Meri Atmakatha
Author:
Charles ChaplinPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 479.2
₹
599
Available
इस नायाब और मुश्किल शख़्स के बारे में काफ़ी कुछ बताती है यह किताब...एक अनूठा जीवन्त चित्रण।</p>
<p>—द न्यूयॉर्क टाइम्स</p>
<p>अपने घर के सामने से गुज़रते हुए वाडेविल के सजे-धजे अभिनेता सितारों को देखकर चार्ली चैप्लिन चकित भी होते और प्रेरित भी। तब उनकी उम्र बहुत कम थी। लेकिन उस समय उनके दिल में अभिनेता बनने की जो चाह पैदा हुई, वह ताउम्र बनी रही।</p>
<p>यह उनकी आत्मकथा है।</p>
<p>दुनिया-भर में ‘लिटिल ट्रैम्प’ के रूप में विख्यात चार्ली चैप्लिन के जीवन के कई अन्य पहलू भी इसमें उजागर हुए हैं। दक्षिण लंदन की झुग्गियों में घोर ग़रीबी में बीता बचपन, माता-पिता के तनावपूर्ण सम्बन्ध, फिर संगीत हॉल के मंच पर अभिनय की शुरुआत, अमेरिका में मिला वह शानदार ब्रेक, अपने काम पर अपना नियंत्रण बनाए रखने का कलागत संघर्ष, एक के बाद एक असफल विवाहों का संताप, वामपंथी राजनीति और व्यक्तिगत आरोपों के चलते हॉलीवुड से निर्वासन...</p>
<p>यह पुस्तक उनके जीवन के हर पड़ाव के बारे में बताती है; वे कैसे सोचते थे, कैसे फ़ैसले लेते थे, यह भी। अपने समय की राजनीति, और उस समय के महान नेताओं के बारे में उनके क्या विचार थे, उनके समकालीन व्यक्तित्वों से उनकी मुलाक़ातें जिनमें बर्नार्ड शॉ, आइंस्टीन और गांधी जी भी शामिल हैं, यह सभी कुछ इसमें है।</p>
<p>बीसवीं सदी के सर्वाधिक उल्लेखनीय व्यक्तित्वों में से एक चार्ली चैप्लिन की अपनी कहानी, उनके अपने शब्दों में।
ISBN: 9789360863944
Pages: 528
Avg Reading Time: 18 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
प्रस्तुत पुस्तक मानवतावादी विचारक मानवेन्द्रनाथ राय की जीवनी है, जिसमें उनके व्यक्तित्व–कृतित्व पर प्रकाश डाला गया है।
भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के इतिहास में मानवेन्द्रनाथ राय के कार्य–कलाप वह मज़बूत कड़ी है, जिससे प्रथम महायुद्ध के पूर्व और उसके बाद के क्रान्तिकारी आन्दोलन का जुड़ाव रहा है। मानवेन्द्रनाथ राय का जीवन घटनापरक और विचारपरक—दोनों ही तरीक़े का रहा है। कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादी होने के बाद समाजवादी–मार्क्सवादी विचार–जगत में अपने विवेक और बुद्धि से विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया था और अन्त में उन्होंने ‘नव–मानववाद’ सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, जिसमें मार्क्सवाद–समाजवाद की वर्ग–सीमाओं को तोड़ करके सम्पूर्ण मानव–जाति के विकास के लिए सहज मानवीय समाज के द्रष्टा बन गए।
