Dheemi Aanch Ka Sitara

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Author:

Zeb Gauri

Language:

Hindi

Category:

Poetry

199

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जदीद उर्दू ग़ज़ल के नुमाइन्दा शायर ज़ेब ग़ौरी (ख़ान अहमद हुसैन ख़ाँ) 1930 में कानपुर में ख़ान अनवर हुसैन ख़ाँ के घर पैदा हुए। उन्होंने क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर से बी.ए. पास किया और उस्ताद साक़िब कानपुरी से शायरी की बारीकियाँ सीखीं। उन्होंने पहले कानपुर के ही विक्टोरिया मिल में अफ़सर के पद पर और उसके बाद सऊदी एयरलाइंस में प्रशासक के पद पर काम किया। ज़ेब ग़ौरी की शायरी में इस्तिआरे, अलामतें, फ़िक्र की पेचीदगी और अल्फ़ाज़ का तख़लीक़ी इस्तेमाल अपने पूरे रंग में नज़र आता है। उनकी शायरी के मुरीद हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में मौजूद हैं और उनके उस्लूब को सरहद के दोनों तरफ़ के शायरों और आलोचकों ने ख़ूब सराहा है। उनका पहला ग़ज़ल-संग्रह “ज़र्द ज़रखेज़” अक्टूबर 1976 में शब-ख़ून किताबघर, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ। 1 अगस्त, 1985 को उन्होंने कराची, पाकिस्तान में आख़िरी साँस ली। उनके इन्तिक़ाल के फ़ौरन बाद 1985 ही में उनकी दो और किताबें “चाक” कराची से और “ज़रताब” कानपुर, हिन्दुस्तान से शाए हुईं।

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ISBN
9789394494381
Pages
107
Avg Reading Time
4 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

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About the Book

जदीद उर्दू ग़ज़ल के नुमाइन्दा शायर ज़ेब ग़ौरी (ख़ान अहमद हुसैन ख़ाँ) 1930 में कानपुर में ख़ान अनवर हुसैन ख़ाँ के घर पैदा हुए। उन्होंने क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर से बी.ए. पास किया और उस्ताद साक़िब कानपुरी से शायरी की बारीकियाँ सीखीं। उन्होंने पहले कानपुर के ही विक्टोरिया मिल में अफ़सर के पद पर और उसके बाद सऊदी एयरलाइंस में प्रशासक के पद पर काम किया। ज़ेब ग़ौरी की शायरी में इस्तिआरे, अलामतें, फ़िक्र की पेचीदगी और अल्फ़ाज़ का तख़लीक़ी इस्तेमाल अपने पूरे रंग में नज़र आता है। उनकी शायरी के मुरीद हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में मौजूद हैं और उनके उस्लूब को सरहद के दोनों तरफ़ के शायरों और आलोचकों ने ख़ूब सराहा है। उनका पहला ग़ज़ल-संग्रह “ज़र्द ज़रखेज़” अक्टूबर 1976 में शब-ख़ून किताबघर, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ। 1 अगस्त, 1985 को उन्होंने कराची, पाकिस्तान में आख़िरी साँस ली। उनके इन्तिक़ाल के फ़ौरन बाद 1985 ही में उनकी दो और किताबें “चाक” कराची से और “ज़रताब” कानपुर, हिन्दुस्तान से शाए हुईं।

Book Details

  • ISBN
    9789394494381
  • Pages
    107
  • Avg Reading Time
    4 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Dheemi Aanch Ka Sitara captures the poetic vision of Zeb Gauri (Khan Ahmad Husain Khan, 1930–), a defining voice in modern Urdu ghazal. Born in Kanpur and trained under Ustad Saqib Kanpuri, Gauri brought industrial-age sensibility to the classical form. His ghazals are marked by istiaare (metaphor), alamat (symbol), and the inventive deployment of language that refuses ornament for its own sake. Working as an administrator at Saudi Airlines after years at Victoria Mill, Gauri wrote from the tension between tradition and modernity, devotion and displacement.

This collection presents ghazals that resist easy sentiment. Gauri's couplets layer meaning across registers, rewarding readers who return to them. Published by Rekhta Publications, the volume serves both as archive and invitation — a slow-burning star, as the title suggests, whose light arrives long after ignition.

यह किताब पढ़कर मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?

यह किताब आपको धीमी, गहरी और विचारशील पठन यात्रा देगी। ज़ेब ग़ौरी के शेर पहली बार में सरल लगते हैं, लेकिन हर शेर में छिपे इस्तिआरे और अलामतें आपको बार-बार लौटने पर मजबूर करती हैं। यह भावुकता से ज़्यादा बौद्धिक संतोष देने वाली ग़ज़लों का संग्रह है, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच तनाव को महसूस कराता है।

यह किताब किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?

  • जो पाठक शास्त्रीय उर्दू ग़ज़ल की बारीकियों को समझते हैं और आधुनिक भाषा प्रयोग में रुचि रखते हैं
  • जो कानपुर या औद्योगिक भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़े हैं
  • जो काव्य में सतही भावुकता से अधिक गहन अर्थ-परतें खोजना पसंद करते हैं
  • जो उस्ताद साक़िब कानपुरी की परंपरा और उनके शागिर्दों की शैली का अध्ययन कर रहे हैं

इस किताब के विषय का आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व क्या है?

ज़ेब ग़ौरी की शायरी उस दौर की आवाज़ है जब कानपुर जैसे औद्योगिक शहरों में परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष चरम पर था। उनकी ग़ज़लें उर्दू को क्लासिकी जड़ता से मुक्त कर समकालीन भावनाओं के लिए भाषा बनाती हैं। आज जब उर्दू शायरी फिर से युवा पीढ़ी में लोकप्रिय हो रही है, ग़ौरी का काम यह दिखाता है कि ग़ज़ल सिर्फ़ इश्क़ नहीं, बौद्धिक और सामाजिक यथार्थ भी व्यक्त कर सकती है।

इस विषय पर ज़ेब ग़ौरी का व्यवहार क्या विशिष्ट बनाता है?

ज़ेब ग़ौरी ने इस्तिआरे और अलामतों का तख़लीक़ी इस्तेमाल करके ग़ज़ल को नई भाषाई संभावनाएँ दीं। वे सीधे जज़्बात बयान नहीं करते, बल्कि प्रतीकों की परतों में अर्थ छिपाते हैं। उस्ताद साक़िब कानपुरी की तालीम और औद्योगिक जीवन के अनुभव ने उनकी आवाज़ को क्लासिकी परंपरा में रहते हुए भी अलग पहचान दी। उनके शेरों में फ़िक्र की पेचीदगी है, जो सरल ग़ज़लकारों से उन्हें अलग करती है।

किताब ख़त्म होने के बाद पाठक के मन में क्या रह जाता है?

यह किताब आपको भाषा की शक्ति और उसकी सीमाओं के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। ज़ेब ग़ौरी के शेर दिमाग़ में धीरे-धीरे खुलते हैं, जैसे धीमी आंच पर पकता हुआ कोई व्यंजन। पाठक के पास उर्दू शायरी की आधुनिकता की गहरी समझ, प्रतीकों को पढ़ने की नई दृष्टि, और यह अहसास रह जाता है कि ग़ज़ल सिर्फ़ पारंपरिक विषयों तक सीमित नहीं है — वह समकालीन जटिलताओं को भी अभिव्यक्त कर सकती है।

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