Pashchatya Itihas Darshan Evam Itihas Lekhan
(0)
Author:
Heramb ChaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
225
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Available
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"अराजक का अव्यवस्थित असंख्य तथ्यों के मध्य एक क्रम स्थापित करके मानव के विकास-क्रम को अनुरेखित करना ही इतिहास का विवरण प्रस्तुत करना होता है। वैसे इस अर्थ को दोनों रूपों में देखा-समझा जा सकता है-प्रथम तो संरचना के स्तर पर और दूसरे, उसके लेखन अथवा चित्रण के उद्देश्य के माध्यम से!""</p> <p>"द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् शीत-युद्ध से लेकर भू- मंडलीकरण एवं उदारवाद से होते हुए सोवियत संघ के विघटन और 'वैश्विक ग्राम' की परिकल्पना के बाद के क्रम में जिस प्रकार, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर- धुनिकतावाद, उपाक्रमी इतिहास लेखन से लेकर उत्तर-सत्य ('पोस्ट-टुथ') का दौर चल रहा है उसमें भाषाई बाजीगरी (सिमेटिक जग्लरी) में एक अजब दुविधापूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह दो विरोधाभासी विशेषताओं से युक्त काल प्रतीत हो रहा है, जिसमें एक ओर, मानव विश्व एकीकृत लगता है किन्तु दूसरी तरफ एक निश्चित ही भीषण अराजकता का काल है।"<br>"...एक ओर वह तकनीकी परिवर्तनों की स्वीकृति सेजूझता है और दूसरी तरफ तकनीकी एकता से संगठितहोने का लाभार्थी भी है। वैसे तो विश्व संक्रमणशीलहोने के नाते सदैव ही अनिर्णायक एवं अराजक-साप्रतीत होता है... पहली बार इस अराजकता को'तकनीकी उत्प्रेरक' ने उसे एक निश्चित ही अलग दशाऔर दिशा प्रदान की है। इसी अराजकता के कारण हम 'टुथ' या ऐतिहासिक तथ्यों की खोज में 'पोस्ट टुथ' तक पहुंच गए हैं।"
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"अराजक का अव्यवस्थित असंख्य तथ्यों के मध्य एक क्रम स्थापित करके मानव के विकास-क्रम को अनुरेखित करना ही इतिहास का विवरण प्रस्तुत करना होता है। वैसे इस अर्थ को दोनों रूपों में देखा-समझा जा सकता है-प्रथम तो संरचना के स्तर पर और दूसरे, उसके लेखन अथवा चित्रण के उद्देश्य के माध्यम से!""</p>
<p>"द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् शीत-युद्ध से लेकर भू- मंडलीकरण एवं उदारवाद से होते हुए सोवियत संघ के विघटन और 'वैश्विक ग्राम' की परिकल्पना के बाद के क्रम में जिस प्रकार, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर- धुनिकतावाद, उपाक्रमी इतिहास लेखन से लेकर उत्तर-सत्य ('पोस्ट-टुथ') का दौर चल रहा है उसमें भाषाई बाजीगरी (सिमेटिक जग्लरी) में एक अजब दुविधापूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह दो विरोधाभासी विशेषताओं से युक्त काल प्रतीत हो रहा है, जिसमें एक ओर, मानव विश्व एकीकृत लगता है किन्तु दूसरी तरफ एक निश्चित ही भीषण अराजकता का काल है।"<br>"...एक ओर वह तकनीकी परिवर्तनों की स्वीकृति सेजूझता है और दूसरी तरफ तकनीकी एकता से संगठितहोने का लाभार्थी भी है। वैसे तो विश्व संक्रमणशीलहोने के नाते सदैव ही अनिर्णायक एवं अराजक-साप्रतीत होता है... पहली बार इस अराजकता को'तकनीकी उत्प्रेरक' ने उसे एक निश्चित ही अलग दशाऔर दिशा प्रदान की है। इसी अराजकता के कारण हम 'टुथ' या ऐतिहासिक तथ्यों की खोज में 'पोस्ट टुथ' तक पहुंच गए हैं।"
Book Details
-
ISBN9788119133642
-
Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रो. राधाकुमुद मुखर्जी की गणना देश के शीर्षस्थ इतिहासकारों में होती है और परम्परागत दृष्टि से इतिहास लिखनेवालों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. मुखर्जी के वे भाषण हैं, जो उन्होंने सर विलियम मेयर भाषणमाला के अन्तर्गत मद्रास विश्वविद्यालय में दिए थे। इन निबन्धों में भारत के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन और उसके विजय-अभियानों की चर्चा करते हुए उन सारे कारकों का गहराई से अध्ययन किया गया है जो एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण में और फिर उसे स्थायित्व प्रदान करने में सहायक हुए। चन्द्रगुप्त के कुशल प्रशासन और उसकी सुविचारित आर्थिक नीतियों की परम्परा अशोक के काल तक अक्षुण्ण रहती है। आर्थिक जीवन का राज्य द्वारा नियंत्रण तथा उद्योगों का राष्ट्रीयकरण मौर्यकाल की विशेषता थी। प्रो. मुखर्जी का यह अध्ययन चौथी शताब्दी ई.