The DMK Years: Ascent, Descent, Survival
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On 17 September 1949, C.N. Annadurai (Anna) founded the DMK after his split with Periyar E.V. Ramaswamy. The DMK slowly but surely caught the imagination of the Tamil masses. In 1962, faced with the prospect of a ban, the party shed its separatist agenda and in 1967, the DMK attained power for the first time in Tamil Nadu. Since then, it has remained a potent political force, first under M. Karunanidhi and recently under M.K. Stalin, who succeeded him. Weathering many a political storm, including the 1972 split when its mascot, M.G. Ramachandran (MGR) broke away levelling corruption charges, its ejection from power in 1976 during the Emergency, the second dismissal in 1991 for its alleged dalliance with the Tamil Tigers of Sri Lanka, and the debilitating split in 1993, the party has proved resilient. It was voted back to power in Tamil Nadu in 2021. The DMK’s pioneering public distribution system and welfare populism have been a model for other states. Of late, the party has touted its ‘Dravidian Model’ of development as a viable national alternative. Its renewed emphasis on Tamil cultural nationalism and cooperative federalism aims to counter the current majoritarian political narrative. Yet, seventy-five years later, the DMK is more than ever under assault from caste and ultra-nationalist elements and persisting charges of unjust enrichment and dynastic politics. At this pivotal moment in history, as the ethos of Indianness is being redefined, veteran political observer and commentator R. Kannan explores the trajectory of the DMK and its future direction. Drawing on a substantial body of first-hand accounts, The DMK Years narrates the story of the party objectively and in its entirety, making this volume essential to understanding the contours of Tamil Nadu politics.
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On 17 September 1949, C.N. Annadurai (Anna) founded the DMK after his split with Periyar E.V. Ramaswamy. The DMK slowly but surely caught the imagination of the Tamil masses. In 1962, faced with the prospect of a ban, the party shed its separatist agenda and in 1967, the DMK attained power for the first time in Tamil Nadu. Since then, it has remained a potent political force, first under M. Karunanidhi and recently under M.K. Stalin, who succeeded him.
Weathering many a political storm, including the 1972 split when its mascot, M.G. Ramachandran (MGR) broke away levelling corruption charges, its ejection from power in 1976 during the Emergency, the second dismissal in 1991 for its alleged dalliance with the Tamil Tigers of Sri Lanka, and the debilitating split in 1993, the party has proved resilient. It was voted back to power in Tamil Nadu in 2021.
The DMK’s pioneering public distribution system and welfare populism have been a model for other states. Of late, the party has touted its ‘Dravidian Model’ of development as a viable national alternative. Its renewed emphasis on Tamil cultural nationalism and cooperative federalism aims to counter the current majoritarian political narrative.
Yet, seventy-five years later, the DMK is more than ever under assault from caste and ultra-nationalist elements and persisting charges of unjust enrichment and dynastic politics.
At this pivotal moment in history, as the ethos of Indianness is being redefined, veteran political observer and commentator R. Kannan explores the trajectory of the DMK and its future direction. Drawing on a substantial body of first-hand accounts, The DMK Years narrates the story of the party objectively and in its entirety, making this volume essential to understanding the contours of Tamil Nadu politics.
Book Details
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ISBN9780670097890
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Pages752
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Avg Reading Time25 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIN
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- Description: प्रोफ़ेसर जे.एस. ग्रेवाल और प्रोफ़ेसर इंदु बंगा द्वारा सम्पादित यह पुस्तक भारत के सामान्य इतिहास के सन्दर्भ में सिख पंथ के इतिहास को स्थापित करके खालसा की त्रिशताब्दी मनाने का एक प्रयास है। इस पुस्तक में संकलित लेख 1935 में उसकी स्थापना के बाद से भारतीय इतिहास कांग्रेस के वार्षिक सत्रों में प्रस्तुत लेखों में से चुने गए हैं। ये 18वीं से 20वीं सदी तक के सिख इतिहास के सभी प्रमुख चरणों को समेटते हैं। ये विश्व के प्रमुख सार्वभौम धर्मों में एक, सिख धर्म के विकास को उजागर करते हैं और इसके लिए उन समृद्ध धाराओं को स्पष्ट करते हैं जो भारत की समन्वित राष्ट्रीय धरोहर में सिखों के सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक इतिहास के योगदान की उपज रही हैं।
Vaidehi Okhad Janai : Meera Aur Pashchimi Gyan-Mimansa
- Author Name:
Madhav Hada
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Description:
‘वैदहि ओखद जाणै’ पुस्तक में मीरां को उसकी अपनी सांस्कृतिक पारिस्थितिकी से अलग, पश्चिमी विद्वत्ता के सांस्कृतिक मानकों पर समझने-परखने के प्रयासों की पड़ताल है। पश्चिमी विद्वत्ता से मीरां का सम्बन्ध उपनिवेशकाल से ही है। कर्नल जेम्स टॉड ने मीरां को ‘रहस्यवादी संत-भक्त और पवित्रात्मा कवयित्री’ की पहचान दी, जबकि जर्मन विद्वान् हरमन गोएत्ज़ ने ख़ास पश्चिमी नज़रिये से उसके जीवन की पुनर्रचना की। फ्रांसिस टैफ़्ट सहित कुछ पश्चिमी विद्वानों ने उसके जीवन को ‘किंवदंती’ में सीमित कर दिया, जबकि स्ट्रैटन हौली खींच-खाँचकर उसकी कविता के विरह को भारतीय समाज की कथित लैंगिक असमानता में ले गए। विनांद कैलवर्त, स्ट्रैटन हौली आदि ने मीरां को बहुत मनोयोग से पढ़ा-समझा, लेकिन उन्होंने उसकी कविता को पांडुलिपीय प्रमाणों के अभाव, भाव विषयक बहुवचन और भाषा सम्बन्धी वैविध्य के कारण कुछ हद तक अप्रामाणिक ठहरा दिया।
टॉड का कैनेनाइजेशन औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के विस्तार व स्थिरता और व्यापक नीति का हिस्सा था, जबकि हरमन गोएत्ज की मीरां के जीवन की पुनर्रचना पश्चिमी मनीषा के जीवन को देखने-समझने के विभक्त नज़रिये का नतीजा है। मीरां की पहचान और मूल्यांकन में प्रयुक्त अन्य कसौटियों—‘ऑथेंटिक’, एकरूपता, संगति आदि का भी दरअसल मीरां के जीवन और कविता की पहचान और मूल्यांकन में इस्तेमाल बहुत युक्तिसंगत नहीं है। पश्चिम का सांस्कृतिक बोध अलग प्रकार का है, क्योंकि इसका विकास चर्च के अनुशासन में हुआ है, जबकि भारतीय सांस्कृतिक बोध इस तरह के किसी अनुशासन से हमेशा बाहर, स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ। भक्ति आन्दोलन तो भारतीय मनीषा की स्वातंत्र्य चेतना का विस्फोट है और स्वतंत्रता हमेशा बहुवचन में ही चरितार्थ होती है। मीरां की कविता भी इसीलिए श्रुत और स्मृत पर निर्भर ‘जीवित’ कविता है और इसका स्वर बहुवचन है।
इस पुस्तक में मीरां सम्बन्धी पश्चिमी विद्वत्ता की इन धारणाओं का प्रत्याख्यान है। यह प्रत्याख्यान इसलिए ज़रूरी है कि आम भारतीय मीरां के सम्बन्ध में अपनी सदियों से चली आ रही धारणाओं के प्रति मन में किसी संशय को जगह देने से पहले विचार करें।
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