Numaainda Kahaaniyaan Manto
(0)
Author:
Saadat Hasan MantoPublisher:
Rekhta PublicationsLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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उर्दू साहित्य के सबसे प्रमुख कहानीकारों में शामिल सआ’दत हसन मन्टो का जन्म 11 मई, 1912 को लुधियाना, पंजाब में हुआ। उन्होंने उर्दू कथा-साहित्य को ख़याली और काल्पनिक क़िस्सों के माहौल से निकाल कर एक नए यथार्थ की ज़मीन पर स्थापित किया। उन्होंने ‘ठंडा गोश्त’, ‘टोबा टेक सिंह’, ‘काली शलवार’, ‘बू’, ‘खोल दो’, और ‘हतक’ सहित 250 से... Introducing "Numaainda Kahaaniyaan Manto," a captivating collection of timeless urdustories penned by the legendary Saadat Hasan Manto. Immerse yourself in the world of Manto, one of the foremost storytellers of urduliterature, and experience his unique style of narrative that revolutionized urdufiction. Born on May 11, 1912, in Ludhiana, Punjab, Saadat Hasan Manto was a literary genius who fearlessly depicted the stark realities of society. This collection showcases his extraordinary ability to delve into the depths of human emotions, exploring themes of love, passion, tragedy, and social taboos. Manto's masterful storytelling transports readers to a new reality, far from the realm of imagination. Through his thought-provoking tales, he presents a mirror to society, reflecting its flaws, complexities, and the human condition in all its rawness. Within "Numaainda Kahaaniyaan Manto," you will discover over 250 unforgettable stories, including classics like "Thanda Gosht," "Toba Tek Singh," "Kali Shalwar," "Boo," "Khol Do," and "Hatak." Each story is a literary gem that explores the depths of the human psyche, leaving a lasting impact on readers. Experience the power of Manto's words as you navigate through his evocative narratives, vivid characters, and social commentary. This collection is a must-have for literature enthusiasts, urdulanguage aficionados, and anyone seeking an enriching literary journey. Unlock the treasure trove of Manto's brilliance with "Numaainda Kahaaniyaan Manto" and embark on a transformative literary adventure that will captivate your mind and touch your soul.
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उर्दू साहित्य के सबसे प्रमुख कहानीकारों में शामिल सआ’दत हसन मन्टो का जन्म 11 मई, 1912 को लुधियाना, पंजाब में हुआ। उन्होंने उर्दू कथा-साहित्य को ख़याली और काल्पनिक क़िस्सों के माहौल से निकाल कर एक नए यथार्थ की ज़मीन पर स्थापित किया। उन्होंने ‘ठंडा गोश्त’, ‘टोबा टेक सिंह’, ‘काली शलवार’, ‘बू’, ‘खोल दो’, और ‘हतक’ सहित 250 से... Introducing "Numaainda Kahaaniyaan Manto," a captivating collection of timeless urdustories penned by the legendary Saadat Hasan Manto. Immerse yourself in the world of Manto, one of the foremost storytellers of urduliterature, and experience his unique style of narrative that revolutionized urdufiction. Born on May 11, 1912, in Ludhiana, Punjab, Saadat Hasan Manto was a literary genius who fearlessly depicted the stark realities of society. This collection showcases his extraordinary ability to delve into the depths of human emotions, exploring themes of love, passion, tragedy, and social taboos. Manto's masterful storytelling transports readers to a new reality, far from the realm of imagination. Through his thought-provoking tales, he presents a mirror to society, reflecting its flaws, complexities, and the human condition in all its rawness. Within "Numaainda Kahaaniyaan Manto," you will discover over 250 unforgettable stories, including classics like "Thanda Gosht," "Toba Tek Singh," "Kali Shalwar," "Boo," "Khol Do," and "Hatak." Each story is a literary gem that explores the depths of the human psyche, leaving a lasting impact on readers. Experience the power of Manto's words as you navigate through his evocative narratives, vivid characters, and social commentary. This collection is a must-have for literature enthusiasts, urdulanguage aficionados, and anyone seeking an enriching literary journey. Unlock the treasure trove of Manto's brilliance with "Numaainda Kahaaniyaan Manto" and embark on a transformative literary adventure that will captivate your mind and touch your soul.
