Charag Dar Charag

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Author:

Vikas Gupta

Language:

Hindi

Category:

Poetry

349

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उर्दू शाइ’री ही नहीं, दुनिया की सभी ज़बानों के अदब में चराग़ से चराग़ जलाने की रिवायत पायी जाती है। जिस तरह लफ़्ज़ से लफ़्ज़ बनते हैं, मा’नी से मा’नी निकलते हैं, बिल्कुल इसी तरह शे’र से शे’र बनते हैं। उर्दू शाइ’री में उस्ताद शायरों की ज़मीनों में ग़ज़लें कहने की रिवायत रही है। ये रिवायत फ़ारसी से सीधे दकनी ग़ज़ल में आई जो आज की उर्दू ग़ज़ल में भी प्रचलित है। इस किताब में उस्ताद शायरों की ज़मीनों में उनकी अगली नस्ल के शायरों की कही गईं ग़ज़लें संकलित की गई हैं। विकास गुप्ता उर्दू के नौजवान स्कॉलर हैं। उनकी ज़ेहानत, उर्दू शे’र-ओ-अदब पर उनकी दस्तरस और उनके हाफ़िज़े के बारे में कुछ कहना शायद मुबालग़ा समझा जाए। मज़हर इमाम (मरहूम) ने उनके बारे में लिखा है कि अदब का इतना गहरा इ’ल्म और शुऊ’र रखने वाले शाज़-ओ-नादिर ही मिलते हैं।

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ISBN
9789394494206
Pages
200
Avg Reading Time
7 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

Express Delivery

Secure Payment

About the Book

उर्दू शाइ’री ही नहीं, दुनिया की सभी ज़बानों के अदब में चराग़ से चराग़ जलाने की रिवायत पायी जाती है। जिस तरह लफ़्ज़ से लफ़्ज़ बनते हैं, मा’नी से मा’नी निकलते हैं, बिल्कुल इसी तरह शे’र से शे’र बनते हैं। उर्दू शाइ’री में उस्ताद शायरों की ज़मीनों में ग़ज़लें कहने की रिवायत रही है। ये रिवायत फ़ारसी से सीधे दकनी ग़ज़ल में आई जो आज की उर्दू ग़ज़ल में भी प्रचलित है। इस किताब में उस्ताद शायरों की ज़मीनों में उनकी अगली नस्ल के शायरों की कही गईं ग़ज़लें संकलित की गई हैं। विकास गुप्ता उर्दू के नौजवान स्कॉलर हैं। उनकी ज़ेहानत, उर्दू शे’र-ओ-अदब पर उनकी दस्तरस और उनके हाफ़िज़े के बारे में कुछ कहना शायद मुबालग़ा समझा जाए। मज़हर इमाम (मरहूम) ने उनके बारे में लिखा है कि अदब का इतना गहरा इ’ल्म और शुऊ’र रखने वाले शाज़-ओ-नादिर ही मिलते हैं।

Book Details

  • ISBN
    9789394494206
  • Pages
    200
  • Avg Reading Time
    7 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Charag Dar Charag preserves a centuries-old Urdu practice: composing new ghazals in the exact metrical frameworks (zamīn) of master poets. What sets this anthology apart is its explicit lineage mapping—each poem answers a predecessor, making visible the chain of influence that runs from Persian roots through Deccani courts into contemporary Urdu verse. Scholar Vikas Gupta curates pairs across generations, showing not imitation but reinvention: how a younger poet takes an ustād's rhythmic skeleton and fills it with new imagery, new emotion, new context. This is not a historical archive but a living workshop—readers encounter the technique behind taqlīd (emulation) and witness how classical metres survive by evolving. For students of Urdu prosody and lovers of ghazal craftsmanship, the book offers rare insight into the mechanics of poetic inheritance, where "lighting one lamp from another" is both metaphor and method.

यह किताब पढ़कर मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?

यह किताब आपको उर्दू शाइ'री की एक अनोखी कार्यशाला में ले जाती है जहाँ आप उस्ताद और शागिर्द की परम्परा को महसूस करते हैं। हर ग़ज़ल एक पुरानी ज़मीन में नए मा'नी भरती है—जैसे किसी पुराने राग में नई बंदिश। यह पाठन धीमा, चिंतनशील है—आप लय और तकनीक दोनों को समझते हुए आगे बढ़ते हैं, और हर जोड़ी में पुरानी और नई आवाज़ का संवाद सुनते हैं।

यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए क्या तैयारी चाहिए?

  • उन पाठकों के लिए जो उर्दू छंदशास्त्र (अरूज़) और बह्र की बारीकियों में रुचि रखते हैं।
  • शाइ'री के विद्यार्थियों के लिए जो परम्परागत ज़मीनों में रचना करना सीखना चाहते हैं।
  • ग़ज़ल के इतिहास और पीढ़ी-दर-पीढ़ी बदलाव को समझने की इच्छा रखने वालों के लिए।
  • कुछ उर्दू पढ़ने की क्षमता और शाइ'री के मूल रूप की जानकारी सहायक होगी।

आज के भारतीय पाठकों के लिए इस किताब के विषय का सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्त्व क्या है?

आज जब उर्दू शाइ'री में नए प्रयोग और मुक्त छंद का चलन बढ़ा है, यह किताब याद दिलाती है कि परम्परा में नवीनता कैसे संभव है। फ़ारसी से दकनी, फिर आधुनिक उर्दू तक यात्रा करती इस प्रथा में भारतीय मुस्लिम साहित्यिक विरासत की निरन्तरता दिखती है। यह केवल अतीत की नक़ल नहीं—बल्कि हर युग की आवाज़ को पुराने साँचे में ढालकर ज़िंदा रखने की कला है, जो आज भी प्रासंगिक है।

विकास गुप्ता का संकलन इस विषय को कैसे अलग तरीक़े से पेश करता है?

विकास गुप्ता ने इस किताब में केवल ग़ज़लें इकट्ठी नहीं कीं—उन्होंने हर ग़ज़ल के साथ उसकी मूल ज़मीन और उस्ताद की पहचान स्पष्ट की है। यह वंशावली-आधार संपादन पाठक को सीधे तुलना करने देता है—कौन सी लय, कौन सा शिल्प पीढ़ियों में बचा, कौन सा बदला। यह अकादमिक स्पष्टता आम संकलनों में नहीं मिलती, जिससे यह पुस्तक शोध और शिक्षण दोनों के लिए उपयोगी बनती है।

पुस्तक ख़त्म करने के बाद पाठक के मन में क्या बचता है—भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से?

  • यह समझ कि परम्परा गतिशील है—हर नस्ल अपने समय की भाषा में पुराने छंद को फिर से जीती है।
  • उर्दू शाइ'री की तकनीकी बुनावट की गहरी सराहना—कैसे बह्र और क़ाफ़िया केवल नियम नहीं, बल्कि रचनात्मकता के उपकरण हैं।
  • एक सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव, जहाँ गुरु-शिष्य की परम्परा केवल संगीत में नहीं, शाइ'री में भी जीवित है।

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