Ujali Nagari Chatur Raja
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‘उजली नगरी चतुर राजा’ यशस्वी कथाकार मन्नू भंडारी की नई नाट्य-कृति है। सामाजिक विसंगतियों, विरूपताओं व अव्यवस्था का विरोध उनकी अनेक रचनाओं का केन्द्रीय स्वर रहा है। इस सन्दर्भ में उनके अत्यन्त चर्चित उपन्यास 'महाभोज' का स्मरण किया जा सकता है।</p> <p>प्रस्तुत नाटक सत्ता और व्यवस्था में गहरे तक पैठ चुके भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-आक्रोश को अभिव्यक्ति देता है। समकालीन जीवन की अनेक स्थितियाँ और घटनाएँ इसमें अनुभव की जा सकती हैं।</p> <p>इस नाटक का शीर्षक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कृत 'अंधेर नगरी चौपट राजा' पर एक रचनात्मक टिप्पणी है। उजास व चतुराई जैसे शब्दों का एक भिन्न अर्थ मन्नू भंडारी ने रेखांकित किया है। व्यंजना यह है कि आज अनेक सकारात्मक शब्दों, प्रतीकों और धारणाओं को निहित स्वार्थ ने भ्रष्ट कर दिया है।</p> <p>आठ दृश्यों में विभक्त 'उजली नगरी चतुर राजा' के पात्रों राजा, बड़ा मंत्री, छोटा मंत्री, खजांची, नगर मंत्री, खोजी और हिम्मती आदि में परिचित चरित्रों की अनुगूँज है। लोकतंत्र, चुनाव, महँगाई, भ्रष्टाचार, असुरक्षा आदि मुद्दों पर यह नाटक व्यापक विमर्श का प्रस्ताव रखता है। जन-प्रतिरोध के स्वर इन शब्दों में मुखर हैं—</p> <p>‘न करेगा अब कोई फ़रियाद,</p> <p>न फैलाएगा राजा के आगे हाथ!</p> <p>जो अधिकार हमारे हैं, उन्हें तो हम लेके रहेंगे।'</p> <p>प्रासंगिक व प्रभावी कथ्य के साथ भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी यह नाटक उल्लेखनीय है। मौलिक नाट्यालेखों की कमी को पूरा करती प्रस्तुत कृति पाठकों व रंगकर्मियों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।
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‘उजली नगरी चतुर राजा’ यशस्वी कथाकार मन्नू भंडारी की नई नाट्य-कृति है। सामाजिक विसंगतियों, विरूपताओं व अव्यवस्था का विरोध उनकी अनेक रचनाओं का केन्द्रीय स्वर रहा है। इस सन्दर्भ में उनके अत्यन्त चर्चित उपन्यास 'महाभोज' का स्मरण किया जा सकता है।</p>
<p>प्रस्तुत नाटक सत्ता और व्यवस्था में गहरे तक पैठ चुके भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-आक्रोश को अभिव्यक्ति देता है। समकालीन जीवन की अनेक स्थितियाँ और घटनाएँ इसमें अनुभव की जा सकती हैं।</p>
<p>इस नाटक का शीर्षक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कृत 'अंधेर नगरी चौपट राजा' पर एक रचनात्मक टिप्पणी है। उजास व चतुराई जैसे शब्दों का एक भिन्न अर्थ मन्नू भंडारी ने रेखांकित किया है। व्यंजना यह है कि आज अनेक सकारात्मक शब्दों, प्रतीकों और धारणाओं को निहित स्वार्थ ने भ्रष्ट कर दिया है।</p>
<p>आठ दृश्यों में विभक्त 'उजली नगरी चतुर राजा' के पात्रों राजा, बड़ा मंत्री, छोटा मंत्री, खजांची, नगर मंत्री, खोजी और हिम्मती आदि में परिचित चरित्रों की अनुगूँज है। लोकतंत्र, चुनाव, महँगाई, भ्रष्टाचार, असुरक्षा आदि मुद्दों पर यह नाटक व्यापक विमर्श का प्रस्ताव रखता है। जन-प्रतिरोध के स्वर इन शब्दों में मुखर हैं—</p>
<p>‘न करेगा अब कोई फ़रियाद,</p>
<p>न फैलाएगा राजा के आगे हाथ!</p>
<p>जो अधिकार हमारे हैं, उन्हें तो हम लेके रहेंगे।'</p>
<p>प्रासंगिक व प्रभावी कथ्य के साथ भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी यह नाटक उल्लेखनीय है। मौलिक नाट्यालेखों की कमी को पूरा करती प्रस्तुत कृति पाठकों व रंगकर्मियों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।
Book Details
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ISBN9788183616331
-
Pages100
