Beti Bachao
(0)
Author:
Shakuntala SharmaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
300
240 (20% off)
Unavailable
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वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ी भाषा की प्रथम कवयित्री के रूप में प्रतिष्ठित शकुन्तला शर्मा की यह पंद्रहवीं कृति है। ‘बेटी बचाओ’ नामक इस गीत-संग्रह में कवयित्री ने न केवल देश के विभिन्न भागों, बल्कि दुनिया के अनेक क्षेत्रों में भ्रमण के दौरान विकलांग बच्चियों की जो हालत देखी, उसे आख्यान गीतों के रूप में बड़े ही सरल, सुगम और सुबोध ढंग से प्रस्तुत किया है। उन्होंने इन गीतों में बताया है कि विकलांग बच्चियाँ भी खुद या दूसरों का, परिवार का और समाज का सहारा पाकर आगे बढ़ सकती हैं, पढ़-लिख सकती हैं और अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं तथा अपनी आजीविका अर्जित कर शान से जी सकती हैं। इस पुस्तक में 51 आख्यान गीत हैं, जो अलग-अलग बच्चियों की जिंदगी का सटीक वर्णन करते हैं। इन गीतों को पढ़कर लोगों का, समाज का विकलांगों के प्रति खासकर विकलांग बच्चियों के प्रति विचार और सोच बदलेगा तथा एक रचनात्मक समाज का निर्माण होगा, जहाँ सद्भाव, समभाव और समरसता हो, तभी यह गीत-संग्रह अपने उद्देश्य में सफल होगा, ऐसी उम्मीद है।
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वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ी भाषा की प्रथम कवयित्री के रूप में प्रतिष्ठित शकुन्तला शर्मा की यह पंद्रहवीं कृति है। ‘बेटी बचाओ’ नामक इस गीत-संग्रह में कवयित्री ने न केवल देश के विभिन्न भागों, बल्कि दुनिया के अनेक क्षेत्रों में भ्रमण के दौरान विकलांग बच्चियों की जो हालत देखी, उसे आख्यान गीतों के रूप में बड़े ही सरल, सुगम और सुबोध ढंग से प्रस्तुत किया है। उन्होंने इन गीतों में बताया है कि विकलांग बच्चियाँ भी खुद या दूसरों का, परिवार का और समाज का सहारा पाकर आगे बढ़ सकती हैं, पढ़-लिख सकती हैं और अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं तथा अपनी आजीविका अर्जित कर शान से जी सकती हैं। इस पुस्तक में 51 आख्यान गीत हैं, जो अलग-अलग बच्चियों की जिंदगी का सटीक वर्णन करते हैं। इन गीतों को पढ़कर लोगों का, समाज का विकलांगों के प्रति खासकर विकलांग बच्चियों के प्रति विचार और सोच बदलेगा तथा एक रचनात्मक समाज का निर्माण होगा, जहाँ सद्भाव, समभाव और समरसता हो, तभी यह गीत-संग्रह अपने उद्देश्य में सफल होगा, ऐसी उम्मीद है।
Book Details
-
ISBN9789384343415
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इसीलिए अब इतिहास के अध्ययन में अन्य दस्तावेजों के साथ-साथ साहित्यिक स्रोतों की अहमियत पर भी जोर दिया जाने लगा है जिनसे इतिहास को न सिर्फ किसी एक घटना को अन्य कई पहलुओं से जानने, बल्कि अपनी दृष्टि का विस्तार करने के लिए भी जरूरी सामग्री मिल सकती है।
हिन्दी में उपन्यासों ने यह काम बखूबी किया है। बीसवीं सदी में अनेक ऐसे उपन्यास लिखे गए जिनमें अपने समय की राजनीति को तत्कालीन सामाजिक सन्दर्भों के साथ अंकित किया गया। आधुनिक भारत का ऐतिहासिक यथार्थ में ऐसे ही उपन्यासों को आधार बनाकर 1919 से लेकर 1962 तक की भारतीय राजनीति को समझने की कोशिश की गई है। यह पुस्तक इन तीनों घटकों के अन्तर्सम्बन्धों को जानने की एक प्रविधि भी निर्मित करती चलती है।
इस अध्ययन में उन्हीं उपन्यासों को रखा गया है जिनमें स्वतंत्रता आन्दोलन के इस शिखर-काल, गांधी और आजादी के बाद नेहरू के युग को गम्भीरतापूर्वक देखा, समझा और प्रस्तुत किया गया है। भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर और यशपाल सरीखे लेखकों के साथ इसीलिए यहाँ गुरुदत्त के उपन्यास भी विचारणीय रहे, जिनको पढ़ना हिन्दू-राष्ट्र के नैरेटिव को समझने के लिए आज और जरूरी है।
Kashmir : Itihas Aur Parampara
- Author Name:
Kumar Nirmalendu