मानवेन्द्रनाथ राय ने साम्यवाद की परिधि के आगे जाने पर ज़ोर देते हुए कहा कि पूँजीवाद तथा शोषण आधारित सामाजिक व्यवस्था को समाप्त करना पूरी मानव जाति–समाज के हित में है, अत: केवल वर्ग संघर्ष और वर्ग चेतना के आधार पर यदि सत्ता ग्रहण की गई तो सर्वहारा वर्ग की तानाशाही तो स्थापित हो सकती है, लेकिन शोषण मुक्त समाज स्थापित नहीं किया जा सकता। व्यक्ति और मानव मात्र की स्वतंत्रता चाहे वह राजनीतिक स्वतंत्रता हो अथवा आर्थिक या सामाजिक, उस सबके लिए यह आवश्यक है कि उसके अवसरों को बढ़ाया जाए। शोषणहीन समाज व्यवस्था में पूँजीवादी व्यवस्था की तुलना में व्यक्ति को पहले से अधिक विकास के अवसर मिलने चाहिए। आर्थिक समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्वपूर्ण समाज व्यवस्था में सभी क्षेत्रों में व्यक्तिगत उन्नति का सभी को पूरा–पूरा अवसर मिलना चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अधिक ज़ोर दिया।
Yug-Pravartak Dularelal Bhargava
- Author Name:
Dr. Pushpa Dwivedi
- Book Type:

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ब्रिटिश काल में जब उर्दू बाहुल्य वातावरण था ऐसे में युगान्तकारी हिन्दी प्रकाशक के रूप में दुलारेलाल जी उभरकर सामने आये। उनका संपूर्ण जीवन हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धि करने में व्यतीत हुआ। तत्कालीन हिन्दी की लब्धप्रतिष्ठ पत्रिकाएँ 'सुधा', 'माधुरी' आदि का सम्पादन इनके द्वारा किया गया। सम्पादन क्यों हो? किसका हो? इन सभी प्रश्नों के उत्तर उनकी पत्रिकाएँ स्वतः दे देती है। साहित्यिक गतिविधियों के अतिरिक्त सामाजिक, राजनैतिक संचेतना, आर्थिक स्थिति तथा मनोविज्ञान तक की सीमाओं को उन्होंने अपनी पत्रिकाओं द्वारा संस्पर्श किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि भार्गव जी केवल साहित्यकार नहीं थे, न उनके प्रोत्साहक, वे बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। जीवन के हर कोने में उन्होंने झाँककर उसकी मर्म छवियाँ अपनी पत्रिकाओं में चित्रित कीं। चित्र से लेकर विचित्र तथ्यों की खोज और प्रकाशन उनके सम्पादन का लक्ष्य था।
पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी ने स्पष्ट लिखा है कि श्री दुलारेलाल भार्गव जी ने हिन्दी की जो सेवा की है, उसका मूल्य निर्धारित करना मेरी शक्ति से बिलकुल बाहर है। "सुधा" और "माधुरी" में बराबर आप नवीन लेखकों को प्रोत्साहित करते रहे हैं, कितनी ही महिला- लेखिकाएँ तैयार कीं। यह क्रम हिन्दी की किसी भी पत्रिका में नहीं रहा। इस प्रोत्साहन-कार्य में भार्गव जी का स्थान सबसे पहले है।
Zindagi Ka Kya Kiya
- Author Name:
Dhirendra Asthana
- Book Type:

- Description: ''मुम्बई की हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, दो ख़ास अध्यायों के बिना वह पूर्ण नहीं हो सकेगा। पहला धर्मवीर भारती का 'धर्मयुग' अध्याय, और दूसरा धीरेन्द्र अस्थाना का 'सबरंग' अध्याय। मैं अगर कहूँ कि 'सबरंग' ने सप्ताह में महज़ एक ही दिन का अपना साथ देकर दैनिक 'जनसत्ता' को मुम्बई में जमाया, तो ग़लत नहीं होगा...