Smriti Chitra
Author:
Mahadevi VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Unavailable
“संस्मरण में स्मृति का सामंजस्यपूर्ण पुनः अवतरण है। अतः इसमें हमारी मानसिक क्रियाएँ अधिक सक्रिय होकर ही स्मृति के आधारों से हमें एक आत्मीय सम्बन्ध में जोड़ती हैं।</p>
<p>“यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अतीत की दुःखद स्मृतियाँ भी पुनर्जीवन पाकर सुखद अनुभूति का कारण बन जाती हैं। अतीत-कथाएँ इसी से नित्य रसमयी हैं। स्मृति के आधार जब समय का दीर्घ व्यवधान पार कर लौटते हैं, तब हमें मित्र-मिलन की विस्मयमयी सुखद अनुभूति होती है।</p>
<p>“संस्मरण में हम अपनी स्मृति के आधारों पर से समय की धूल पोंछ-पोंछकर उन्हें अपने मनोजगत के निभृत कक्ष में बैठाकर उनके साथ जीवित रहते हैं और अपने आत्मीय सम्बन्धों को पुनः जीवित करते हैं। इस स्मृति-मिलन में मानो हमारा मन बार-बार दोहराता है, हमें आज भी तुम्हारा अभाव है।</p>
<p>“मेरे संस्मरण उन स्मरणीयों के स्मरण हैं, जिनके अभाव की मुझे तीव्र अनुभूति होती है, चाहे वे मनुष्य हों चाहे पशु-पक्षी।”</p>
<p>—महादेवी</p>
<p>(भूमिका से)।
ISBN: 9788171785735
Pages: 151
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Nandkishore Sukla
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- Description: बिहार के ग्राम जलालपुर, जिला मुजफ्फरपुर (वर्तमान वैशाली) में जन्मे बैकुंठ सुकुल उन स्वतंत्रता सेनानियों में थे, जो गुमनामी के अंधेरों में रहे हैं। उन्हें मुजफ्फरपुर के सत्र न्यायाधीश ने भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के प्रसिद्ध मुकदमे के इकबालिया गवाह फणीन्द्रनाथ घोष की हत्या के आरोप में फाँसी की सजा सुनाई थी। बंगाल और लाहौर सहित विभिन्न जगहों के 91 सरकारी गवाहों की सुनवाई में सुकुल जी के द्वारा 50 बचाव पक्ष के गवाहों को पेश करने के आग्रह को अस्वीकार कर दिया गया। बैकुंठ सुकुल को सजा सुनाते समय सत्र न्यायाधीश उन तीन निर्णायकों से असहमत रहा जिन्होंने बैकुंठ सुकुल को दोषी नहीं पाया बल्कि बहुमत छोड़कर एक निर्णायक से सहमत रहते हुए फैसला सुनाया गया और 14 मई,1934 को बैकुंठ नाथ सुकुल को फाँसी दे दी गई। यह पुस्तक तत्कालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में शहीद बैकुंठ सुकुल के मुकदमे की कार्यवाहियों को प्रामाणिकता से प्रस्तुत करती है। 24 फरवरी, 1934 का वह पत्र भी इस पुस्तक में शामिल में किया गया है, जो मुजफ्फरपुर के सत्र न्यायाधीश ने पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को लिखा था। उस पत्र में स्पष्ट किया गया था कि ‘बैकुंठ सुकुल द्वारा माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष बचाव वकील खड़ा करने का कोई अर्थ नहीं है।’ साथ ही यहाँ ‘लाहौर षड्यंत्र’ के मुकदमे के फैसले से जुड़े दस्तावेज भी हैं जो सुखदेव और उनके साथियों द्वारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध किया गया था। इन दस्तावेजों के अतिरिक्त इस पुस्तक में जहाँ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन गतिविधियों का खुलासा किया गया है, वहीं बिहार की राष्ट्रीय राजनीति में भूमि,जातियों, समुदाय और शिक्षा की सापेक्ष भूमिका पर प्रकाश भी डाला गया है।
