Shrilal Shukla Ki Lokpriya Kahaniyan
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"श्रीलाल शुक्ल जितने बड़े व्यंग्यकार हैं, उतने ही सशक्त कहानीकार भी, जिनकी कहानियों का बिल्कुल अलग अंदाज है, जिनमें एक धीमा-धीमा व्यंग्य अकसर घुला-मिला होता है। इससे कहानी जो कुछ कहती है, उसके अलावा भी कई और दिशाएँ और आशय खुलते हैं, जिनमें जीवन की विसंगतियाँ, मनुष्य की भीतरी उधेड़बुन और न कही जा सकने वाली मानव-मन की गुत्थियाँ भी शामिल हैं। श्रीलाल शुक्ल ने गाँव हो या शहर, महानगरीय उच्च वर्ग का अहं हो या निचले और मेहनतकश वर्ग की गहरी तकलीफें, सबको बहुत पास से देखा और सबकी भीतर की सचाइयों पर उनकी पैनी नजर रखी। इसी से उनकी कहानियों में यथार्थ के इतने बहुविध रूप सामने आते हैं कि ताज्जुब होता है। और यही नहीं, श्रीलालजी की कहानियों में शिल्प के इतने रूप हैं कि आप कह सकते हैं कि अपनी हर कहानी में वे शिल्प की एक अलग काट और भाषा के अलग अंदाज के साथ उपस्थित हैं। यह क्षमता और कलात्मक सामर्थ्य बहुत कम कथाकारों में देखने को मिलती है। ‘छुट्टियाँ’ और ‘यह घर मेरा नहीं है’ में उनकी भाषा का जो रंग है, वही ‘लखनऊ’, ‘कुत्ते और कुत्ते’, ‘यहाँ से वहाँ’ या ‘नसीहतें’ कहानियों में नहीं है और ‘उमरावनगर में एक दिन’ कहानी में तो श्रीलालजी भाषा के खिलंदड़ेपन के साथ सचमुच एक नया ही शिल्प गढ़ते नजर आते हैं। सच तो यह है कि श्रीलाल शुक्ल के कहानीकार को ठीक-ठीक समझा ही नहीं गया। इस संचयन में उनकी कुल पंद्रह कहानियाँ शामिल हैं, जिनमें सभी का रंग और अंदाज अलग-अलग है और कोशिश रही है कि उनके कहानीकार का हर रंग और अंदाज पाठकों के आगे आए।
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"श्रीलाल शुक्ल जितने बड़े व्यंग्यकार हैं, उतने ही सशक्त कहानीकार भी, जिनकी कहानियों का बिल्कुल अलग अंदाज है, जिनमें एक धीमा-धीमा व्यंग्य अकसर घुला-मिला होता है। इससे कहानी जो कुछ कहती है, उसके अलावा भी कई और दिशाएँ और आशय खुलते हैं, जिनमें जीवन की विसंगतियाँ, मनुष्य की भीतरी उधेड़बुन और न कही जा सकने वाली मानव-मन की गुत्थियाँ भी शामिल हैं। श्रीलाल शुक्ल ने गाँव हो या शहर, महानगरीय उच्च वर्ग का अहं हो या निचले और मेहनतकश वर्ग की गहरी तकलीफें, सबको बहुत पास से देखा और सबकी भीतर की सचाइयों पर उनकी पैनी नजर रखी। इसी से उनकी कहानियों में यथार्थ के इतने बहुविध रूप सामने आते हैं कि ताज्जुब होता है।
और यही नहीं, श्रीलालजी की कहानियों में शिल्प के इतने रूप हैं कि आप कह सकते हैं कि अपनी हर कहानी में वे शिल्प की एक अलग काट और भाषा के अलग अंदाज के साथ उपस्थित हैं। यह क्षमता और कलात्मक सामर्थ्य बहुत कम कथाकारों में देखने को मिलती है। ‘छुट्टियाँ’ और ‘यह घर मेरा नहीं है’ में उनकी भाषा का जो रंग है, वही ‘लखनऊ’, ‘कुत्ते और कुत्ते’, ‘यहाँ से वहाँ’ या ‘नसीहतें’ कहानियों में नहीं है और ‘उमरावनगर में एक दिन’ कहानी में तो श्रीलालजी भाषा के खिलंदड़ेपन के साथ सचमुच एक नया ही शिल्प गढ़ते नजर आते हैं।
सच तो यह है कि श्रीलाल शुक्ल के कहानीकार को ठीक-ठीक समझा ही नहीं गया। इस संचयन में उनकी कुल पंद्रह कहानियाँ शामिल हैं, जिनमें सभी का रंग और अंदाज अलग-अलग है और कोशिश रही है कि उनके कहानीकार का हर रंग और अंदाज पाठकों के आगे आए।
Book Details
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ISBN9789352662920
-
Pages170
