(5)
Author:
Shantanu GuptaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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यह जीवनी आपको अपने चार खंडों में योगी आदित्यनाथ के जीवन के चार पहलुओं से होकर ले जाती है। पुस्तक का आरंभ योगी के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के वर्तमान रूप, 2017 की उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति, यू.पी. का सी.एम. चुने जाने के तथ्यों और पंचम तल (यू.पी. के सीएम का दफ्तर) से होता है। दूसरा खंड आपको योगी आदित्यनाथ के पाँच बार के सांसद के रूप में लंबे कार्यकाल, चुनावी जीत, संसद् में उनकी कुशल भागीदारी, उनके तथाकथित विवादित भाषणों की सच्चाई, लव-जिहाद की उनकी सोच के पीछे का तर्क, घर वापसी, हिंदू युवा वाहिनी और भाजपा के साथ उनके संबंध से परिचित कराता है। तीसरे खंड में लेखक अपने पाठकों को गोरखनाथ मठ के महंत अवेद्यनाथ, योगी आदित्यनाथ, उनकी कठोर यौगिक दिनचर्या, नाथ पंथ के गुरुओं और कई दशकों से मठ की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता से होकर ले जाते हैं। आखिरी खंड में लेखक अपने पाठकों को उत्तराखंड के इलाके में पले अजय सिंह बिष्ट के बचपन से जुड़ी कुछ बेहद दिलचस्प और उनके अपनों के मुँह से कही बातों के साथ छोड़ देते हैं, जो गायों, खेतों, पहाड़ों, नदियों के बीच पला-बढ़ा और आगे चलकर एक सांसद और मुख्यमंत्री बना।
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यह जीवनी आपको अपने चार खंडों में योगी आदित्यनाथ के जीवन के चार पहलुओं से होकर ले जाती है। पुस्तक का आरंभ योगी के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के वर्तमान रूप, 2017 की उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति, यू.पी. का सी.एम. चुने जाने के तथ्यों और पंचम तल (यू.पी. के सीएम का दफ्तर) से होता है। दूसरा खंड आपको योगी आदित्यनाथ के पाँच बार के सांसद के रूप में लंबे कार्यकाल, चुनावी जीत, संसद् में उनकी कुशल भागीदारी, उनके तथाकथित विवादित भाषणों की सच्चाई, लव-जिहाद की उनकी सोच के पीछे का तर्क, घर वापसी, हिंदू युवा वाहिनी और भाजपा के साथ उनके संबंध से परिचित कराता है। तीसरे खंड में लेखक अपने पाठकों को गोरखनाथ मठ के महंत अवेद्यनाथ, योगी आदित्यनाथ, उनकी कठोर यौगिक दिनचर्या, नाथ पंथ के गुरुओं और कई दशकों से मठ की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता से होकर ले जाते हैं। आखिरी खंड में लेखक अपने पाठकों को उत्तराखंड के इलाके में पले अजय सिंह बिष्ट के बचपन से जुड़ी कुछ बेहद दिलचस्प और उनके अपनों के मुँह से कही बातों के साथ छोड़ देते हैं, जो गायों, खेतों, पहाड़ों, नदियों के बीच पला-बढ़ा और आगे चलकर एक सांसद और मुख्यमंत्री बना।
Book Details
-
ISBN9789352669929
-
Pages168
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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जननायक कर्पूरी ठाकुर की ख्याति मुख्यमंत्री के रूप में कम और 'विपक्ष के प्राण' के रूप में ज्यादा थी। समाजवादी धारा के अग्रणी नेता के रूप में कर्पूरीजी भारतीय राजनीति में प्रतिष्ठित रहे हैं। संसदीय मर्यादा और विधाओं के भरपूर पालन तथा संसदीय व्यवस्था में कर्पूरीजी की अटूट आस्था थी। बिहार विधानसभा तथा लोकसभा में उनकी भागीदारी अत्यन्त उच्चकोटि की रही है। इस पुस्तक में विभिन्न संसदीय विधाओं, राज्यपाल के अभिभाषण, प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, बजट, वाद-विवाद, लोक