मुम्बई है ही ऐसी जगह जो किसी भी संवेदनशील रचनात्मक कलाकार मन पर अपना गहरा प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती। परिणाम देखा जा सकता है कि उर्दू के मंटो, बेदी, इस्मत, कृश्न चन्दर और हिन्दी के शैलेश मटियानी, राजेन्द्र अवस्थी, जगदंबाप्रसाद दीक्षित, गोविन्द मिश्र, सत्येन्द्र शरत और महावीर अधिकारी से लेकर धीरेन्द्र अस्थाना तक ने मुम्बई को केन्द्र में रखकर बेहतरीन साहित्य की रचना की। धीरेन्द्र ने मुम्बई की महानगरीय त्रासदियों, अजनबियतों, व्यावसायिक मानसिकताओं और व्यवहारकुशलताओं को अगर नहीं बख्शा तो यहाँ की उदारताओं, उन्मुक्तताओं, संघर्षों-स्वप्नों की सफलता की सम्भावनाओं, उपलब्धियों को भी नज़रअन्दाज़ नहीं किया। मुम्बई के असर में लिखी गई उनकी कुछ रचनाएँ हैं—'उस रात की गन्ध’, 'नींद के बाहर', 'मेरी फर्नांडिस, क्या तुम तक मेरी आवाज़ पहुँचती है', 'उस धूसर सन्नाटे में', 'पिता' और उपन्यास 'देशनिकाला'। आलोक भट्टाचार्य 'धीरेन्द्र अपने घर से बहुत शिद्दत से जुड़ा हुआ है। वह टूटे हुए घर से निकलकर आया था, अब टूटे हुए घर के बारे में सोचना भी नहीं चाहता। धीरेन्द्र बहुत संवेदनशील है और उसे ख़ुश करना और साथ ही नाराज़ करना बहुत आसान है। वह बच्चों की तरह बहलाया जा सकता है और वह बच्चों की तरह रूठ भी सकता है। धीरेन्द्र किसी की भी बात पर विश्वास कर लेता है और बाद में इसका नुक़सान भी उठाता है।'
Manikarnika
- Author Name:
Tulsi ram
- Book Type:

- Description: ‘मणिकर्णिका’ डॉ. तुलसी राम की आत्मकथा का दूसरा खंड है। पहला खंड ‘मुर्दहिया’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि ‘मुर्दहिया’ को हिन्दी जगत की महत्तपूर्ण घटना के रूप में स्वीकार किया गया। साहित्य और समाज विज्ञान से जुड़े पाठकों, आलोचकों व शोधकर्ताओं ने इस रचना के विभिन्न पक्षों को रेखांकित किया। शीर्षस्थ आलोचक डॉ. नामवर सिंह के अनुसार ग्रामीण जीवन का जो जीवन्त वर्णन ‘मुर्दहिया’ में है, वैसा प्रेमचन्द की रचनाओ में भी नहीं मिलता। ‘मणिकर्णिका’ में ‘मुर्दहिया’ के आगे का जीवन है। आज़मगढ़ से निकलकर लेखक ने क़रीब 10 साल बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में बिताए। बनारस में आने पर जीवन के अन्त की प्रतीक ‘मणिकर्णिका’ से ही लेखक का जैसे नया जीवन शुरू हुआ। लेखक के शब्दों में ‘गंगा के घाटों तथा बनारस के मन्दिरों से जो यात्रा शुरू हुई थी, अन्ततोगत्वा वह कम्युनिस्ट पार्टी के दफ़्तर में समाप्त हो गई। मार्क्सवाद ने मुझे विश्व-दृष्टि प्रदान की, जिसके चलते मेरा व्यक्तिगत दुःख दुनिया के दुःख में मिलकर अपना अस्तित्व खो बैठा। मुर्दहिया में जो विचार सुप्त अवस्था में थे, वे ‘मणिकर्णिका’ में विकसित हुए।’ लेखक ने अपने जीवनानुभवों का वर्णन करते हुए उस ख़ास समय को भी विश्लेषित किया है जिसके भीतर प्रवृत्तियों का सघन संघर्ष चल रहा था। बनारस जैसे इस कृति के पृष्ठों पर जीवन्त हो उठा है। इस स्मृति-आख्यान में कलकत्ता भी है, अनेक वैचारिक सन्दर्भों के साथ। ‘मणिकर्णिका; डॉ. तुलसी राम के जीवन-संघर्ष की ऐसी महागाथा है जिसमें भारतीय समाज की अनेक संरचनाएँ स्वतः उद्घाटित होती जाती हैं।
Rajkapoor : Srijan Prakriya
- Author Name:
Jayprakash Chowksey