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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तीन एकान्त निर्मल वर्मा की तीन कहानियों (‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘डेढ़ इंच ऊपर’ और ‘वीक-एंड’) का नाट्य-पाठ है जिसका मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रेपर्टरी कम्पनी ने 1975 में किया था। ‘कहानी का रंगमंच’ के प्रणेता देवेन्द्र राज अंकुर इस चर्चित प्रस्तुति के निर्देशक थे।
इन कहानियों और उनके इस नाट्य-पाठ के सम्बन्ध में उल्लेखनीय यह है कि यह उन कहानियों का नाट्य-रूपान्तर नहीं है, कहानियों के मूल पाठ की तस-की-तस प्रस्तुति है जिसमें मंच पर कहानी की नाटकीयता को सामने लाने के लिए निर्देशकीय संकेत और मंच-विवरण जोड़ दिए गए हैं।
तीनों ही कहानियाँ ‘मोनोलॉग’ हैं जो स्मृति में आकार ग्रहण करती हैं और एक व्यक्ति के एक लम्बे संवाद के रूप में खुलती हैं। निर्मल जी के शब्दों में ‘उनके बीच एकमात्र समानता यह थी कि वे मोनोलॉग स्वर में रची गई थीं, जब अकेलेपन के क्षणों में व्यक्ति अपने से ही बोलने लगता है। ...परम्परागत अर्थ में इसे नाटकीय संवाद नहीं कहा जा सकता। किन्तु जो शब्द अपने से कहे जाते हैं, वहाँ ‘स्व’ ही लड़ाई का मैदान बन जाता है...।’
अपने समय के समर्थ अभिनेताओं ने इस आत्मसंघर्ष को जिस सम्पूर्णता में साकार किया था, वह इस पाठ में भी दिखाई देता है। अपने निर्देशकीय वक्तव्य में देवेन्द्र राज अंकुर इन्हें ‘अकेलेपन के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं से साक्षात्कार की कहानियाँ’ कहते हैं। इसी को रेखांकित करने के लिए प्रस्तुतियों को एक सम्मिलित नाम ‘थ्री टेक्स्ट्स इन सॉलिट्यूड’ दिया गया था।
Harit Nongjabi
- Author Name:
Maharaj Kumari Binodini Devi
- Book Type:

- Description: ‘हरित नोङ्जाबी’ महाराज कुमारी बिनोदिनी देवी का बहुचर्चित नाटक है जिसकी सिर्फ उनके लेखन में नहीं अपितु आधुनिक मणिपुरी साहित्य में उल्लेखनीय स्थान है। ‘नोङ्जाबी’ शब्द का आशय वर्षा ऋतु में दिखाई देने वाले ताम्रवर्णी आभा से युक्त उन बादलों से है जिन्हें वर्षा ऋतु के विराम ले लेने का संकेत माना जाता है। वस्तुत: नोङ्बाजी का शाब्दिक अर्थ है—वर्षा या बादल का भक्षक जिसका प्रयोग लेखक ने प्रेम को खा जाने वाले समय और समाज को रूपायित करने के लिए किया है। बिनोदिनी इस नाटक में उस प्रतिगामिता को उजागर करती हैं जो न केवल प्रेम को बल्कि कला को भी हेय सिद्ध करने रीति-नीतियों का समर्थन करती है, और जीवन के प्रति रचनात्मक दृष्टि को हतोत्साहित करती हुई मनुष्य की रचनात्मकता को निरे उत्पादन में जोत देना चाहती है। इसके अलावा इस संकलन में दो रेडियो नाटक भी संकलित हैं जिनमें मणिपुरी समाज की स्थानीय परिस्थितियों, आकांक्षाओं और सपनों को कुशलतापूर्वक चित्रित किया गया है। हिन्दी में इन्हें प्रस्तुत करते हुए विशेष रूप से यह ध्यान में रखा गया है कि वे शब्द जो मणिपुरी जीवन व भाषा का आस्वाद हम तक पहुँचाते हैं, उन्हें जस-का-तस रखा जाए; और उनके अर्थ दे दिए गए हैं। सुरुचिपूर्ण ढंग से लिखित और उतनी ही सजगता से अनूदित मणिपुरी साहित्य की ये प्रतिनिधि रचनाएँ हिन्दी पाठकों को महत्त्वपूर्ण लगेंगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Pitamaha Bhishma
- Author Name:
Pt. Vijay Shankar Mehta
- Book Type:

