Soochana Ka Adhikar
(0)
Author:
Arvind Kejariwal, Vishnu Rajgariya, HarivanshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
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राजशाही में व्यक्ति और समाज के पास कोई अधिकार था, तो सिर्फ़ इतना कि वह सत्तावर्ग की आज्ञा का चुपचाप पालन करे। राजा निरंकुश था, सर्वशक्तिमान। उस पर कोई उँगली नहीं उठा सकता था, न उसे किसी चीज़ के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता था। औद्योगिक क्रान्ति तथा उदारवाद के आगमन और लोकतांत्रिक शासन पद्धतियों के प्रारम्भ के साथ ही नागरिक स्वतंत्रता की अवधारणा आई। इसके बावजूद द्वितीय विश्वयुद्ध तक प्रजातांत्रिक देशों में भी शासनतंत्र में ‘गोपनीयता’ एक स्वाभाविक चीज़ बनी रही। विभिन्न दस्तावेज़ों में क़ैद सूचनाओं को ‘गोपनीय’ अथवा ‘वर्गीकृत’ करार देकर नागरिकों की पहुँच से दूर रखा गया। लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के बावजूद राजनेताओं एवं अधिकारियों में स्वयं को ‘शासक’ या ‘राजा’ समझने की प्रवृत्ति हावी रही। यही शासकवर्ग आज भारतीय लोकतंत्र का असली मालिक है। नागरिक का पाँच साल में महज़ एक वोट डाल आने का बेहद सीमित अधिकार इतना निरुत्साहित करनेवाला है कि चुनावों में बोगस वोट न पड़ें तो मतदान का प्रतिशत तीस-चालीस फ़ीसदी भी न पहुँचे। यही कारण है कि अक्टूबर 2005 से लागू सूचनाधिकार लोकतांत्रिक राजा की सत्ता के लिए गहरे सदमे के रूप में आया है। राजनेता और नौकरशाह हतप्रभ हैं कि इस क़ानून ने आम नागरिक को लगभग तमाम ऐसी चीज़ों को देखने, जानने, समझने, पूछने की इजाज़त दे दी है, जिन पर परदा डालकर लोकतंत्र को राजशाही अन्दाज़ में चलाया जा रहा था। इस पुस्तक में संकलित उदाहरणों में आप देख पाएँगे कि किस तरह लोकतांत्रिक राजशाही तेज़ी से अपने अन्त की ओर बढ़ रही है। साथ ही इस पुस्तक में यह भी बताया गया है कि हम अपने इस अधिकार का प्रयोग कैसे करें।
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About the Book
राजशाही में व्यक्ति और समाज के पास कोई अधिकार था, तो सिर्फ़ इतना कि वह सत्तावर्ग की आज्ञा का चुपचाप पालन करे। राजा निरंकुश था, सर्वशक्तिमान। उस पर कोई उँगली नहीं उठा सकता था, न उसे किसी चीज़ के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता था।
औद्योगिक क्रान्ति तथा उदारवाद के आगमन और लोकतांत्रिक शासन पद्धतियों के प्रारम्भ के साथ ही नागरिक स्वतंत्रता की अवधारणा आई। इसके बावजूद द्वितीय विश्वयुद्ध तक प्रजातांत्रिक देशों में भी शासनतंत्र में ‘गोपनीयता’ एक स्वाभाविक चीज़ बनी रही। विभिन्न दस्तावेज़ों में क़ैद सूचनाओं को ‘गोपनीय’ अथवा ‘वर्गीकृत’ करार देकर नागरिकों की पहुँच से दूर रखा गया। लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के बावजूद राजनेताओं एवं अधिकारियों में स्वयं को ‘शासक’ या ‘राजा’ समझने की प्रवृत्ति हावी रही।
यही शासकवर्ग आज भारतीय लोकतंत्र का असली मालिक है। नागरिक का पाँच साल में महज़ एक वोट डाल आने का बेहद सीमित अधिकार इतना निरुत्साहित करनेवाला है कि चुनावों में बोगस वोट न पड़ें तो मतदान का प्रतिशत तीस-चालीस फ़ीसदी भी न पहुँचे।
यही कारण है कि अक्टूबर 2005 से लागू सूचनाधिकार लोकतांत्रिक राजा की सत्ता के लिए गहरे सदमे के रूप में आया है। राजनेता और नौकरशाह हतप्रभ हैं कि इस क़ानून ने आम नागरिक को लगभग तमाम ऐसी चीज़ों को देखने, जानने, समझने, पूछने की इजाज़त दे दी है, जिन पर परदा डालकर लोकतंत्र को राजशाही अन्दाज़ में चलाया जा रहा था। इस पुस्तक में संकलित उदाहरणों में आप देख पाएँगे कि किस तरह लोकतांत्रिक राजशाही तेज़ी से अपने अन्त की ओर बढ़ रही है।