- Book Type:

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भारतीय आम आदमी का व्यक्तिगत गीत है भारतीय सिनेमा और राजकपूर इसके श्रेष्ठतम गायकों में से एक हैं। आज़ादी के चालीस वर्षों में आम आदमी के दिल पर जो कुछ बीता, वह राजकपूर ने अपने सिनेमा में प्रस्तुत किया। भविष्य में जब इन चालीस वर्षों का इतिहास लिखा जाएगा तब राजकपूर का सिनेमा अपने वक़्त का बड़ा प्रामाणिक दस्तावेज़ होगा और इतिहासकार उसे नकार नहीं पाएगा।
राजकपूर, नेहरू युग के प्रतिनिधि फ़िल्मकार माने जाते हैं, जैसे कि शास्त्री-युग के मनोज कुमार। इन्दिरा गांधी के युग के मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा।
आज़ाद भारत के साथ ही राजकपूर की सृजन-यात्रा भी शुरू होती है। उन्होंने 6 जुलाई, 1947 को ‘आग’ का मुहूर्त किया था और 6 जुलाई, 1948 को ‘आग’ प्रदर्शित हुई थी। भारत की आज़ादी जब उफक पर खड़ी थी और सहर होने को थी, तब राजकपूर ने अपनी पहली फ़िल्म बनाई थी। ‘आग’ आज़ादी की अलसभोर की फ़िल्म थी, जब ग़ुलामी का अँधेरा हटने को था और आज़ादी की पहली किरण आने को थी। ‘आग’ में भारत की व्याकुलता है, जो सदियों की ग़ुलामी तोड़कर अपने सपनों को साकार करना चाहता है। राजकपूर की आख़िर फ़िल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ 15 अगस्त, 1985 को प्रदर्शित हुई। इस फ़िल्म में राजकपूर ने उस कुचक्र को उजागर किया है, जो कहता है कि पैसे से सत्ता मिलती है और सत्ता से पैसा पैदा होता है। इस तरह राजकपूर ने अपनी पहली फ़िल्म ‘आग’ से लेकर अन्तिम फ़िल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ तक भारत के जनमानस के प्रतिनिधि फ़िल्मकार की भूमिका निभाई है।
यह राजकपूर जैसे जागरूक फ़िल्मकार का ही काम था कि सन् 1954 और 56 में उसने भारतीय समाज का पूर्वानुमान लगा लिया था और भ्रष्टाचार के नंगे नाच के लिए लोगों को तैयार कर दिया था। ‘जागते रहो’ के समय उनके साथियों ने इस शुष्क विषय से बचने की सलाह दी थी और स्वयं राजकपूर भी परिणाम के प्रति शंकित थे। परन्तु सिनेमा के इस प्रेमी का दिल उस गम्भीर विषय पर आ गया था। जो लोग राजकपूर को काइयाँ व्यापारी मात्र मानते रहे हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि बिना नायिका और रोमांटिक एंगल की फ़िल्म ‘जागते रहो’ राजकपूर ने क्यों बनाई?
राजकपूर और आम आदमी का रिश्ता सभी परिभाषाओं से परे एक प्रेमकथा है, जिसमें आज़ाद भारत की दास्तान है। राजकपूर की साढ़े अठारह फ़िल्में आम आदमी के नाम लिखे प्रेम-पत्र हैं। सारा जीवन राजकपूर ने प्रेम के ‘ढाई आखर’ को समझने और समझाने की कोशिश की। राजकपूर भारतीय सिनेमा के कबीर हैं।
राजकपूर का पहला प्यार औरत से था या सिनेमा से—यह प्रश्न उतना ही उलझा हुआ है, जितना कि पहले मुर्ग़ी हुई या अंडा।
उनके लिए प्रेम करना कविता लिखने की तरह था। प्रेम, औरत और प्रकृति के प्रति राजकपूर का दृष्टिकोण छायावादी कवियों की तरह था। औरत के जिस्म के रहस्य से ज़्यादा रुचि राजकपूर को उसके मन की थी। वह यह भी जानते थे कि कन्दराओं की तरह गहन औरत के मन की थाह पाना मुश्किल है, परन्तु प्रयत्न परिणाम से ज़्यादा आनन्ददायी था।
