Ujaale
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ये किताब 'उजाले' जावेद सिद्दीक़ी के लिखे 13 ख़ाकों का एक मज्मूआ है, जो दिलीप कुमार, गुलज़ार, फ़ारूक़ शेख़, बंसी चंद्र गुप्त, शाहिद अली ख़ान और ऐसी ही कुछ मामूली और ग़ैर-मामूली हस्तियों के हैं। ये किताब उनके ख़ाकों का तीसरा मज्मूआ है, जिसे रेख़्ता पब्लिकेशंस के ज़रिए उर्दू में शाए किया गया है। जावेद सिद्दीक़ी (पैदाइश 13 जनवरी 1942) एक मारूफ़ हिन्दी और उर्दू पटकथा लेखक, मुकालमा-नवीस और ड्रामा-निगार हैं। उन्होंने 50 से ज़्यादा कहानियाँ, स्क्रिप्ट और मुकालमे लिखे हैं। जावेद सिद्दीक़ी महान आज़ादी के सिपाही, मोहम्मद अली जौहर और उनके भाई मौलाना शौकत अली के ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते हैं, जिन्हें अली बिरादरान के नाम से जाना जाता है।
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ये किताब 'उजाले' जावेद सिद्दीक़ी के लिखे 13 ख़ाकों का एक मज्मूआ है, जो दिलीप कुमार, गुलज़ार, फ़ारूक़ शेख़, बंसी चंद्र गुप्त, शाहिद अली ख़ान और ऐसी ही कुछ मामूली और ग़ैर-मामूली हस्तियों के हैं। ये किताब उनके ख़ाकों का तीसरा मज्मूआ है, जिसे रेख़्ता पब्लिकेशंस के ज़रिए उर्दू में शाए किया गया है। जावेद सिद्दीक़ी (पैदाइश 13 जनवरी 1942) एक मारूफ़ हिन्दी और उर्दू पटकथा लेखक, मुकालमा-नवीस और ड्रामा-निगार हैं। उन्होंने 50 से ज़्यादा कहानियाँ, स्क्रिप्ट और मुकालमे लिखे हैं। जावेद सिद्दीक़ी महान आज़ादी के सिपाही, मोहम्मद अली जौहर और उनके भाई मौलाना शौकत अली के ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते हैं, जिन्हें अली बिरादरान के नाम से जाना जाता है।
Book Details
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ISBN9789394494817
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Pages245
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Avg Reading Time8 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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पहाड़ और पहाड़ का जीवन इस उपन्यास में एक सम्पूर्ण पात्र की तरह मौजूद जो इसके विमर्श को और गहराता है, कथा को एक विलक्षणता प्रदान करता है और बिम्बों, प्रतीकों, छवियों का एक भूगोल रचता है जिससे अस्तित्व से जुड़े गहन प्रश्नों को एक विराट पृष्ठभूमि मिलती है। अन्तिम अरण्य निर्मल वर्मा का आख़िरी उपन्यास है जिसका प्रकाशन दो सदियों के सन्धि-बिन्दु पर वर्ष 2000 में हुआ था। हिन्दी समाज में एक घटना की तरह प्रकट हुआ यह उपन्यास लम्बे समय तक चर्चाओं का विषय रहा।
कुछ समीक्षकों ने इसे मृत्यु का आख्यान कहा, लेकिन यह ठीक-ठीक वही नहीं है, नश्वरता का एक गहरा अहसास इस उपन्यास के केन्द्र में ज़रूर है। जीवन के एक विशिष्ट मोड़ पर आकर ठहरे हुए इसके चरित्र एक तरह से अपने भीतर की यात्रा पर निकले हैं और इस तरह जिजीविषा और मृत्यु की अपरिहार्यता का अन्वेषण करते हुए उस जीवन से साक्षात्कार करते हैं जो जिया जा चुका है, लेकिन अभी भी स्मृतियों के रूप में सजीव है।
पूरा उपन्यास नैरेटर की डायरी की शक्ल में सामने आता है जिसमें वह मेहरा साहब से बात करते हुए नोट्स लेता है। वह स्वयं भी अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर तलाश रहा है। अतीत, वर्तमान और भविष्य में आवाजाही करते हुए इस तरह एक संश्लिष्ट कथा बनती है जो अन्त तक आते-आते एक आध्यात्मिक और निर्मल ऊँचाई तक पहुँच जाती है।
पहाड़ और पहाड़ का जीवन इस उपन्यास में एक सम्पूर्ण पात्र की तरह मौजूद जो इसके विमर्श को और गहराता है, कथा को एक विलक्षणता प्रदान करता है और बिम्बों, प्रतीकों, छवियों का एक भूगोल रचता है जिससे अस्तित्व से जुड़े गहन प्रश्नों को एक विराट पृष्ठभूमि मिलती है।
Mahabhoj
- Author Name:
Mannu Bhandari
- Book Type:

- Description:
मन्नू भंडारी का ‘महाभोज’ उपन्यास इस धारणा को तोड़ता है कि महिलाएँ या तो घर-परिवार के बारे में लिखती हैं, या अपनी भावनाओं की दुनिया में ही जीती-मरती हैं। ‘महाभोज’ विद्रोह का राजनैतिक उपन्यास है। जनतंत्र में साधारण जन की जगह कहाँ है? राजनीति और नौकरशाही के सूत्रधारों ने सारे ताने-बाने को इस तरह उलझा दिया है कि वह जनता को फाँसने और घोटने का जाल बनकर रह गया है। इस जाल की हर कड़ी ‘महाभोज’ के दा साहब की उँगलियों के इशारों पर सिमटती और खुलती है। हर सूत्र के वे कुशल संचालक हैं। उनकी सरपरस्ती में राजनीति के खोटे सिक्के समाज चला रहे हैं—खरे सिक्के एक तरफ़ फेंक दिए गए हैं। ‘महाभोज’ उपन्यास भ्रष्ट भारतीय राजनीति के नग्न यथार्थ को प्रस्तुत करता है। अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास के अनुवाद हुए हैं और ‘महाभोज’ नाटक तो दर्जनों भाषाओं में सैकड़ों बार मंचित होता रहा है। ‘नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा’ (दिल्ली) द्वारा मंचित ‘महाभोज’ नाटक राष्ट्रीय नाट्य-मंडल की गौरवशाली प्रस्तुतियों में अविस्मरणीय है। हिन्दी के सजग पाठक के लिए अनिवार्य उपन्यास है ‘महाभोज’।
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