साथ ही इस पुस्तक में यह भी बताया गया है कि हम अपने इस अधिकार का प्रयोग कैसे करें।
Book Details
-
ISBN9788126713530
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पाठकों को यह पढ़कर बेहद आश्चर्य होगा कि भारतीय क़ानून के किसी भी अधिनियम में माँ, माता, जननी, यानी मदर को परिभाषित नहीं किया गया है। द जेनेरल क्लासेस एक्ट की धारा 3, अप-धारा 20 में बाप, पिता यानी ‘फादर’ को तो परिभाषित किया गया है, लेकिन माँ को नहीं। माँ को परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं थी या क़ानून निर्माता पुरुषों ने जानबूझकर इसे भुला दिया? ऐसा क्यों और कैसे हुआ—कहना कठिन है। शायद इसलिए कि माँ एक निश्चित सत्य है और पिता मात्र अनुमान या अनिश्चित तथ्य, जिसे परिभाषित करना अनिवार्य है। कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति डॉ. ए.एस. आनन्द और फसौद्दीन के सामने यह गम्भीर प्रश्न आ खड़ा हुआ कि माँ शब्द की परिभाषा में, सौतेली माँ भी शामिल है? क्या आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 के अन्तर्गत सौतेली माँ को भी अपने सौतेले बेटे से गुज़ारा भत्ता पाने का अधिकार है या नहीं?
RTI Kaise Aayee!
- Author Name:
Aruna Roy +1
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्यावर की गलियों से उठकर राज्य की विधानसभा से होते हुए संसद के सदनों और उसके पार विकसित होते एक जन आन्दोलन को मैंने बड़े उत्साह के साथ देखा है। यह पुस्तक, अपनी कहानी की तर्ज पर ही जनता के द्वारा और जनता के लिए है। मैं ख़ुद को इस ताक़तवर आन्दोलन के एक सदस्य के रूप में देखता हूँ।’’ —कुलदीप नैयर; मूर्धन्य पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता। ‘‘यह कहानी हाथी के ख़िलाफ़ चींटियों की जंग की है। ‘एमकेएसएस’ ने चींटियों को संगठित करके राज्य को जानने का अधिकार क़ानून बनाने के लिए बाध्य कर डाला। गोपनीयता के नाम पर हाशिये के लोगों को हमेशा अपारदर्शी व सत्ता-केन्द्रित राज्य का शिकार बनाया गया लेकिन वह ज़मीन की ताक़त ही थी जिसने संसद को यह क़ानून गठित करने को प्रेरित किया जैसा कि हमारे संविधान की प्रस्तावना में निहित है, यह राज्य ‘वी द पीपल’ (जनता) के प्रति जवाबदेह है। पारदर्शिता, समता और प्रतिष्ठा की लड़ाई आज भी जारी है...।’’ —बेजवाड़ा विल्सन; ‘सफ़ाई कर्मचारी आन्दोलन’ के सह-संस्थापक, ‘मैग्सेसे पुरस्कार’ से सम्मानित। ‘‘यह एक ऐसे क़ानून के जन्म और विकास का ब्योरा है जिसने इस राष्ट्र की विविधताओं और विरोधाभासों को साथ लेते हुए भारत की जनता के मानस पर ऐसी छाप छोड़ी है जैसा भारत का संविधान बनने से लेकर अब तक कोई क़ानून नहीं कर सका। इसे मुमकिन बनानेवाली माँगों और विचारों के केन्द्र में जो भी लोग रहे, उन्होंने इस परिघटना को याद करते हुए यहाँ दर्ज किया है...यह भारत के संविधान के विकास के अध्येताओं के लिए ही ज़रूरी पाठ नहीं है बल्कि उन सभी महत्त्वाकांक्षी लोगों के लिए अहम है जो इस संकटग्रस्त दुनिया के नागरिकों के लिए लोकतंत्र के सपने को वास्तव में साकार करना चाहते हैं।’’ —वजाहत हबीबुल्ला; पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त, केन्द्रीय सूचना आयोग। ‘‘देश-भर के मज़दूरों और किसानों के लिए न्याय व समता के प्रसार में बीते वर्षों के दौरान ‘एमकेएसएस’ का काम बहुमूल्य रहा है। इस किताब को पढऩा एक शानदार अनुभव से गुज़रना है। यह आरम्भिक दिनों से लेकर अब तक क़ानून के विकास की एक कहानी है। इस कथा में सक्रिय प्रतिभागी जो तात्कालिक अनुभव लेकर सामने आते हैं, वह आख्यान को बेहद प्रासंगिक और प्रभावी बनाता है।’’ —श्याम बेनेगल; प्रतिष्ठित फ़िल्मकार और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध नागरिक। ‘‘हाल के वर्षों में आरटीआइ सर्वाधिक अहम क़ानूनों में एक रहा है। इसे यदि क़ायदे से लागू किया जाए तो इसका इस्तेमाल शहरी और ग्रामीण ग़रीबों को उनकी ज़िन्दगी के बुनियादी हक़ दिलवाने और कुछ हद तक सामाजिक न्याय सुनिश्चित कराने में किया जा सकता है।’’ —रोमिला थापर; सुप्रसिद्ध इतिहासका
