Mai Behoshi Ka Ek Patthar Tha
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अपने दूसरे कविता संग्रह में वीरू सोनकर थोड़ी अप्रत्याशित परिपक्वता के साथ सामने आ रहे हैं। उनकी कविता में अदम्य आवेग, अपने समय और सभ्यता के रूपों-विद्रूपों और सौन्दर्य और अन्याय की बेरहम शिनाख्त, भाषा और कविता में तेज़ी से फैल रहे रूमानों से अपने को अलग करने की सजगता, बाहर और भीतर के तादात्म्य की अवसन्न पहचान अब पूरी प्रखरता और नवाचार में जाहिर हैं। उनमें दुस्साहस है पर उनकी कविता को मार्मिक विलाप की तरह पढ़ा जा सकता है। अपनी कविता में वे अपनी और आज की सचाई का सामना करने से नहीं हिचकिचाते और कभी अपने क्षोभ में कविता को गाली तक बनाने की हद तक चले जाते हैं। जो भी हो, वे एक भरेपूरे कवि हैं जो उनके एक क्षुब्ध, संवेदनशील, साहसी, सजग आदमी होने का ही एक संस्करण है। वीरू के यहाँ सहना और भाषा दोनों जब-तब कलंक बन जाते हैं। ऐसा भी लग सकता है कि हमारे समय में लगातार हो रहे विध्वंस के बरक्स वे भग्नावशेष में भटकते कवि हैं । यह कविता हमें पुकारती है, हमारे और अपने किये धरे पर विलाप करती है, हमें अनेक विद्रूप और विडम्बनाओं की चिन्हार कराती है, हमें भाषा में नये इलाकों में ले जाती है और हमें आश्वस्त करती है कि इस अभागे समय में भी कविता कुछ कर सकती है। अशोक वाजपेयी प्रसिद्ध साहित्यकार
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अपने दूसरे कविता संग्रह में वीरू सोनकर थोड़ी अप्रत्याशित परिपक्वता के साथ सामने आ रहे हैं। उनकी कविता में अदम्य आवेग, अपने समय और सभ्यता के रूपों-विद्रूपों और सौन्दर्य और अन्याय की बेरहम शिनाख्त, भाषा और कविता में तेज़ी से फैल रहे रूमानों से अपने को अलग करने की सजगता, बाहर और भीतर के तादात्म्य की अवसन्न पहचान अब पूरी प्रखरता और नवाचार में जाहिर हैं। उनमें दुस्साहस है पर उनकी कविता को मार्मिक विलाप की तरह पढ़ा जा सकता है। अपनी कविता में वे अपनी और आज की सचाई का सामना करने से नहीं हिचकिचाते और कभी अपने क्षोभ में कविता को गाली तक बनाने की हद तक चले जाते हैं। जो भी हो, वे एक भरेपूरे कवि हैं जो उनके एक क्षुब्ध, संवेदनशील, साहसी, सजग आदमी होने का ही एक संस्करण है। वीरू के यहाँ सहना और भाषा दोनों जब-तब कलंक बन जाते हैं। ऐसा भी लग सकता है कि हमारे समय में लगातार हो रहे विध्वंस के बरक्स वे भग्नावशेष में भटकते कवि हैं । यह कविता हमें पुकारती है, हमारे और अपने किये धरे पर विलाप करती है, हमें अनेक विद्रूप और विडम्बनाओं की चिन्हार कराती है, हमें भाषा में नये इलाकों में ले जाती है और हमें आश्वस्त करती है कि इस अभागे समय में भी कविता कुछ कर सकती है। अशोक वाजपेयी प्रसिद्ध साहित्यकार
Book Details
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ISBN9789347125966
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Pages160
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Avg Reading Time5 hrs
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Age0-11 yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: श्री' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ओजस्वी कविताओं का संग्रह है। कविताओं में प्रखर राष्ट्रवाद, प्रकृति के प्रति उत्कट प्रेम एवं मानव-कल्याण-कामना की मंगल-भावना के दर्शन होते हैं। 'कविश्री' में संगृहीत हैं दिनकर जी की 'हिमालय के प्रति', 'प्रभाती', 'व्याल विजय' एवं 'नया मनुष्य' जैसी प्रसिद्ध प्रदीर्घ कविताएँ, जो हिन्दी काव्य-साहित्य की अमूल्य निधि हैं। दिनकर का काव्य-व्यक्तित्व जिस दौर में निर्मित हुआ, वह राजसत्ता और शोषण के विरुद्ध हर मोर्चे पर संघर्ष का दौर था। इसलिए 'कविश्री' में संकलित रचनाओं को पढ़ना भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में साहित्य के योगदान से भी परिचित होना है। अपने ऐतिहासिक महत्त्व के कारण पाठकों के लिए एक संग्रहणीय और अविस्मरणीय संग्रह।