पू. की भारतीय सभ्यता के विवेचन-विश्लेषण के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र की बहुत सारी ऐसी सामग्री का समुचित उपयोग किया गया है, जिसके सम्बन्ध में या तो काफ़ी जानकारी नहीं थी या जिसकी तरफ़ काफ़ी ध्यान नहीं दिया गया था। साथ ही, शास्त्रीय रचनाओं—संस्कृत, बौद्ध एवं जैन ग्रन्थों के मूल पाठों और अशोक के शिलालेखों—जैसे विभिन्न स्रोतों से लिए गए प्रमाणों का सम्पादन और तुलनात्मक अध्ययन भी यहाँ मौजूद है। भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के अन्वेषक विद्वानों ने इस पुस्तक को बहुत ऊँचा स्थान दिया है और यह आज तक इतिहास के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों के लिए एक मानक ग्रन्थ के रूप में मान्य है।
Gandhi aur Nehru
- Author Name:
Deepak Malik
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भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन वस्तुत: आम सहमतियों और व्यापक संयुक्त मोर्चों एवं सम्मिलित जन-आन्दोलन को लेकर राजनीतिशास्त्र की दुनिया में एक ‘नई गतिकी’ को निर्मित करता है, यह विश्व इतिहास में एक नई कड़ी है।
गांधी विमर्श तो न केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में बड़े दमख़म के साथ चल रहा है, पर जवाहरलाल के बारे में इस दौर में कुछ ही पुस्तकें बाज़ार में आ रही हैं, गांधी-नेहरू साझा विमर्श एक देर से ही सही लेकिन निहायत ही मौज़ूँ सिलसिला है।
वैश्वीकरण के आक्रामक दौर में नेहरू जो एक स्वतंत्र वैकल्पिक अर्थतंत्र और राज्य सत्ता के स्थपति थे, उन्हें भुला देना अस्वाभाविक नहीं लगता है। इस दौर में मौजूदा राज्य सत्ता से लेकर प्रमुख विपक्ष तक ने वैश्वीकरण और उदारीकरण को स्वीकार कर लिया है। साम्प्रदायिकता की तस्वीर में भी 1992 और 2002 के बाद शताब्दियों से चल रही मुश्तरका संस्कृति में दीमक लग गई है। गांधी को तो वैश्वीकरण के स्टीमरोलर ने बेरहमी से ज़मींदोज़ कर दिया है। ऐसे दौर में गांधी-नेहरू के ऐतिहासिक साझा और उनके कृतित्व पर पुन: रोशनी पड़नी चाहिए।
प्रस्तुत पुस्तक दो महान स्वप्नद्रष्टाओं की यथार्थसम्मत विचारधारा को सप्रमाण रेखांकित करती है।
Jinna : Ek Punardrishti
- Author Name:
Virendra Kumar Baranwal
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साधारण भारतीयों के मन में जिन्ना की छवि एक निहायत नीरस, अन्तर्मुखी, तार्किक, अधार्मिक, भावना-शून्य, मनहूस, हिसाबी, सिर से पैर तक पश्चिमी सभ्यता में रँगे, चोटी के वकील के साथ एक अपराजेय राजनीतिक सौदेबाज़ की रही है। जिन्ना के व्यक्तित्व की इन विशेषताओं को झुठलाना जहाँ निहायत दुश्वार है, वहीं मात्र इन्हीं विशेषताओं में उन्हें सीमित करना वस्तुतः सच्चाई से मुँह मोड़ना होगा। जिन्ना के जीवन और व्यक्तित्व के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो बहुत कम उजागर हो पाए हैं। फलस्वरूप अक्सर उनका एकांगी मूल्यांकन ही हो पाया है। इतिहास मात्र घटनाओं का संकुल और महत्त्वाकांक्षियों की नियति के उतार-चढ़ाव का दस्तावेज़ ही नहीं है। उसके विराट मंच पर उभरे काल-प्रेरित अभिनेताओं के मनोजगत की उथल-पुथल से संरचित व्यक्तित्वों के समझौते-टकराव और घात-प्रतिघात उसकी धारा को प्रभावित करने में निर्णयात्मक भूमिका निभाते हैं। कुछ इसी विश्वास के फलस्वरूप जिन्ना के जीवन पर विहंगम दृष्टि डालते हुए उन्हें उनके महत्त्वपूर्ण समकालीनों के साथ-साथ अलग-अलग समझने-परखने की कोशिश इस किताब में मिलेगी। उनकी पत्नी रत्ती की गहन संवेदनशीलता, तीक्ष्ण मेधा, व्यक्तित्व का अप्रतिम सम्मोहन, समस्त प्राणी-जगत के लिए करुणा विगलित हृदय, गहरे राजनीतिक-सामाजिक सरोकार और धार्मिक बाह्याडम्बर के प्रति वितृष्णा जैसे गुण उन्हें अपने समय का एक अत्यन्त विशिष्ट व्यक्तित्व सिद्ध करते हैं। इस पुस्तक में उनके विषय में भी एक विस्तृत अध्याय रखा गया है। ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपिता बनने के पहले जिन्ना हिन्दुस्तान की धरती के एक महान और सुयोग्य पुत्र थे। उनके लगभग आधी सदी के राजनीतिक जीवन में समय-समय पर उभरे सोच में आज भी ऐसा बहुत कुछ समावेशी और रचनात्मक है, जो अप्रासंगिक नहीं हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि गांधी और नेहरू की तरह जिन्ना भी भारतीय उपमहाद्वीप में समय-समय पर एक पुनर्दृष्टि की माँग करते रहेंगे। इतिहास के अपने ढंग के एक अद्वितीय व्यक्तित्व के नाते यह उनका हक़ है।
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