- Book Type:

- Description:
'नीलमत पुराण' में कहा गया है कि कश्मीर स्वाध्याय एवं ध्यान में मग्न रहनेवाले और निरन्तर यज्ञ करनेवालों की भूमि रही है। यह हिमालय-पर्वतमाला की गोद में बसा एक सुरम्य प्रदेश है। लेकिन अपनी दुर्गम भौगोलिकता के कारण यह बाह्य-जगत् की पहुँच से दूर रहा है।
प्राचीन काल में कश्मीर प्रदेश गन्धार जनपद के अन्तर्गत आता था। सातवीं शताब्दी ई. के प्रारम्भ में यहाँ नाग जाति के कर्कोटक राजवंश का उदय हुआ; जिसके संस्थापक दुर्लभवर्द्धन के समय से कश्मीर का व्यवस्थित इतिहास मिलता है। उनके पौत्र ललितादित्य ने गुप्तोत्तर काल में एक साम्राज्य खड़ा किया; और प्रसिद्ध मार्तण्ड-मन्दिर का निर्माण भी कराया।
1339 ई. तक कश्मीर एक स्वशासित हिन्दू राज्य था। परन्तु मध्यकालीन हिन्दू राजाओं की दुर्बलता और उनके सामन्तों के षड्यन्त्रों के कारण वहाँ का वातावरण अराजक हो गया, जिसका लाभ उठाते हुए 1339 ई. में शाहमीर नामक एक मुसलमान ने कश्मीर के सिंहासन पर कब्जा कर लिया।
कल्हण ने 'राजतरंगिणी' में ललितादित्य से कहलवाया है कि ''इस देश को सुशासित तथा प्रगतिशील बनाये रखने के लिए अन्तर्कलह से बचना आवश्यक है।'' इसके कारण कश्मीर ने भारी कीमत चुकाई है। 'नीलमत पुराण' साक्षी है कि महर्षि कश्यप के समय से ही कश्मीर के स्थानीय लोगों ने विस्थापन की गहरी पीड़ा को महसूस किया है और आधुनिक काल में कश्मीरी हिन्दुओं को विस्थापन ने जितने दर्द दिये हैं, वह तो अकथनीय है।
Bharatiya Janata Party Ki Gauravgatha
- Author Name:
Shantanu Gupta
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29 मार्च, 2015 को, 11 अशोक रोड स्थित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पुराने कार्यालय में एक डिजिटल काउंटर आगे बढ़ता जा रहा था। पार्टी कार्यकर्ता, पदाधिकारी, यहाँ तक कि स्टाफ की नजरें भी डिजिटल स्क्रीन पर जमी थीं। स्क्रीन पर पार्टी की सदस्यता लेनेवालों की कुल संख्या दिख रही थी, जिन्हें पार्टी के नए ‘सदस्यता अभियान’ से जोड़ा जा रहा था। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, अमित शाह उस दिन कार्यालय में ही थे। बालसुलभ उत्सुकता के साथ उनकी भी नजरें डिजिटल काउंटर पर ही गड़ी थीं। काउंटर जैसे ही अपने लक्ष्य पर पहुँचा, पूरा कार्यालय खुशी से झूम उठा। 8.8 करोड़ सदस्यों तक पहुँचते ही इसने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को पीछे छोड़ दिया था। इस महत्त्वाकांक्षी सदस्यता अभियान के पीछे अमित शाह की ही सोच थी। यह कैसे संभव हुआ? क्या यह महज आँकड़े जुटाने का अभियान था, जिसने भाजपा के भाग्य को और बलवान बनाया, या इसके पीछे ऐसी सोच थी, जिसका समय आ चुका था? 1984 में लोकसभा में महज दो सीटों वाली पार्टी का विपक्ष को इस प्रकार बुरी तरह परास्त करना और इतना भीमकाय रूप लेना क्या मात्र मोदी-शाह की जोड़ी का कमाल है या इसके कारण हिंदुत्व आंदोलन की उस जटिलता की गहराई में छिपे हैं, जिसे लेकर काफी गलतफहमी है? इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए शांतनु गुप्ता भारत के दक्षिणपंथी आंदोलनों के इतिहास, उनकी वैचारिक उत्पत्ति से राष्ट्रवादी विचारों के विकास तक जाते हैं, और भाजपा पर एक समग्र अध्ययन को लेकर आते हैं, जो मात्र एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक वैचारिक संगठन है, जो इस देश के राष्ट्रवादी आंदोलन को इस प्रकार परिभाषित करता है, जैसा पहले कभी नहीं किया गया था।
Tughluq Kaleen Bharat : Vol. 2
- Author Name:
Saiyad Athar Abbas Rizvi
- Book Type:

- Description:
यह ग्रन्थ तुगलक़ बादशाहों के महत्त्वपूर्ण कालखंड सन् 1351 से 1398 ई. पर केन्द्रित है। इस दौर में शासन की बागडोर सुल्तान फ़ीरोज़ और उसके उत्तराधिकारियों के हाथों में थी। यह ग्रन्थ उस युग की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराता है।
