षक के नीचे टिप्पणी दी है –“ कृष्ण-रूप में कंस जैसे हर शासक के प्रति “, जिससे मुख्य मन्तव्य स्पष्ट हो जाता है ‘ करारे व्यंग्य – देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर ‘ | रमेशराज के व्यंग्यों की ख़ास बात यह है कि स्तरहीनता नहीं, कहीं अशिष्टता नहीं, न कहीं मर्यादा का उल्लंघन, फिर भी करारे प्रहार | जीवन का भोगा हुआ यथार्थ जैसे साकार सामने खड़ा हो | कैसी सहज-सरल अभिव्यक्ति, लक्ष्य की ओर दनदनाते-सनसनाते तीर की तरह – जन को न रोटी-दाल, जै कन्हैयालाल की नेताजी को तर माल, जै कन्हैयालाल की! नीति है कमाल की !! व्यंग्य को अधिक धारदार और मारक बनाने के लिए कवि ने उद्धव-गोपी प्रसंग को बड़ी होशियारी के साथ जोड़ दिया है- ऊधौ देश पर आप कर्ज विश्वबैंक का लाद-लाद हो निहाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !! कथ्य की सशक्तता के साथ कवि का कौशल भी प्रभावित करता है | इसे मैं उक्ति-वैचित्र्य का कमाल मानता हूँ, साथ ही वर्ण-मैत्री भी निर्दोष एवं प्रभावी है | प्रकृति से जो प्रतीक लिए गए हैं वे कवि के मन्तव्य को भी स्पष्ट करते हैं तथा उनसे काव्य में कलात्मक विम्ब-सौन्दर्य भी प्रभावित करता है | देखिये एक उदाहरण – खुशियों का मानसून अँखियों से दूर है सूख गए सुख-ताल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !! कवि ने अपने कथ्य को अधिक ग्राह्य बनाने के लिए पौराणिक इंगित भी दिए हैं | कहीं विरोधाभास से अपना मन्तव्य स्पष्ट किया है तो कहीं आधुनिक योजनाओं की विडम्बनाओं की ओर इंगित है – केवल अंगूठे नहीं मांगें आज द्रोण जी भील को करें हलाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !!
Mallika
- Author Name:
Devdas Chhotray
- Book Type:

-
Description:
हमारे समय में सामाजिक यथार्थ और सामाजिकता का ऐसा आतंक है कि प्रेम-कविता की जगह घटती गई है—उसे सामाजिकता से भटकाव की विधा तक करार दिया गया है। ऐसे प्रेम-वंचित समय में ओड़िया के प्रसिद्ध कवि देवदास छोटराय की प्रेम कविताओं का हिन्दी के प्रसिद्ध कवि-आलोचक प्रभात त्रिपाठी के अनुवाद में यह संचयन ताज़ी हवा की तरह है। प्रेम मनुष्य का स्थायी भाव है और उसका कविता में अन्वेषण सदियों से कविता के लिए अनिवार्य रहा है। ओड़िया में, सौभाग्य से, जातीय स्मृति सक्रिय-सजीव है और वह इस कविता में अन्त:ध्वनित होती रहती है। हिन्दी में इस अनुवाद का महत्त्व इसलिए होगा कि यह कविता में प्रेम और स्मृति के पुनर्वास की कविता है। रज़ा फ़ाउंडेशन इस पुस्तक को सहर्ष प्रकाशित कर रहा है।
—अशोक वाजपेयी
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book