Pashchatya Itihas Darshan Evam Itihas Lekhan
(0)
Author:
Heramb ChaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
600
480 (20% off)
Available
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"अराजक का अव्यवस्थित असंख्य तथ्यों के मध्य एक क्रम स्थापित करके मानव के विकास-क्रम को अनुरेखित करना ही इतिहास का विवरण प्रस्तुत करना होता है। वैसे इस अर्थ को दोनों रूपों में देखा-समझा जा सकता है-प्रथम तो संरचना के स्तर पर और दूसरे, उसके लेखन अथवा चित्रण के उद्देश्य के माध्यम से!""</p> <p>"द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् शीत-युद्ध से लेकर भू- मंडलीकरण एवं उदारवाद से होते हुए सोवियत संघ के विघटन और 'वैश्विक ग्राम' की परिकल्पना के बाद के क्रम में जिस प्रकार, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर- धुनिकतावाद, उपाक्रमी इतिहास लेखन से लेकर उत्तर-सत्य ('पोस्ट-टुथ') का दौर चल रहा है उसमें भाषाई बाजीगरी (सिमेटिक जग्लरी) में एक अजब दुविधापूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह दो विरोधाभासी विशेषताओं से युक्त काल प्रतीत हो रहा है, जिसमें एक ओर, मानव विश्व एकीकृत लगता है किन्तु दूसरी तरफ एक निश्चित ही भीषण अराजकता का काल है।"<br>"...एक ओर वह तकनीकी परिवर्तनों की स्वीकृति सेजूझता है और दूसरी तरफ तकनीकी एकता से संगठितहोने का लाभार्थी भी है। वैसे तो विश्व संक्रमणशीलहोने के नाते सदैव ही अनिर्णायक एवं अराजक-साप्रतीत होता है... पहली बार इस अराजकता को'तकनीकी उत्प्रेरक' ने उसे एक निश्चित ही अलग दशाऔर दिशा प्रदान की है। इसी अराजकता के कारण हम 'टुथ' या ऐतिहासिक तथ्यों की खोज में 'पोस्ट टुथ' तक पहुंच गए हैं।"
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"अराजक का अव्यवस्थित असंख्य तथ्यों के मध्य एक क्रम स्थापित करके मानव के विकास-क्रम को अनुरेखित करना ही इतिहास का विवरण प्रस्तुत करना होता है। वैसे इस अर्थ को दोनों रूपों में देखा-समझा जा सकता है-प्रथम तो संरचना के स्तर पर और दूसरे, उसके लेखन अथवा चित्रण के उद्देश्य के माध्यम से!""</p>
<p>"द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् शीत-युद्ध से लेकर भू- मंडलीकरण एवं उदारवाद से होते हुए सोवियत संघ के विघटन और 'वैश्विक ग्राम' की परिकल्पना के बाद के क्रम में जिस प्रकार, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर- धुनिकतावाद, उपाक्रमी इतिहास लेखन से लेकर उत्तर-सत्य ('पोस्ट-टुथ') का दौर चल रहा है उसमें भाषाई बाजीगरी (सिमेटिक जग्लरी) में एक अजब दुविधापूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह दो विरोधाभासी विशेषताओं से युक्त काल प्रतीत हो रहा है, जिसमें एक ओर, मानव विश्व एकीकृत लगता है किन्तु दूसरी तरफ एक निश्चित ही भीषण अराजकता का काल है।"<br>"...एक ओर वह तकनीकी परिवर्तनों की स्वीकृति सेजूझता है और दूसरी तरफ तकनीकी एकता से संगठितहोने का लाभार्थी भी है। वैसे तो विश्व संक्रमणशीलहोने के नाते सदैव ही अनिर्णायक एवं अराजक-साप्रतीत होता है... पहली बार इस अराजकता को'तकनीकी उत्प्रेरक' ने उसे एक निश्चित ही अलग दशाऔर दिशा प्रदान की है। इसी अराजकता के कारण हम 'टुथ' या ऐतिहासिक तथ्यों की खोज में 'पोस्ट टुथ' तक पहुंच गए हैं।"
Book Details
-
ISBN9788119133598
-
Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: The dimension of Dattopant Thengadi, founder of the largest trade union movement in India, that has been brought out in this volume is his role as an activist parliamentarian through his debates in the Rajya Sabha for two terms from 1964 to 1976. What stands out from the extracts of his speeches in Parliament are his meticulous presentation of facts, highly referenced propositions and dignified response to counter viewpoints. His intense intellectualism and his diverse fields of knowledge are manifest in the range of subjects Thengadi handled, each an area of specialisation for an expert. This volume is a lesson for young and elder parliamentarians of today on how to be an efficient, a competent and an elegant parliamentarian. To those interested in post-independence India’s political evolution, this volume provides a window through Thengadi’s political activism in his two terms in Parliament which spanned some of the most momentous developments in India’s political history after independence.
Vikasit Bihar Ki Khoj
- Author Name:
Nitish Kumar
- Book Type:

