Nammantha Ballidaru
(0)
Author:
Dr. H.S.M. Prakash, Nayantara SahgalPublisher:
Sahitya AkademiLanguage:
KannadaCategory:
Literary-fiction₹
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ಪ್ರೀತಿ ಪ್ರೇಮಗಳ ವ್ಯಾಮೋಹದಲ್ಲಿ ಸಿಲುಕಿ ರಾಮ್ನನ್ನು ಮದುವೆಯಾಗಿ ಲಂಡನ್ನಿಂದ ಭಾರತಕ್ಕೆ ಬಂದ ಮುಗ್ಧ ರೋಸ್ಗೆ ಆದ ಆಘಾತವೆಂದರೆ ಅವಳು ಎರಡನೇ ಪತ್ನಿಯೆಂಬುದು. ಆದರೂ ಇಲ್ಲಿನ ಕುಟುಂಬ ವ್ಯವಸ್ಥೆ, ಸಂಪ್ರದಾಯ, ಸಂಸ್ಕೃತಿಯೊಂದಿಗೆ ಹೊಂದಿಕೊಂಡು ಬದುಕಿದ ಅವಳಿಗೆ ಕೊನೆಗೆ ದಕ್ಕಿದ್ದು ಆಕಸ್ಮಿಕ ಸಾವು. ಅವಳ ತ್ಯಾಗ, ಸಹಿಷ್ಣುತೆಗಳೆಲ್ಲವನ್ನು ಮಾನವ ಅಹಂಕಾರ ನೀರಿನಲ್ಲಿ ಮುಳುಗಿಸುತ್ತದೆ. ಈ ಮಧ್ಯೆ ದೆಹಲಿಯ ಬಲ್ಲಿದರ ಐಷಾರಾಮಿ ಜೀವನ ಶೈಲಿ, ರಾಜಕೀಯ ವ್ಯವಸ್ಥೆ, ಸರ್ಕಾರಿ ಅಧಿಕಾರಿಗಳ ಕಾರ್ಯವೈಖರಿ, ತುರ್ತುಪರಿಸ್ಥಿತಿಯ ದುಷ್ಪರಿಣಾಮಗಳು, ಜೈಲಿನ ಜೀವನ, ಸ್ವಾತಂತ್ರೋತ್ತರ ಭಾರತದ ಆಶೋತ್ತರಗಳು, ಸ್ವಾತಂತ್ರ್ಯ ಪೂರ್ವದ ಸಾಮಾಜಿಕ ಅನಿಷ್ಟಗಳು ಮತ್ತು ಅವುಗಳನ್ನು ಸುಧಾರಿಸುವ ಬ್ರಿಟೀಷರ ಪ್ರಯತ್ನಗಳು- ಹೀಗೆ ಹತ್ತು ಹಲವಾರು ಸೂಕ್ಷ್ಮ ವಿಷಯಗಳನ್ನೆಲ್ಲ ಹೆಣೆದು, ಪೋಣಿಸಿದ ಗೀಜಗನ ಗೂಡು ಈ ಕಾದಂಬರಿ.