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Mera Daur "मेरा दौर: एक आत्मकथा" Book in Hindi- J.B. Kriplani
- Author Name:
J.B. Kriplani
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अनेक दूसरे लोगों की तरह मैं भी विदेशी साम्राज्यवाद के जुए से मातृभूमि को आजाद कराने के लिए क्रांतिकारी आंदोलन से करीब से जुड़ा था। गांधीजी जब सन् 1915 के शुरू में दक्षिण अफ्रीका से आए तो उनके निकट संपर्क में आने वाला मैं पहला राजनीतिक कार्यकर्ता था। मैं उनके पहले सत्याग्रह आंदोलन के साथ भी करीब से जुड़ा था, जो चंपारण (बिहार) में गोरे निलहों के अत्याचार के खलाफ हुआ। हमारी आजादी की लड़ाई के सबसे महत्वपूर्ण और बेचैनी वाले दौर में मैं कांग्रेस का बारह वर्ष तक महामंत्री रहा। जिस साल देश को आजादी मिली, उस वक़्त मैं कांग्रेस अध्यक्ष था। मेरे दोस्तों को लगता है कि हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की महत्वपूर्ण घटनाओं और व्यक्तियों के बारे में मेरी जानकारी काफी अंतरंग और नई चीजें सामने लाने वाली होगी। इस कारण मेरे संस्मरणों का कुछ ऐतिहासिक महत्व होगा। इसलिए मैंने जो कुछ लिखा है, उसमें अपने बारे में कम लिखकर हमारी आजादी की लड़ाई पर ज्यादा लिखा है। इस पुस्तक को मैंने ‘माई टाइम्स : मेरा दौर’ नाम दिया है, पर इसमें ‘मैं’ का जिक्र उतना ही भर है, जितना जरूरी है। मेरे जीवन की कथा में भी कांग्रेस और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का बड़ा हिस्सा समाया हुआ है। इसलिए यह कोई आत्मकथा न होकर, इन बड़ी और महत्वपूर्ण घटनाओं का रिकॉर्ड भी है और इनका वर्णन करते हुए मैंने यह जिक्र कम किया है कि मैंने क्या-क्या किया, बल्कि यह बताने की कोशिश की है कि मैंने तब क्या देखा और समझा।
Mera Daur "मेरा दौर: एक आत्मकथा" Book in Hindi- J.B. Kriplani
J.B. Kriplani
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Ethics For Civil Services With 100 Case Studies
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Alok Ranjan
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Awating description for this book
21 ANMOL KAHANIYAN
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Premchand
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हिदी के कालजयी रचनाकार मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ जनसाधारण की समस्याओं, आकांक्षाओं, उलझनों, पारिवारिक विघटन, दहेज-प्रथा, बाल विवाह, राष्ट्रद्रोह, घूसखोरी, अंधविश्वास, ग्रामीण शोषण, आर्थिक वैषम्य इत्यादि विषयों को समेटे हुए अपने पाठकों से एक आत्मीय एवं भावनात्मक नाता जोड़ती हैं। उनकी कहानियों में समस्याओं की जितनी चर्चा है, समाधान की उससे ज्यादा। उनके पात्र अर्थगत दबावों से बेशक पीडि़त हैं, पर वे बाहरी संघर्षों द्वारा समस्याओं पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने अपनी कथाओं में नग्न यथार्थ नहीं, वरन् यथार्थ का भरसक चित्रण किया है, क्योंकि नग्न यथार्थ वितृष्णा उपजाता है। पात्र कभी सुख की अनुभूति करते हैं तो कभी दुःख की। इसी को रचनाओं के साथ साहित्यिक न्याय कहा जाता है, जिस पर मुंशी प्रेमचंद खरे उतरे हैं। ‘21 अनमोल कहानियाँ’ उनके ऐसे ही नगीने हैं, जो आज भी प्रासंगिक हैं और समाज की विद्रूपताओं पर गहरी चोट करते हैं।
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