Dhoop Mein Baithne Ke Din Aaye

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Author:

Suneel Aftab

Language:

Hindi

Category:

Poetry

249

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धूप में बैठने के दिन आए। सुनील आफ़ताब का पहला शेरी मज्मूआ है। इस किताब में सुनील आफ़ताब ने नाज़ुक और मद्धम लहजे और सादा ज़बान में अपने एहसासात को बयान किया है, जिसका क़ारी पर कुछ अलग ही असर दिखता है। सुनील आफ़ताब का शुमार नई पीढ़ी के नुमाइन्दा शायरों में होता है।वो पंजाब की मिट्टी से ताल्लुक़ रखते हैं। उनका जन्म 23 नवम्बर, 1976 को पंजाब के पठानकोट ज़िले के गाँव शाहपुर कण्डी में हुआ। उन्होंने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर से बी.एस.सी. तथा जम्मू यूनिवर्सिटी के रामिष्ट कॉलेज से बी.एड. किया। कुछ समय तक अध्यापन करने के बाद वो अपना व्यवसाय करने लगे।

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ISBN
9789394494794
Pages
106
Avg Reading Time
4 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

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Secure Payment

About the Book

धूप में बैठने के दिन आए। सुनील आफ़ताब का पहला शेरी मज्मूआ है। इस किताब में सुनील आफ़ताब ने नाज़ुक और मद्धम लहजे और सादा ज़बान में अपने एहसासात को बयान किया है, जिसका क़ारी पर कुछ अलग ही असर दिखता है। सुनील आफ़ताब का शुमार नई पीढ़ी के नुमाइन्दा शायरों में होता है।वो पंजाब की मिट्टी से ताल्लुक़ रखते हैं। उनका जन्म 23 नवम्बर, 1976 को पंजाब के पठानकोट ज़िले के गाँव शाहपुर कण्डी में हुआ। उन्होंने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर से बी.एस.सी. तथा जम्मू यूनिवर्सिटी के रामिष्ट कॉलेज से बी.एड. किया। कुछ समय तक अध्यापन करने के बाद वो अपना व्यवसाय करने लगे।

Book Details

  • ISBN
    9789394494794
  • Pages
    106
  • Avg Reading Time
    4 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Dhoop Mein Baithne Ke Din Aaye is the first poetry collection by Sunil Aaftab, a poet representing the new generation of Urdu-Hindi shayari emerging from Punjab. Born in Shahpur Kandi, Pathankot district, on 23 November 1976, Aaftab draws from the soil of rural Punjab to craft verse that is tender, subdued, and deceptively simple. His language is accessible, yet the emotional residue it leaves in the reader is distinct and quietly profound. This debut marks the arrival of a voice that does not announce itself loudly but earns attention through sincerity and restraint. Educated at Guru Nanak Dev University, Amritsar, and Rameshwaram College, Jammu, Aaftab writes with the intimacy of someone who has lived closely with landscape, memory, and the passage of ordinary days. For readers seeking poetry that feels like sunlight filtered through memory, this collection offers a luminous introduction to a poet whose reputation is steadily building among those attuned to contemporary Urdu expression in India.

धूप में बैठने के दिन आए पढ़ने से मुझे कैसा अनुभव मिलेगा?

यह संग्रह आपको एक कोमल, शांत और आत्मीय अनुभव देगा। सुनील आफ़ताब की शायरी धीमे लहजे में बात करती है, जैसे कोई पुरानी याद या सर्दियों की धूप। पढ़ते समय आपको जल्दबाजी नहीं, बल्कि ठहराव और सोच का मौका मिलेगा। यह वह किताब है जो शोर नहीं मचाती, बल्कि दिल में धीरे से उतरती है और देर तक रहती है।

यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है?

यह संग्रह उन पाठकों के लिए है जो सादा ज़बान और गहरे एहसास को तरजीह देते हैं। अगर आप उर्दू-हिंदी शायरी में नई आवाज़ों की तलाश में हैं, या पंजाब की मिट्टी और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े भावों में दिलचस्पी रखते हैं, तो यह किताब आपके लिए है। नए पाठक भी इसे आसानी से समझ सकते हैं क्योंकि भाषा सहज है।

इस किताब का विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?

यह संग्रह पंजाब की धरती और नई पीढ़ी की उर्दू शायरी को जोड़ता है, जो आज के भारत में बहुभाषी साहित्यिक पहचान का हिस्साा है। सुनील आफ़ताब जैसे शायर दिखाते हैं कि उर्दू सिर्फ़ अतीत की भाषा नहीं, बल्कि समकालीन भावनाओं को व्यक्त करने का ज़िंदा माध्यम है। यह किताब ग्रामीण अनुभवों और आधुनिक संवेदनाओं के बीच पुल बनाती है।

सुनील आफ़ताब का लहज़ा और शैली इस विषय को कैसे अलग बनाती है?

सुनील आफ़ताब का लहज़ा नाज़ुक और मद्धम है—वे चीख़ते नहीं, फुसफुसाते हैं। उनकी सादा ज़बान किसी तकल्लुफ़ या भारी अलंकार की मोहताज नहीं, फिर भी गहरा असर छोड़ती है। यह पहला मज्मूआ होने के बावजूद परिपक्व आवाज़ सुनाई देता है। वे रोज़मर्रा के एहसासात को इस तरह बयान करते हैं कि पाठक उनमें अपनी परछाई देख सके।

यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या रह जाता है?

  • एक शांत, सुकून भरा एहसास जो शोर-शराबे वाली दुनिया में दुर्लभ है
  • पंजाब की मिट्टी, धूप और यादों से जुड़ी एक दृश्य स्मृति
  • सादगी में छिपी गहराई की समझ—कि कविता हमेशा जटिल होना ज़रूरी नहीं
  • नई पीढ़ी की उर्दू शायरी के प्रति जिज्ञासा और सम्मान

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