Prem Ke Pahle Basant Me
- Author Name:
Rashmi Bhardwaj
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ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।
Naagland
- Author Name:
Vikas Bhanti
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एक घना जंगल, एक अंजान आदिवासी समूह और रहस्यमयी नागमणि की खोज नागलेंड [प्रतिबंधित क्षेत्र] इस जगह से आगे का क्षेत्र पिञालियों का है। इस सीमा के आगे भारत के राज संविधान और धाराओं के कोई नियम लागू नहीं होते। पिञालियों की अस्मिता को बरकरार रखने के लिए भारत सरकार दृढ़ है। 5000 वर्ष पुरानी इस सभ्यता की रक्षा और सम्मान हमारा दायित्व है। अतः आपसे अनुरोध है कि कृपया इस सीमा से आगे जाने का प्रयास न करें।
Manusmriti
- Author Name:
Dr. Ramchandra Verma Shastri
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मनुष्य ने जब समाज व राष्ट्र्र के अस्तित्व तथा महत्त्व कौ मान्यता दी, तो उसके कर्तव्यों और अधिकारों की व्याख्या निर्धारित करने तथा नियमों के अतिक्रमण करने पर दण्ड व्यवस्था करने की भी आवश्यकता उत्पन्न हुई । यही कारण है कि विभिन्न युगों में विभिन्न स्मृतियों की रचना हुई, जिनमें मनुस्मृति को विशेष महत्व प्राप्त है । मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हज़ार पांच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित्त आदि अनेक विषयों का उल्लेख है। ब्रिटिश शासकों ने भी मनुस्मृति को ही आधार बनाकर ' इण्डियन पेनल कोड ' बनाया तथा स्वतन्त्र भारत की विधानसभा ने भी संविधान बनाते समय इसी स्मृति को प्रमुख आधार माना । व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास तथा सामाजिक व्यवस्था को सुनिश्चित रूप देने व व्यक्ति की लौकिक उन्नति और पारलौकिक कल्याण का पथ प्रशस्त करने में मनुस्मृति शाश्वत महत्त्व का एक परम उपयोगी शास्त्र मथ है । वास्तव में मनुस्मृति भारतीय आचार-संहिता का विश्वकोश है, जो भारतीय समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।
Saahi & Sudhir
- Author Name:
Yogita Warde
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“साही '&' सुधीर” दोस्ती, प्रेम और आकर्षण पर आधारित उपन्यास है। यह उपन्यास सभी पीढ़ियों को अपने समय, जीवन और कहानीसे वाकिफ कराता है, यह एक प्यारी सी कहानी है जिसमें साही और सुधीर बचपन के दोस्त हैं। सुधीर पेंटिंग बनाता है और साहीलेखिका है, जब साही सुधीर के जीवन में आयी तब उसने अपने जीवन में कई बदलाव महसूस किए। दोनों अच्छे दोस्त हैं लेकिन कुछसमय बाद सुधीर और साही दोनों को एहसास होता है कि वे एक दूसरे से प्यार करते हैं लेकिन तब तक बहुत देर हो जाती है, फिर क्याहोता है? क्या वे फिर कभी मिलेंगे? क्या वे अपने प्यार का इजहार करेंगे? क्या पेंटिंग और लेखन दोनों का आपस में जुड़ पाते हैं? ऐसेबहुत से सवाल हैं, और जवाब के लिए आपको "साही '&' सुधीर” उपन्यास पढ़ना होगा। यह उपन्यास आपके दैनिक जीवन के साथआसानी से जुड़ सकता है। इस उपन्यास में स्कूली जीवन, दोस्ती और अलगाव के कई उतार-चढ़ाव शामिल हैं जो हर किसी को यहसोचने पर मजबूर करते हैं कि अब आगे क्या होगा, हिंदी साहित्य में लेखिका की यह सर्वश्रेष्ठ पहली रचना है एक परिपक्व कलमआपकी समीक्षाओं के साथ-साथ आलोचना की भी प्रतीक्षा कर रही है, ताकि अगले उपन्यास में आपके सामने और बेहतर काम किया जा सके।
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