प्रेम और प्रेम में हँसना-रोना, राजकपूर की प्रथम प्रेरणा थी, तो सृजन-शक्ति का दूसरा स्रोत उनकी अदम्य महत्त्वाकांक्षा थी। ‘आग’ के नायक की तरह राजकपूर जीवन में कुछ असाधारण कर गुज़रना चाहते थे। जलती हुई-सी महत्त्वाकांक्षा उनका ईंधन बनी।
पृथ्वीराज उनकी प्रेरणा के तीसरे स्रोत रहे हैं। उन्हें अपने पिता के प्रति असीम श्रद्धा थी और वे हमेशा ऐसे कार्य करना चाहते थे, जिनसे उनके पिता की गरिमा बढ़े।
ऐसे थे राजकपूर और यह है उनकी प्रामाणिक और सम्पूर्ण जीवनगाथा।
Leela Purshottam Bhagwan Srikrishna : Vyaktitva Aur Darshan
- Author Name:
Jairam Mishra
- Book Type:

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भगवान श्रीकृष्ण सनातन, अविनाशी, सर्वलोक स्वरूप, नित्य शासक, रणधीर एवं अविचल हैं। भीष्म पितामह की इस मान्यता के बाद द्रौपदी का यह कथन, ‘हे सच्चिदानन्द-स्वरूप श्रीकृष्ण महायोगिन विश्वात्मन्, गोविन्द, कौरवों के बीच कष्ट पाती हुई मुझ शरणागत अबला की रक्षा कीजिए।’ श्रीकृष्ण के सर्वमान्य एवं सर्वव्यापी चरित्र की एक झलक मात्र प्रस्तुत करता है। सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय में ऐसा बहुआयामी तथा लोकरंजक दूसरा चरित्र नहीं है।
प्रस्तुत पुस्तक में भगवान कृष्ण के लीलाधाम स्वरूप का विस्तृत विवेचन इस तरह प्रस्तुत किया गया है जिससे पाठक उनके लौकिक तथा दार्शनिक पक्षों को सहज ही हृदयंगम कर सकेंगे। लीलाधर भगवान् श्रीकृष्ण के क्रिया-कलापों के संक्षिप्त विवरण उनके पूरे जीवन-विस्तार से इस तरह चुने गए हैं कि उनका एक मनोहारी सर्वव्यापी और सम्पूर्ण चरित्र लोगों के सामने समुपस्थित हो सके। श्रीकृष्ण सम्बन्धी अनन्त एवं अपार कथा-सागर से कोई भी लेखक कुछ बूँदें ही चुन सकता है। शर्त व्यक्ति अथवा लेखक की अपनी धारणा का है। विश्वरूप श्रीकृष्ण में वह सब है जो समस्त प्रकृति अथवा मनुष्य के प्रज्ञान में संचित है। ज्ञेय अथवा अज्ञेय स्वरूप के सम्पूर्ण व्याख्यान की क्षमता बेचारे मनुष्य में कहाँ है। वह अपनी जिज्ञासा के अनुसार उस विश्वव्यापी चरित्र का एक नन्हा आयाम ही देख पाया है।
पं. जयराम मिश्र ने एक विनम्र जिज्ञासु की तरह कृष्ण के सच्चिदानन्द, विश्वात्मन् स्वरूप को इस पुस्तक में प्रस्तुत कर हिन्दी पाठकों की महती सेवा की है तथा भारतीय संस्कृति और संज्ञान को सर्व सुलभ बनाया है।
Anasakt Aastik : Jainendra Kumar Ki Jeewani
- Author Name:
Jyotish Joshi
- Book Type:

