Yaatri-Samgra
Author:
Vaiddnath Mishra 'Yaatri'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 399.2
₹
499
Available
Awating description for this book
ISBN: 9788126706402
Pages: 464
Avg Reading Time: 15 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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स्वाँग का मज़ा इसके असल जैसा लगने में है। एकदम असली, गोकि वहाँ सब नकली होता है : नकली राजा, नकली सिपाही, नकली कोड़े, नकली जेल, नकली साधु, काठ की तलवार, नकली दुश्मन और नकली लड़ाइयाँ। नकली नायक, नकली खलनायक। वही नायक, वही खलनायक। सब जानते हैं कि अभिनय है, नकली है सब, नाटक है यह; पर उस पल वह कितना जीवंत प्रतीत होता है। एकदम असल।
लोकनाट्य तो ख़ैर समय के साथ डूब गए। अब बुंदेलखंड के गाँवों में स्वाँग नहीं खेला जाता। परन्तु हुआ यह है कि अब मानो पूरा समाज ही स्वाँग खेलने में मुब्तिला हो गया है। सामाजिक, राजनीतिक, न्याय और कानून, इनकी व्यवस्था का सारा तंत्र ही एक विराट स्वाँग में बदल गया है।
यह न केवल बुंदेलखंड के बल्कि हिंदुस्तान के समूचे तंत्र के एक विराट स्वाँग में तब्दील हो जाने की कहानी है।
Kason Kahon Main Dardiya
- Author Name:
Rita Shukla
- Book Type:

- Description: "संगोष्ठी में भाग लेने के लिए आई विद्वन्मंडली उनके परंपराभंजक रूप को देखकर चमत्कृत थी । ताजा हवा के झोंकों- से स्कूर्त वे विचार उनकी अंतरात्मा की प्रतिध्वनि बनकर फूटे थे ।-दहेज समाज की रगों में प्रवाहित होनेवाला सबसे बड़ा प्रदूषण है... .विवाह के पारंपरिक स्वरूप में विकृतियाँ उत्पन्न करनेवाले. ऐसे अभिशप्त संदर्भों से मुक्ति पानी ही होगी... .दहेज देनेवाला भी समान पातक का भागी होता है.... वापसी की यात्रा तय करते समय उनके विचार विरु बनकर उनका मुँह चिढ़ाने लगे थे.... । कीचड़ में जन्म लेकर उससे निर्लिप्तता कि स्थिति पंकज की हो सकती है-जिंदगी पुरइन का पात नहीं... .जिसकी चिकनाहट जल की एक बूँद की भी अवधारणा नहीं कर सके । सामाजिकता में सराबोर जलकुंभी-सा परंपरा-ग्रथित मन अपनी निस्पृहता सिद्ध करना चाहे भी तो उसे लोकधर्म की परिभाषाओं से मुक्ति पानी होगी- संसार में रहकर संसार से ऊपर उठने की महती आकांक्षा यतिभाव को जन्म देती है-संन्यास लोकाचार से पलायन का दूसरा नाम हो सकता है; लेकिन लोकाचार पूर्वजों के द्वारा पोषित होती चली आ रही परंपराओं का एक ऐसा विवश स्वीकार है, जिसके बगैर जीवन की गति नहीं.... । विस्मय तो उन्हें तब हुआ था जब उनकी दूसरी पुत्री ने स्वयं उनके सामने प्रस्ताव रखा था-बाबूजी, इनके कार्यालय में सबके पास स्कूटर, मोटर साइकल हैं -सिर्फ ये ही... .हमारी सासजी कहती हैं -इतने बड़े प्राध्यापक हैं, क्या अपने दामाद को एक स्कूटर भी नहीं दे सकते... .हमने तो मोटरगाड़ी की आस लगाई थी । - इसी संकलन से बहुचर्चित कथाकार ऋता शुक्ल की कहानियों में समाज का संत्रास आँखोंदेखी घटना के रूप में उभरता है । तभी तो उनकी कहानियाँ संस्मरण, रेखाचित्र और कहानी का मिला-जुला अनूठा आनंद प्रदान करती हैं । उनकी हृदयस्पर्शी कहानियों का संकलन है- कासों कहों मैं दरदिया । "
Rudra Gufa Ka Swami
- Author Name:
Shiv Vachan Choube
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Description:
शिव वचन चौबे लोकगीतों और लोककथाओं में जीवन्तता तलाशनेवाले मिथक प्रेमी, कथाकार प्रेमी मात्र नहीं हैं। वे ग्रामीण जीवन के बदलते चरित्र को उसकी सहजता और चालाकी के साथ रेखांकित करनेवाले संवेदनशील रचनाकार हैं। ‘रुद्रगुफा का स्वामी' आत्मपरक वस्तुपरकता से विकसित आज के गाँवों और नगरों में विद्यमान सम्पत्ति-मोह के भीषण परिणामों का संकेत करनेवाला अत्यन्त रोचक उपन्यास है।
यह उपन्यास लोककथा के रहस्य, रोमांच, जिज्ञासा, कौतूहल आदि तत्त्वों के उपयोग से बना होने के कारण पाठक को अन्त तक बाँधे रहता है। हिन्दी में कौतूहल और रहस्य का सामाजिक यथार्थ के उद्घाटन की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण प्रयोग है।
देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों जैसा यह नाम निम्न जातियों के स्वार्थपरक इस्तेमाल का उद्घाटन करते हुए उनकी उद्बुद्ध विवेकशक्ति को रेखांकित करता है। रुद्रगुफा का स्वामी कौन है? और क्यों बना है? यह प्रश्न यथार्थ के अनेक हेतुओं का उद्घाटन करता है। पाठकों और आलोचकों को अपने स्वरूप और संकेत से आकर्षित करनेवाला एक उल्लेखनीय उपन्यास।
Potpakshi
- Author Name:
Shivshankari
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सुजश। आधुनिक, आत्मनिर्भर, स्वतंत्र और अपने में बेहद सुलझी हुई लड़की। आर्किटेक्चर की दुनिया में एक रचनात्मक मेधा। सुजश। जिसने अपनी माँ के रूढ़िग्रस्त और उत्पीड़क व्यवहार का सामना करते हुए अपनी राह ख़ुद बनाई और नौ साल तक घर की तरफ़ मुड़कर नहीं देखा। वही सुजश अपने से उम्र में काफ़ी बड़े और विवाहित वासुदेव के प्रेम में घिरती हुई धीरे-धीरे पूरी तरह डूबने-डूबने को हो जाती है, लेकिन हठात् एक लहर उसे पुनः किनारे की तरफ़ खींच ले जाती है। वासुदेव को अचानक पता चलता है कि अपनी जिस पत्नी को वे सुजश के लिए तलाक़ देने जा रहे हैं, वह गर्भवती है। फ़ैसला सुजश करती है और लम्बी छुट्टी लेकर सुकून की तलाश में निकल जाती है।
इस उपन्यास में लेखिका किसी पात्र या परिस्थिति पर कोई वेल्यू जजमेंट नहीं देतीं, न यह कहती हैं कि सुजश और वासुदेव का प्रेम ठीक है अथवा ग़लत। वह बस एक कहानी को अपने पूरे प्रवाह के साथ हमारे सामने रख देती हैं। रोचक और पठनीय उपन्यास।
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