Aakhri Paher Ki Dastak
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शमीम हनफ़ी की ग़ज़लें अँधेरे और परछाईं, रंगों के ढलने, भारी पलकें और दुखों की बात करती हैं, लेकिन कभी वैराग्य की बात नहीं करतीं। उनकी ग़ज़लें एक भावनात्मक दृश्य को उकेरती हैं जिसका एक हिस्सा कई बार वो ख़ुद भी होते हैं। शमीम हनफ़ी अपने शब्दों को गहरे गहरे रंगों में रंगते हैं। उनके विचारों को समझने के लिए गहराई में तैरने की जरूरत है। `आख़िरी पहर की दस्तक` उर्दू भाषा के प्रसिद्ध साहित्यालोचक `शमीम हनफ़ी` की आख़िरी कृति है। उनकी काव्य-रचना की दुनिया में परम्परा की लगातार अन्तर्ध्वनियाँ हैं और नयी रंगतें भी। कविता की सीमाओं का तीख़ा अहसास भी उनके यहाँ हैं।
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शमीम हनफ़ी की ग़ज़लें अँधेरे और परछाईं, रंगों के ढलने, भारी पलकें और दुखों की बात करती हैं, लेकिन कभी वैराग्य की बात नहीं करतीं। उनकी ग़ज़लें एक भावनात्मक दृश्य को उकेरती हैं जिसका एक हिस्सा कई बार वो ख़ुद भी होते हैं। शमीम हनफ़ी अपने शब्दों को गहरे गहरे रंगों में रंगते हैं। उनके विचारों को समझने के लिए गहराई में तैरने की जरूरत है। `आख़िरी पहर की दस्तक` उर्दू भाषा के प्रसिद्ध साहित्यालोचक `शमीम हनफ़ी` की आख़िरी कृति है। उनकी काव्य-रचना की दुनिया में परम्परा की लगातार अन्तर्ध्वनियाँ हैं और नयी रंगतें भी। कविता की सीमाओं का तीख़ा अहसास भी उनके यहाँ हैं।
Book Details
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ISBN9788192664804
-
Pages174
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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मनुष्य हो सकने की आकांक्षाजन्य रचनात्मकता से अपना उत्स पाती हैं। यही कारण है कि कवि
अपने अवसाद के क्षणों में भी, सर्जनात्मकता को सम्भव कर पाता है।
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और जीवन के बीच उपस्थित रूढ़ि, अन्धश्रद्धा और अन्धविश्वास की वे स्थूल रूप में नहीं, उनके
सूक्ष्म विध्वंसकारी रूप में पहचान करती हैं। कवि की दृष्टि अपनी सहजता में जीवन के सौन्दर्य
को, जीवन की अमरता को चुन लेती है और चीज़ों की रहस्यात्मकता को व्यर्थ कर देती है। वहाँ
‘निर्वाण की आभा की चमक’ में अन्तर्निहित उपहास, काव्य-शक्ति का उदाहरण हो जाता है। इन
कविताओं में शोरगुल को संयम से बताने का धीरज है, चीज़ों को बहुत क़रीब से देखने का उपक्रम
है और वह दृढ़ता भी है जो ‘झंडा उठाए अकेले आदमी’ की सहायता को एक अनन्त जिजीविषा में
बदल देती
है।
यह सब नारेबाजी अथवा सतही राजनीतिक शब्दावली से नहीं, कवि की जीवन में निष्ठा और
प्रतिबद्धता से सम्भव हुआ है, इस बात के सूत्र इस संग्रह की कविताओं में बार-बार मिलते हैं। ‘वह
एक घर था ऐसा’, ‘जुलूस’, ‘विस्थापन’, ‘इस तरह थे हम वहाँ’ जैसी कविताएँ हमारे परिवार और
समाज में लगातार बढ़ती जा रही यंत्रणा और अलगाव की ट्रेजडी की गहन पड़ताल ही नहीं करतीं,
बल्कि ‘ऐसा नहीं होना चाहिए’—इस उत्कट इच्छा का भी प्रकटीकरण करती हुई चलती हैं। एक युवा
कवि के पहले ही संग्रह में भाषा का संयम, शब्दों से नए अर्थ ले सकने की क्षमता, एक पंक्ति से
दूसरी पंक्ति के बीच लम्बी दिखनेवाली कठिन दूरी तय करने का सहज सामर्थ्य और इन सबके बीच
की जगहों में कविता का रचाव देखना सुखद प्रतीति है। अपने समय की पहचान करने का
विश्वसनीय प्रयास भी इन कविताओं में है। ‘न्याय को सबसे क्रूर और ख़तरनाक हथियार में बदल60
देने’ वाले इस समय में ‘मृत्यु के भय के बीच प्रेम की सम्भावना’ को टटोलते हुए यह भी समझना
कि ‘अब वैसा कुछ भी नहीं है, जो जैसा दिखाई देता है’ और ‘अकेले पड़ते जाने की नियति को’
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