Diddi : Shivani Ki Kahani
- Author Name:
Ira Pande
- Book Type:

- Description: ‘दिद्दी : शिवानी की कहानी’ में हम हिन्दी की अत्यन्त लोकप्रिय कथाकार शिवानी को उनकी बेटी की निगाहों से देखते हैं। यह भी कह सकते हैं कि यहाँ हमें वह शिवानी दिखती हैं जिन्हें हम उनकी साहित्यिक छवि में अक्सर नहीं पाते। हाँ, उनकी कहानियों और उनके पात्रों में हम ज़रूर उस स्त्री को पहचान सकते हैं जो एक ख़ास वातावरण में एक ख़ास दृष्टि से संसार को देख रही थी। यह किताब उनके इस वातावरण को भी प्रकाशित करती है, और उसके बीच बनती एक कथाकार की यात्रा को भी। एक भारतीय घर-परिवार की संस्तरीकृत संरचना में मानवीय संवेदना के अनेकानेक रंगों के साथ उन्होंने उसकी विडम्बनाओं को कैसे समझा और फिर उसे अपनी कथा ऋचाओं में अंकित किया, यह वृत्तान्त हमें यह जानने में भी मदद करता है। शिवानी के साथ इस पुस्तक में कुमाऊँनी समाज की संस्कृति और समाज के विभिन्न पक्षों से भी हमारा परिचय होता है, और उनकी कुछ चर्चित रचनाओं और उनकी पृष्ठभूमि से भी।
Main Pakistan Mein Bharat Ka Jasoos Tha
- Author Name:
Mohanlal Bhaskar
- Book Type:

- Description: जासूसी को लेकर विश्व की विभिन्न भाषाओं में अनेक सत्यकथाएँ लिखी गई हैं, जिनमें मोहनलाल भास्कर नामक भारतीय जासूस द्वारा लिखित अपनी इस आपबीती का एक अलग स्थान है। इसमें 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान उसके पाकिस्तान-प्रवेश, मित्रघात के कारण उसकी गिरफ़्तारी और लम्बी जेल-यातना का यथातथ्य चित्रण हुआ है। लेकिन इस कृति के बारे में इतना ही कहना नाकाफ़ी है क्योंकि यह कुछ साहसी और सूझबूझ-भरी घटनाओं का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि पाकिस्तान के तत्कालीन हालात का भी ऐतिहासिक विश्लेषण करती है। इसमें पाकिस्तान के तथाकथित भुट्टोवादी लोकतंत्र, निरन्तर मज़बूत होते जा रहे तानाशाही निज़ाम तथा धार्मिक कठमुल्लावाद और उसके सामाजिक-आर्थिक अन्तर्विरोधों को उघाड़ने के साथ-साथ भारत-विरोधी षड्यंत्रों के उन अन्तरराष्ट्रीय सूत्रों की भी पड़ताल की गई है, जिसके एक असाध्य परिणाम को हम ‘ख़ालिस्तानी’ नासूर की शक्ल में झेल रहे हैं। उसमें जहाँ एक ओर भास्कर ने पाकिस्तानी जेलों की नारकीय स्थिति, जेल-अधिकारियों के अमानवीय व्यवहार के बारे में बताया है, वहीं पाकिस्तानी अवाम और मेजर अय्याज अहमद सिपरा जैसे व्यक्ति के इंसानी बर्ताव को भी रेखांकित किया है।