- Description: यह नाटक ‘महाभारत’ या भीष्म पर आधारित ऐतिहासिक कथा-चिंतन ही नहीं, वरन् भीष्म के माध्यम से हमारे स्वविवेक, उसकी महत्त्वाकांक्षा एवं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सीधे जीवन व चिंतन पर पड़नेवाले प्रभाव की व्याख्या है। वहीं सृष्टि के आरंभ से अब तक के सबसे जटिल मानवीय संबंध ‘स्त्री-पुरुष’ के संदर्भ में इस नाटक को मिथकीय रूपाकारों के माध्यम से आधुनिक चेतना-बोध एवं प्रश्नों को जोड़ने का यत्न है। इस नाटक में भीष्म को दो रूपों में प्रस्तुत किया गया है—देह और अंतर्मन। इसलिए प्रस्तुति में देह कभी अंतर्मन हो सकता है तो अंतर्मन कभी देहाकार हो सकता है। इस नाटक के पात्रों में कहीं-न-कहीं हम अपने आप को पा सकते हैं। कुछ घटनाएँ हमारे जीवन से होकर भी इसी रूप में गुजरती हैं। पढ़ें तो विचार है, निहारें तो नाटक है और देखें तो दर्पण।
Paansa
- Author Name:
Gulzar
- Book Type:

- Description: ‘पाँसा’ जो इस किताब का पहला नाटक है, युधिष्ठिर और द्रौपदी के पेचीदा रिश्ते को लेकर लिखा गया है। एक भाई ने जीती, और पाँच भाइयों में बँटी द्रौपदी स्वयंवर जीतने वाले अर्जुन को नहीं, बड़ा होने के नाते युधिष्ठिर को पहले मिली; युधिष्ठिर जिसने उसे फिर जुए में दाँव पर भी लगाया, और हारा भी। आज भी, जब हम वक़्त में इतना आगे आ चुके हैं, इस रिश्ते को छूना आग को छूना है; इसके लिए गहरी ज़िम्मेदारी और समझदारी की दरकार है। यह नाटक जिसे पहले मशहूर समाज-चिन्तक और राजनयिक पवन कुमार वर्मा ने एक लम्बी कविता के तौर पर लिखा था, कविता के रूप में और ड्रामे के रूप में भी इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाता है; बिना उस तनाव को खोए जो इस कथा का अहम और ज़रूरी हिस्सा है। पवन कुमार वर्मा जैसे अपनी कविता में, वैसे ही गुलज़ार इस नाटक में वह करने में सफल रहे हैं जो सम्बन्धों के इस दुर्लभ समीकरण को लेकर किया जा सकता है। यानी वे द्रौपदी के यक्ष-प्रश्न को हमारे सामने खड़ा कर देते हैं और हम उसकी विडम्बना को लेकर नए सिरे से सोचना शुरू करते हैं। इसके साथ इस किताब में चार छोटे नाटक और हैं जिनमें टैगोर की कहानी ‘स्त्रीर पत्र’ पर आधारित ‘सुनते हो’ और अहमद नदीम क़ासमी की तीन कहानियों के आधार पर बुने हुए तीन ड्रामे ‘बाबा नूर’, ‘मुख़बिर’ और ‘आलाँ’ शामिल हैं। इन तीनों ही नाटकों में विभाजन से पहले का पंजाब नज़र आता है, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है।
Dharamguru
- Author Name:
Swarajbir
- Book Type:

- Description: यह नाटक उच्चस्तरीय बौद्धिक रचना का प्रमाण देता है। नाटककार ने पूरे धार्मिक व्यवहार पर जो कटाक्ष किया है, वह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। संवादों, घटनाओं तथा कार्यव्यापार के माध्यम से उभारा गया नाटकीय टकराव शिखर को छूता है। इस नाटक ‘धर्मगुरु’ की प्रस्तुति से पंजाबी नाटक नए क्षितिजों के द्वार खोलता है...। —गुरुशरण सिंह (नाटककार एवं निर्देशक) स्वराजबीर के नाटक पहली बार पंजाबी नाटक को उस नाट्य विधिविधान के साथ जोड़ते हैं जो भारतीय नाट्य रूप से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि ये नाटक अग्रदूत बनकर पंजाबी नाटक में पैदा हुई जड़ता को तोड़ते हैं। नाट्य-विधि के रूप में ही इनमें कविता और गद्य अन्तर्सम्बन्धित हैं। —डॉ. सुतिंदर सिंह नूर स्वराजबीर का नाटक ‘धर्मगुरु’ वर्तमान समय पर एक बड़ी टिप्पणी है जो धर्म और राजनीति की साँठ-गाँठ के माध्यम से समाज के समूचे अस्तित्व को अपनी गिरफ़्त में लेने के लिए सक्रिय है। इस समय इसकी प्रस्तुति एक साहसिक क़दम है। —‘नवांजमाना’ (दैनिक, जालंधर) यह नाटक ‘धर्मगुरु’ आज के दौर में फैले धार्मिक कठमुल्लापन और सामाजिक आपाधापी पर तीखा व्यंग्य है। तथाकथित धार्मिक नेताओं की मनमानियों और समाज की बेबसी की त्रासदी के दौर में इस नाटक का मंचन बुद्धिजीवियों और कलाकारों की बुलन्द आवाज़ और सच्चाई का प्रतीक है। —‘अजीत’ (दैनिक, जालंधर)
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