Book Details
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ISBN9789391080945
-
Pages159
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘आपका बंटी’ मन्नू भंडारी के उन बेजोड़ उपन्यासों में है जिसके बिना न बीसवीं शताब्दी के हिन्दी उपन्यास की बात की जा सकती है न स्त्री–विमर्श को सही धरातल पर समझा जा सकता है। तीस वर्ष पहले (1970 में) लिखा गया यह उपन्यास हिन्दी की लोकप्रिय पुस्तकों की पहली पंक्ति में है। दर्जनों संस्करण और अनुवादों का यह सिलसिला आज भी वैसा ही है जैसा ‘धर्मयुग’ में पहली बार धारावाहिक रूप से प्रकाशन के दौरान था। बच्चे की निगाहों और घायल होती संवेदना की निगाहों से देखी गई परिवार की यह दुनिया एक भयावह दु:स्वप्न बन जाती है। कहना मुश्किल है कि यह कहानी बालक बंटी की है या माँ शकुन की। सभी तो एक–दूसरे में ऐसे उलझे हैं कि एक की त्रासदी सभी की यातना बन जाती है। शकुन के जीवन का सत्य है कि स्त्री की जायज़ महत्त्वाकांक्षा और आत्मनिर्भरता पुरुष के लिए चुनौती है—नतीजे में दाम्पत्य तनाव उसे अलगाव तक ला छोड़ता है। यह शकुन का नहीं, समाज में निरन्तर अपनी जगह बनाती, फैलाती और अपना क़द बढ़ाती ‘नई स्त्री’ का सत्य है। पति–पत्नी के इस द्वन्द्व में यहाँ भी वही सबसे अधिक पीसा जाता है बंटी, जो नितान्त निर्दोष, निरीह और असुरक्षित है। बच्चे की चेतना में बड़ों के इस संसार को कथाकार मन्नू भंडारी ने पहली बार पहचाना था। बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ–बूझ के लिए चर्चित, प्रशंसित इस उपन्यास का हर पृष्ठ ही मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक है। हिन्दी उपन्यास की एक मूल्यवान उपलब्धि के रूप में ‘आपका बंटी’ एक कालजयी उपन्यास है।
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इस उपन्यास में एक नए दृष्टिकोण से कहानी को उठाया गया है। उपन्यास के केन्द्र में महत्त्वाकांक्षी पति और उसकी पत्नी का द्वन्द्व है। वह पत्नी लगातार दमित महसूस करती है। पति के तबादले के बाद पत्नी का एकान्त निरन्तर गहरा होता जाता है। ऐसी अवस्था में भावनावश वह पत्नी अपने उस एकान्त को ख़त्म कर लेती है। वह एक साहसिक फ़ैसला लेती है, और फिर तलाक़ हो जाता है। उसके बाद वह दोबारा विवाह करती है और पहला पति अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की दुनिया में लौट जाता है। इस कथा-सूत्र को लेकर चलनेवाले इस उपन्यास में स्त्री की इच्छा-शक्ति और पुरुष की महत्त्वाकांक्षा के द्वन्द्व को बड़ी गहराई से पहचाना गया है।
कथा की परिणति में जो दूसरा रास्ता पत्नी ने निकाला है, उसे एक नवीन नारी-क्रान्ति की संज्ञा दी जा सकती है। यहाँ स्त्री की भावना को दमित न रखने का एक कोण भी सामने आता है। यदि वह उपेक्षित और अकेलापन महसूस करती है तो इसकी दोषी निश्चित तौर पर पुरुष की महत्त्वाकांक्षा ही है, ऐसी हालत में स्त्री को क्या अपना ख़ालीपन भर लेने की आज़ादी नहीं होनी चाहिए?
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