Ramanand Sagar Ke Jeevan Ki Akath Kahani
- Author Name:
Prem Sagar
- Book Type:

- Description: 25 जनवरी, 1987 को ‘रामायण’ के पहले एपिसोड के प्रसारण के साथ ही भारतीय टेलीविजन हमेशा-हमेशा के लिए बदल गया। कुछ ही सप्ताह में पूरा देश इस सीरीज के आकर्षण में बँध गया। ‘रामायण’ के प्रसारण के दौरान सड़कें सूनी हो जाती थीं। सीरियल के समय पर न तो शादियाँ रखी जाती थीं, न राजनीतिक रैलियाँ। आज, तीन दशक बाद भी ऐसा कुछ नहीं जो उसका मुकाबला कर सके। इस अद्भुत घटना के सूत्रधार और बॉम्बे के सफल फिल्म निर्माता रामानंद सागर टेलीविजन की बेहिसाब क्षमता को पहचानने वाले कुछ प्रारंभिक लोगों में शामिल थे। पहली बार उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा राज कपूर की ‘बरसात’ (1949) के लेखक के रूप में मनवाया था। सन् 1961 से 1970 के दौरान सागर ने लगातार छह सिल्वर जुबली हिट्स लिखीं, प्रोड्यूस और डायरेक्ट कीं—‘घूँघट’, ‘जिंदगी’, ‘आरजू’, ‘आँखें’, ‘गीत’ और ‘ललकार’। ‘रामानंद सागर के जीवन की अकथ कहानी’, उनके पुत्र, प्रेम सागर की लिखी पुस्तक है, जो एक पुरस्कृत सिनेमेटोग्राफर हैं। यह पुस्तक एक दूरदर्शी के जीवन पर गहराई से नजर डालती है। इसमें 1917 में कश्मीर में सागर के जन्म और फिर 1947 में जब पाकिस्तानी कबाइलियों ने राज्य पर हमला किया तो किसी प्रकार वहाँ से बचकर निकलने से लेकर उनके बॉम्बे आने और उनके गौरवशाली कॅरियर का वर्णन है, जिसके सिर पर कामयाबी के ताज के रूप में ‘रामायण’ धारावाहिक की ऐतिहासिक सफलता सजी है।
Sansar Mein Nirmal Verma : Poorvarddh
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

- Description: इतिहास के भीतर जो घटनाएँ होती है, उनके पीछे कोई बहुत ही (अति पवित्र) सर्वमान्य नियम हो, ऐसा कोई ज़रूरी नही है। यह बोध जब आपको हो जाए तो यह ज़रूरी हो जाता है हम सृष्टि के अर्थ को ईश्वर या इतिहास में न देखकर उसे अपने नैतिक अर्थ में पाएँ, और मनुष्य ख़ुद इस नैतिकता का निर्माण करे। इस पुस्तक में शामिल एक साक्षात्कार में अस्तित्ववाद को लेकर अपने विचार व्यक्त करते हुए निर्मल वर्मा आगे कहते हैं कि उस दर्शन से जो बहुमूल्य चीज़ मैंने अपने लिए पाई वह यह कि ईश्वर और इतिहास से मुक्त होकर, यह आदमी पर निर्भर है कि वह अर्थ और नैतिकता को जन्म दे; क्या सही है, क्या ग़लत है, इसे तय करने की ज़िम्मेदारी वह ख़ुद उठाए। मार्क्सवाद से शुरु हुई अपनी वैचारिक यात्रा में अस्तित्ववाद के प्रति अपने आकर्षण को ज़रूरी क़दम मानते हुए वे इन साक्षात्कारों में अपने लेखक, अपने मनुष्य और अपने नागरिक के गहरे दायित्व बोध को बार-बार रेखांकित करते हैं। नई कहानी आन्दोलन में अपनी भूमिका को लेकर किए गए प्रश्न के जवाब में वे कहते हैं कि मेरी कोशिश सिर्फ़ यही थी कि मैं अपने अनुभवों को कितने प्रामाणिक स्तर पर व्यक्त कर पा रहा