Kitabon mein Billi ne Bachche Diye Hain
- Author Name:
Sarveshwardayal Saxena +1
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- Description: इब्न बतूता पहन के जूता, निकल पड़े तूफान में थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में Only a great poet such as Sarveshwar Dayal Saxena can write a poem for children about going into a storm. Not a regular storm, but a storm that can break you into two. Stopping only to repair his shoes, Ibn Batuta enters storm after storm. The poem rekindles memories of Ibn Battuta's courageous travels from Morocco to India as it brings life to the rhymes for children. All poems in this collection are equally remarkable. For instance, read the following poem, crisp composition with a breezy rhyme: महँगू ने महँगाई में, पैसे फूँके टाई में While poems' temperament rises and falls, Debabrata Ghosh's illustrations are quiet and serene. The green in these illustrations is at its quietest, and so is the colour blue. Age group 6-8 years
Archna
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
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Description:
‘अर्चना’ निराला की परवर्ती काव्य-चरण की प्रथम कृति है। इसके प्रकाशन के बाद कुछ आलोचकों ने इसमें उनका प्रत्यावर्तन देखा था। लेकिन सच्चाई यह है कि जैसे ‘बेला’ के गीत अपनी धज में ‘गीतिका’ के गीतों से भिन्न हैं, वैसे ही ‘अर्चना’ के गीत भी
‘गीतिका’ ही नहीं, ‘बेला’ के गीतों से भिन्न हैं। इस संग्रह की समीक्षा करते हुए श्रीनरेश मेहता ने लिखा था कि यह निराला की ‘विनयपत्रिका’ है। निश्चय ही इसके अधिसंख्यक गीत धर्म-भावना नहीं है। यहाँ हमें मार्क्स की यह उक्ति याद करनी चाहिए : ‘धार्मिक वेदना एक साथ ही वास्तविक वेदना की अभिव्यक्ति और वास्तविक वेदना के विरुद्ध विद्रोह भी है। अकारण नहीं कि ‘अर्चना’ के भक्तिभाव से भरे हुए गीत स्वातंत्र्योत्तर भारत के यथार्थ को बहुत तीखे ढंग से हमारे सामने लाते हैं, यथा—‘आशा-आशा मरे/लोग देश के हरे!’ ‘निविड़ विपिन, पथ अराल;/भरे हिंस्र जन्तु-व्याल’ आदि गीत।
पहले की तरह ही अनेक गीतों में निराला का स्वर स्पष्टत: आत्मपरक है, जैसे ‘तरणी तार दो/अपर पार को!’ ‘प्रिय के हाथ लगाए जगी,/ ऐसी मैं सो गई अभागी।’ ऐसे सरल प्रेमपरक गीत हमें उनमें पहले नहीं मिलते! प्रकृति से भी उनका लगाव हर दौर में बना रहता है। यह बात ‘आज प्रथम गाई पिक पंचम’ और ‘फूटे हैं आमों में बौरे’ ध्रुवकवाले गीतों में दिखलाई पड़ती है।
‘अर्चना’ में ऐसे गीत भी हैं, जो इस बात की सूचना देते हैं कि कवि अब महानगर और नगरों को छोड़कर अपने गाँव आ गया है। उनका कालजयी और अपनी सरलता में बेमिसाल गीत ‘बाँधो न नाव इस ठाँव, बन्धु!/पूछेगा सारा गाँव, बन्धु’ ‘अर्चना’ की ही रचना है, जिसमें गाँव की एक घटना के सौन्दर्यात्मक पक्ष का चित्रण किया गया है।
—नन्दकिशोर नवल
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