- Description: जैनेन्द्र कुमार हिन्दी के केवल मूर्धन्य कथाकार ही नहीं है अपितु प्रखर राष्ट्रवादी चिन्तक-विचारक भी है। वे हिन्दी भाषा में सोचने-विचारने वाले अन्यतम व्यावहारिक भारतीय दार्शनिक भी हैं तो भारत सहित वैश्विक राजनीति पर गहरी दृष्टि रखनेवाले प्रबुद्ध राजनैतिक विशेषज्ञ भी। वे स्वाधीनता आन्दोलन के तपोनिष्ठ सत्याग्रही भी रहे जिन्होंने स्वाधीनता मिलने के बाद भी अपने समग्र जीवन और लेखन क्रो सत्याग्रह बनाया। उन्होंने जो लिखा और जिया वह हमेशा एक नई राह की खोज का करण बना। कहानी और उपन्यास को नई भाषा, शिल्प तथा अधुनातन प्रविधियों में ढालकर जैनेन्द्र ने उन विषयों को प्रमुखता दी, जिन पर विचार करने का साहस पहले न किया जा सका। इसमें प्रमुखता से वह स्त्री उभरी, जिसे सदियों से उत्पीड़ित किया जाता रहा है। अपने दर्शन में आत्म को प्रतिष्ठित करनेवाले, विचारों में भारतीय-राष्ट्र-राज्य को अधिकाधिक सर्वोदय में देखनेवाले तथा जीवन में एक गृहस्थ संन्यासी का आदर्श प्रस्तुत करनेवाले जैनेन्द्र कुमार का महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, विनोबा भावे, राधाकृष्णन, जयप्रकाश नारायण, इन्दिरा गाँधी आदि राष्ट्रीय नेताओं से सीधा संवाद था। पर यह संवाद राष्ट्रीय हितों के लिए था, निजी स्वार्थों के लिए नहीं। ऐसे जैनेन्द्र कुमार के विराट व्यक्तित्व को उनकी जीवनी ‘अनासक्त आस्तिक' में देखने और उनके क्रमिक विकास को परखने का एक बड़ा प्रयत्न है, जो निश्चय ही उन्हें नए सिरे से समझने में सहायक होगा। कहना न होगा कि जैनेन्द्र साहित्य के मर्मज्ञ आलोचक ज्योतिष जोशी द्वारा मनोयोग से लिखी गई यह जीवनी पठनीय तो है ही, संग्रहणीय भी है।
Ranger Kavi Asit Kumar Haldar
- Author Name:
Gautam Haldar
- Book Type:

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गौतम हालदार महाशय ने इसे असितकुमार हालदार का जीवनालेख्य कहा है। पर यह सिर्फ़ असितकुमार के जीवन प्रसंगों को ही हमारे सामने नहीं लाती है। इसमें अवनीन्द्रनाथ द्वारा प्रवर्तित बंगाल के नवजागरण से उद्भूत कला आन्दोलन के विभिन्न पर्व, अजन्ता और बाघगुहा से चित्रों की प्रतिकृतियों के अभियान में नन्दलाल और असितकुमार का योगदान, अजन्ता की प्रतिकृतियाँ बनायी जायें इसके पीछे भगिनी निवेदिता की प्रेरणा, चित्रशिल्पी रोथेंस्टाइन, हेवेल और रूसी चित्रकार रोरिक की भारतीय कला के प्रति रुचि, रवीन्द्रनाथ, गगनेन्द्रनाथ, द्विजेन्द्रनाथ और कलागुरु अवनीन्द्रनाथ की कला, असितकुमार द्वारा लखनऊ राजकीय कला महाविद्यालय के द्वारा शिल्प और हस्तशिल्प में किया गया योगदान, कला के प्रति उनके विचार-बिन्दु, बचपन से ही चित्रकला के प्रति उनकी रुचि, जयपुर महाराजा कला और हस्तशिल्प विद्यालय की प्रगति में उनका योगदान इस 'रंगेर कवि असितकुमार हालदार' जैसी जीवनी में एक कलारसिक पाठक को सब कुछ मिलेगा। कुछ व्यक्ति केवल चित्रकार होते हैं, शिल्पी अथवा मूर्तिकार या स्थपति, असितकुमार एक संगीतकार, नाटककार, अभिनेता, मूर्तिकार, हस्तशिल्पी, गायक, गीत रचयिताऔर साहित्यकार सभी कुछ थे।
इसमें कोई सन्देह नहीं इस ग्रन्थ के लेखक गौतम हालदार ने काफ़ी परिश्रम के साथ इस ग्रन्थ की रचना की है। चित्रकला और एक व्यक्ति की जीवनी लिखने में उन्होंने पूरे ऐतिहासिक परिवेश का चित्रण कर इसे कला-इतिहास का एक ग्रन्थ भी बना दिया है।
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