हूँ। अपनी रचना प्रक्रिया और लेखकीय नैतिकता के अलावा इन साक्षात्कारों में वे अपने विदेश प्रवास, वहाँ के निर्णायक अनुभवों, साहित्य, कला, विचारधारा और अन्य अनेक ऐसे मुद्दों पर अपनी बात कहते हैं जो आज भी प्रासंगिक और विचारोत्तेजक हैं। इस जिल्द में उनके 1998 से पहले दिए गए साक्षात्कारों को संकलित किया गया है। इसके बाद के साक्षात्कार ‘संसार में निर्मल वर्मा’ के ‘उत्तरार्द्ध’ खंड में संकलित हैं।
Sham' A Har Rang Mein
- Author Name:
Krishna Baldev Vaid
- Book Type:

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Description:
‘ख़्वाब है दीवाने का’ से आरम्भ हुई कृष्ण बलदेव वैद की डायरी-यात्रा ‘शम’अ हर रंग में’ तक पहुँचकर विराम लेती है। अर्थ स्पष्ट है कि ‘शम’अ हर रंग में’ एक लेखक की डायरी है। एक ऐसे शख़्स की दैनिक आपबीती जिसके लिए लेखक होना कोई बाहरी चुनाव नहीं, आन्तरिक मजबूरी है।
‘शम’अ हर रंग में’ एक ऐसी पुस्तक है जो रेखांकित करती है कि लेखक समाज से उतना नहीं लड़ता जितना कि अपने आपसे। उसका हर दिन, हर लम्हा कल की नोक पर अटका रहता है। उसकी उदासियाँ, ख़ुशियाँ, शक, यक़ीन, ज़िद्द—यानी अपने होने का हर रंग, उसके तख़लीक़ी इरादों और अन्देशों के इर्द-गिर्द बचा हुआ है। बारीक अहसासों से भाषा की हदों को पार कर जाता है और पाठकों का अन्तरंग हो जाता
है।
यह पुस्तक डायरी-लेखन की विशिष्टता की कसौटी बनकर उभरी है और मनुष्य के मानसिक जीवन के उतार-चढ़ावों का रूपायण करती है। बीती सदी के आधे समय और समाज की कुछ बारीक कतरनें और रंगतें भी इसमें मौजूद हैं। हिन्दी रचना-संसार की दुर्लभ झलकियाँ भी इस पुस्तक को महत्त्वपूर्ण बनाती हैं।
Paalatu Bohemian
- Author Name:
Prabhat Ranjan
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी में ऐसे लेखक अधिक नहीं हैं जिनकी रचनाएँ आम पाठकों और आलोचकों के बीच सामान रूप से लोकप्रिय हों। ऐसे लेखक और भी कम हैं जिनके पैर किसी विचारधारा की बेड़ी से जकड़े ना हों। मनोहर श्याम जोशी के लेखन, पत्रकारिता को अपने शोध-कार्य का विषय बनाने की ‘रिसर्च स्कॉलर्स’ में होड़ लगी थी। प्रभात रंजन ने न सिर्फ़ जोशी जी के लेखन पर अपना शोध-कार्य बख़ूबी किया, बल्कि उनके साथ बिताए गए समय को इस संस्मरण की शक्ल देकर एक बड़ी ज़िम्मेदारी पूरी की है।
“प्रभात ने आत्मीय वृत्तान्त लिखा है।”
—भगवती जोशी (मनोहर श्याम जोशी की सहधर्मिणी)
—हिन्दी फ़िल्मों और डेली सोप ओपेरा के लीजेंड्री राइटर मनोहर श्याम जोशी के जीवन से जुड़े अनेक वृत्तांत इस पुस्तक में हैं जो न सिर्फ़ दिलचस्प हैं, बल्कि प्रेरक और ज्ञानवर्द्धक भी हैं।
—हिन्दी कथा-साहित्य/पत्रकारिता/फ़िल्म/टेलीविज़न में रूचि रखनेवालों के लिए अनिवार्य पठनीय सामग्री।
—संस्मरण विधा में एक उपलब्धि जैसी किताब।
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