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ಪ್ರೀತಿ ಪ್ರೇಮಗಳ ವ್ಯಾಮೋಹದಲ್ಲಿ ಸಿಲುಕಿ ರಾಮ್ನನ್ನು ಮದುವೆಯಾಗಿ ಲಂಡನ್ನಿಂದ ಭಾರತಕ್ಕೆ ಬಂದ ಮುಗ್ಧ ರೋಸ್ಗೆ ಆದ ಆಘಾತವೆಂದರೆ ಅವಳು ಎರಡನೇ ಪತ್ನಿಯೆಂಬುದು. ಆದರೂ ಇಲ್ಲಿನ ಕುಟುಂಬ ವ್ಯವಸ್ಥೆ, ಸಂಪ್ರದಾಯ, ಸಂಸ್ಕೃತಿಯೊಂದಿಗೆ ಹೊಂದಿಕೊಂಡು ಬದುಕಿದ ಅವಳಿಗೆ ಕೊನೆಗೆ ದಕ್ಕಿದ್ದು ಆಕಸ್ಮಿಕ ಸಾವು. ಅವಳ ತ್ಯಾಗ, ಸಹಿಷ್ಣುತೆಗಳೆಲ್ಲವನ್ನು ಮಾನವ ಅಹಂಕಾರ ನೀರಿನಲ್ಲಿ ಮುಳುಗಿಸುತ್ತದೆ. ಈ ಮಧ್ಯೆ ದೆಹಲಿಯ ಬಲ್ಲಿದರ ಐಷಾರಾಮಿ ಜೀವನ ಶೈಲಿ, ರಾಜಕೀಯ ವ್ಯವಸ್ಥೆ, ಸರ್ಕಾರಿ ಅಧಿಕಾರಿಗಳ ಕಾರ್ಯವೈಖರಿ, ತುರ್ತುಪರಿಸ್ಥಿತಿಯ ದುಷ್ಪರಿಣಾಮಗಳು, ಜೈಲಿನ ಜೀವನ, ಸ್ವಾತಂತ್ರೋತ್ತರ ಭಾರತದ ಆಶೋತ್ತರಗಳು, ಸ್ವಾತಂತ್ರ್ಯ ಪೂರ್ವದ ಸಾಮಾಜಿಕ ಅನಿಷ್ಟಗಳು ಮತ್ತು ಅವುಗಳನ್ನು ಸುಧಾರಿಸುವ ಬ್ರಿಟೀಷರ ಪ್ರಯತ್ನಗಳು- ಹೀಗೆ ಹತ್ತು ಹಲವಾರು ಸೂಕ್ಷ್ಮ ವಿಷಯಗಳನ್ನೆಲ್ಲ ಹೆಣೆದು, ಪೋಣಿಸಿದ ಗೀಜಗನ ಗೂಡು ಈ ಕಾದಂಬರಿ.
Book Details
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ISBN9789355486523
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Pages280
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Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIN
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भारत उत्सवों का देश है। यहाँ प्रत्येक महत्वपूर्ण अवसर को उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जैसे जन्म होने पर उत्सव, और एक साल पूरी होने पर फिर से जन्मोत्सव। अब तो जन्मदिन मनाने का चलन बहुत लोकप्रिय हो गया है। पहले बच्चे जब पाठशाला जाते थे, तो कई परिवार अक्षरोत्सव भी मनाते थे। वसंतोत्सव भी मनती है। होली, दीवाली, दशहरा जैसी परंपरागत त्योहारों को तो छोड़ ही दीजिए; वे तो बड़े-बड़े उत्सव हैं। इन वर्षों में इश्कोत्सव भी प्रचलित हो रहा है। ‘वेलेंटाइन-डे’ के अवसर पर शहरों के बाजारों में खूब उत्साह दिखता है। विवाहोत्सव का तो ही बात छोड़ दीजिए। यह उत्सव व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सभी स्तरों का है, और उससे भी अधिक यह एक आर्थिक उत्सव बन गया है, जिसमें सैकड़ों उद्योग फलते-फूलते हैं। परन्तु, एक उत्सव है जो अभी भी उपेक्षित है—मरणोत्सव। मैं सोचता हूँ, क्यों अभी तक यह उत्सव नहीं बन पाया? बाजार ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया? कुछ पश्चिमी और पूर्वी देशों में बाजार इस ओर ध्यान दे रहा है। ज्ञात है कि यदि बाजार लगा लिया जाए तो क्या-क्या संभव है? जीवन बीमा भी इसी पर आधारित एक अरबों-खरबों रुपए का व्यवसाय है, जो मृत्यु की आशंका पर टिका है। मृत्यु से जुड़े अन्य उद्योग भी विकसित हो सकते हैं। शादी से कुछ लोग बच तो जाते हैं, लेकिन मरने से कोई नहीं बच सकता, इसलिए यह सबसे बड़ा बाजार है। यहाँ से हमें प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री दीनानाथ मिश्र का स्मरण होता है, जिनके व्यंग्यपूर्ण लेखों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों और समस्याओं पर तीखा प्रहार किया। यह संग्रह उन्हीं का धारदार व्यंग्यों का संकलन है।
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