- Description: सन् 1957 में प्रधानमंत्री नेहरू ने श्री अटल बिहारी वाजपेयी के संदर्भ में लोकसभा में कहा था-' ' बोलने के लिए वाणी की जरूरत होती है, किंतु मौन के लिए वाणी और विवेक दोनों की जरूरत पड़ती है। '' बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के विषय में भी शायद पंडित नेहरू का यह वाक्यांश सटीक बैठता है। मुख्यमंत्री नीतीश बाबू चाहे प्रतिपक्ष में रहे या पक्ष में, सदन के एक-एक पल का उपयोग किया, ताकि संसदीय जनतंत्र मजबूत हो एवं जन- भागीदारी का यह मुखर मंच अपने मकसद में कामयाब हो। वे कर्पूरी ठाकुर की राजनीति के कायल रहे हैं। उन्होंने राजनीति में सिद्धांतों और मूल्यों की पैरवी की और इन्हें सही मायनों में अपनाया भी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनके कार्यकाल में बिहार राज्य का कायाकल्प हो गया है। प्रस्तुत पुस्तक में नीतीश बाबू के बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कार्यों का विवेचन किया गया है। एक राजनेता के रूप में वे अपनी वाणी से कुछ न कहकर अपना उत्तर रचनात्मक कार्यो के रूप में देते हैं। उनकी मान्यता है कि सुशासन का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। राजनीति में शुचिता और पारदर्शिता का प्रमाण देनेवाले इन लेखों से आम आदमी का राजनीतिज्ञों में और विकास के कामों में विश्वास बढेगा।
Santal : Paramparayen Evam Sansthan
- Author Name:
P.O. Boding
- Book Type:

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Description:
‘सन्ताल : परम्पराएँ एवं संस्थान’ आदिवासी अध्ययन और मानवविज्ञान विषयक मानक पुस्तकों में शुमार है। मिशनरी-विद्वान पी.ओ. बोडिंग की इस कृति को भारतीय आदिवासी समाज और संस्कृति, विशेषकर सन्ताल सम्बन्धी अध्ययन में एक अनिवार्य पाठ माना जाता है।
भारत में नॉर्वेजियन सन्ताल मिशन के संस्थापक रेवरेंड एल.ओ. स्क्रेफ्स्रड (1840-1910) ने 1887 में सन्तालों के लिए एक मार्गदर्शिका प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था, 'होरकारेन मारे हापराम्को रेक कथा’ (Horkaren Mare Hapramko reak Katha)। सन्ताल समाज में प्रचलित तमाम मान्यताओं, परम्पराओं और संस्थानों के बारे में जानकारी देने वाली इस पुस्तक को, इस समाज के कुछ प्रतिष्ठित सदस्यों के अनुरोध पर बोडिंग ने 1916 और 1929 में पुनः सम्पादित किया। इस क्रम में बोडिंग ने कुछ नई सामग्री भी जोड़ी। लेकिन उनके जीवित रहते यह अनुवाद प्रकाशित नहीं हो सका और पांडुलिपि प्रो.ओ. सोलबर्ग के पास सुरक्षित रही। अन्ततः स्टेन नो द्वारा सम्पादित किए जाने के बाद इसका प्रकाशन हुआ।
इस पुस्तक में जन्म से लेकर मृत्यु तक सन्ताल जीवन के हरेक संस्कार, आचार, व्यवहार, विश्वास, विधान, संस्थान आदि का प्रामाणिक ब्योरा दिया गया है। इसमें सन्ताल जीवन और संस्कृति से लेखक का गहरा लगाव स्पष्ट है जिसके बिना ऐसा मूलगामी अध्ययन और दस्तावेजीकरण सम्भव नहीं हो सकता था।
सन्ताली विरासत को समग्रता में जानने-समझने के इच्छुक हरेक व्यक्ति के लिए, एक पठनीय ग्रन्थ है।
Pakistan Balochistan Ki Paheli
- Author Name:
Shri Tilak Devashar
- Book Type:

- Description: पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान एक ऐसा जटिल क्षेत्र है जो संघर्ष और दुश्मनी से भरा हुआ है, जिसमें स्थायी विद्रोह और सांप्रदायिक हिंसा से लेकर आतंकी हमले और मानवाधिकारों के उल्लंघन की भयावह स्थिति है। पाकिस्तान पर अपनी तीसरी पुस्तक में तिलक देवेशर विश्लेषण करते हैं कि बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए इतना कष्टकारी क्यों है? इस क्षेत्र की गहरी समझ के साथ वे 1948 में पाकिस्तान के लिए मजबूर कलात की रियासत के लिए गहरी पैठ बलोच के अलगाव की जड़ें ढूँढ़ते हैं। इस अलगाव को राज्य के प्रांत के बड़े पैमाने पर शोषण से और अधिक मजबूत किया गया है, जिससे बड़े पैमाने पर सामाजिक-आर्थिक अभाव हो रहा है। क्या बलूच विद्रोह पाकिस्तान के हस्तक्षेप का खतरा पैदा कर रहा है? एक स्वतंत्र बलूचिस्तान की तरह क्या है? क्या सूबे की स्थिति पाकिस्तान के लिए अपूरणीय हो गई है? क्या पाकिस्तान राज्य और बलोच राष्ट्रवादियों के परस्पर विरोधी बयानों के बीच कोई बैठक का आधार है? देवेशर इन मुद्दों की जाँच एक स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण विवेक के साथ करते हैं, जो बलूच पहेली के अंतर्मन में जाता है।
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