फ़ारसी, अरबी, अंग्रेज़ी और हिन्दी के विद्वान और इतिहासकार डॉ. सैयद अतहर अब्बास रिज़वी ने इस ग्रन्थ का सम्पादन-अनुवाद किया है। उन्होंने इस ग्रन्थ में तत्सम्बन्धी अरबी और फ़ारसी में उपलब्ध तमाम ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और सामग्रियों का उपयोग किया है जिनमें ज़ियाउद्दीन बरनी, शम्स सिराज अफ़ीफ़, यहया, मुहम्मद बिहामद ख़ानी, शरफ़ुद्दीन अली यज़दी, सुल्तान फ़ीरोज़ शाह, निज़ामुद्दीन अहमद, मीर मुहम्मद मासूम, हमीद क़लन्दर, ऐनुलमुल्क तथा मुतहर कड़ा जैसे विद्वान लेखकों, इतिहासकारों के ग्रन्थ शामिल हैं।
अनुवाद में फ़ारसी, अरबी के प्रचलित नियमों को, जिनका पालन इतिहासकार करते रहे हैं, ध्यान में रखा गया है। साथ ही आवश्यक टिप्पणियाँ भी जगह-जगह दर्ज कर दी गई हैं ताकि पाठकों को विषय को समझने में सुविधा हो।
इतिहास के छात्रों, शिक्षकों, शोधार्थियों और इतिहासकारों के साथ-साथ इतिहास में रुचि रखनेवाले आम पाठकों के लिए भी ग्रन्थ संग्रहणीय है।
Jatiyon Ka Loktantra : Jati Aur Aarakshan
- Author Name:
Arvind Mohan
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- Description:
भारत के सामाजिक पदानुक्रम को आरक्षण ने काफी बदला है, लेकिन उतना शायद नहीं जितने की अपेक्षा थी, और जिसको ध्यान में रखकर हमारे संविधान-निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को एक आधारभूत मूल्या माना था। आज भी समाज का एक बड़ा हिस्सा सबसे कमजोर भारतवासियों को मिले आरक्षण को वैरभाव से देखता है, आज भी ऊँचे सरकारी पदों पर दलित-आदिवासी बहुत कम हैं और चतुर्थ श्रेणी या सफाई जैसे कामों में उनकी संख्या ज्यादा दिखाई देती है। ‘जातियों का लोकतंत्र’ शृंखला की यह पुस्तक भारत में आरक्षण की अवधारणा के पैदा होने, उसके लागू किए जाने, उसके विरोध और उसके समर्थन आदि हर पहलू पर विचार करती है। इसमें संकलित एक-एक आलेख को आरक्षण पर केन्द्रित प्रामाणिक अध्ययन माना जा सकता है, जिन्हें इसके सम्पादक, अरविन्द मोहन ने निश्चय ही इस उद्देश्य से जुटाया है कि हम आज, जबकि आरक्षण को बस एक चुनावी औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, यह जान सकें कि आरक्षण बतौर एक व्यवस्था और बतौर एक विचार क्या है! यह पुस्तक आरक्षण के पीछे के तर्कों, इसे लेकर हुई बहसों, तथ्यों और विकल्पों, सबसे अवगत कराती है। इसके अध्ययन से एक सामान्य पाठक भी जान सकेगा कि लगातार बहस में रहनेवाले आरक्षण को लेकर हमें एक सामाजिक रूप में कैसे सोचना चाहिए; कि क्या वह महज एक आर्थिक प्रश्न है, या कि उसका कुछ सम्बन्ध मनुष्योचित व्यवहार और सम्मान से भी है!
Asur Adivasi
- Author Name:
Shrirang
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विलुप्ति के कगार पर खड़ी भारत की एक सबसे प्राचीन मानी जानेवाली असुर आदिवासी जनजाति पिछले दिनों काफ़ी चर्चा में रही है। अपनी कुछ ख़ास विशेषताओं, मान्यताओं और कुछ ख़ास माँगों के कारण इसने सभ्य समाज का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।
दरअसल इस असुर जनजाति के लोग लौह अयस्क को खोजनेवाले तथा लौह धातु से हथियार आदि निर्माण करनेवाले विश्व की चुनिन्दा जनजातियों में से एक हैं। ये लोग अपने को पौराणिक असुरों का वंशज मानते हैं। पिछले दिनों ये चर्चा में तब आए जब इनके कुछ बुद्धिजीवी कार्यकत्ताओं ने यह माँग उठाई कि दशहरा में दुर्गा की महिषासुर मर्दिनी की जो प्रतिमा लगाई जाती है तथा उसमें उन्हें हिंसक रूप और महिषासुर का वीभत्स तरीक़े से वध करते हुए दिखाया जाता है, इससे उनकी भावना को ठेस पहुँचती है। यह उनके पूर्वजों का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण असुर आदिवासी समुदाय का अपमान है। सभ्य समाज के लिए ऐसा वीभत्स और अभद्र अमानवीय प्रदर्शन सभ्यता के विरुद्ध है। इसलिए इस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।
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