महत्त्व के विषयों, प्रस्तावों तथा अविश्वास प्रस्ताव आदि में नेता विपक्षी दल के रूप में कर्पूरीजी की भागीदारी का निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त विभिन्न संसदीय विधाओं के सैद्धान्तिक पक्ष का अनुशीलन करते हुए उन सिद्धान्तों की कसौटी पर कर्पूरीजी की भूमिका का परीक्षण किया गया है। कर्पूरीजी की सदन के अन्दर नेता विपक्षी दल के रूप में निभाई गई भूमिका का विस्तृत विवरण देनेवाली यह पुस्तक भारतीय राजनीति के कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं की सूचना भी देती है।
Yaadgar e Ghalib
- Author Name:
Altaf Hussain Hali
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'यादगार-ए-ग़ालिब' मिर्ज़ा ग़ालिब की पहली सवानिह-ए-हयात है। मौलाना हाली खुद मिर्ज़ा ग़ालिब को ज़ाती तौर पर जानते थे, इसलिए उनकी ज़िंदगी के बारे में जो भी शुरूआती और सही जानकारियां मिलती हैं, उन सबका ज़िक्र हाली ने इस किताब में किया है। ग़ालिब की शायरी, उनकी ज़बान, उनकी ज़िंदगी, उनके किरदार वग़ैरा के बारे में लिखने में मौलाना हाली ने कहीं भी कोई बात बढ़ा-चढ़ा कर नहीं लिखी है।
Yatrik
- Author Name:
Shivani
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कथाकार और उपन्यासकार के रूप में शिवानी की लेखनी ने स्तरीयता और लोकप्रियता की खाई को पाटते हुए एक नई ज़मीं बनाई थी, जहाँ हर वर्ग और हर रुचि के पाठक सहज भाव से विचरण कर सकते थे। उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और सम्बन्धगत भावनाओं की इतने बारीक और महीन ढंग से पुनर्रचना की कि वे अपने समय में सबसे ज़्यादा पढ़े जानेवाले लेखकों में एक होकर रहीं। कहानी, उपन्यास के अलावा शिवानी ने संस्मरण और रेखाचित्र आदि विधाओं में भी बराबर लेखन किया। अपने सम्पर्क में आए व्यक्तियों को उन्होंने क़रीब से देखा, कभी लेखक की निगाह से तो कभी मनुष्य की निगाह से, और इस तरह उनके भरे-पूरे चित्रों को शब्दों में उकेरा और कलाकृति बना दिया। इस पुस्तक में ‘चरैवेति’ और ‘यात्रिक’ शीर्षक रचनाएँ सम्मिलित हैं। आशा है, शिवानी के कथा-साहित्य के पाठकों को उनकी ये रचनाएँ भी पसन्द आएँगी।
Mahatma Gandhi : Jeewan Aur Darshan
- Author Name:
Romain Rolland
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‘सत्याग्रह’ शब्द का आविष्कार गांधी जी ने तब किया था, जब वे अफ़्रीका में थे—उद्देश्य था अपनी कर्म-साधना के साथ निष्क्रिय-प्रतिरोध का भेद स्पष्ट करना। यूरोपवाले गांधी के आन्दोलन को ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ (अथवा अप्रतिरोध) के रूप में समझना चाहते हैं, जबकि इससे बड़ी ग़लती दूसरी नहीं हो सकती। निष्क्रियता के लिए इस अदम्य योद्धा के मन में जितनी घृणा है, उतनी संसार के किसी दूसरे व्यक्ति में नहीं होगी—ऐसे वीर ‘अप्रतिरोधी का दृष्टान्त संसार में सचमुच विरल है। उनके दोलन का सारतत्त्व है—‘सक्रिय प्रतिरोध’, जिसने अपने प्रेम, विश्वास और आत्मत्याग की तीन सम्मिलित शक्तियों के साथ ‘सत्याग्रह’ की संज्ञा धारण की है। कायर मानो उनकी छाया भी नहीं छूना चाहता, उसे वे देश से बाहर निकालकर रहेंगे। आलसी और अकर्मण्य की अपेक्षा वह अच्छा है, जो हिंसा से प्रेरित है। गांधी जी कहते हैं—“यदि कायरता और हिंसा में से किसी एक को चुनना हो तो मैं हिंसा को ही पसन्द करूँगा। दूसरे को न मारकर स्वयं ही मरने का जो धीरतापूर्ण साहस है, मैं उसी की साधना करता हूँ। लेकिन जिसमें ऐसा साहस नहीं है, वह भी भागते हुए लज्जाजनक मृत्यु का वरण न करे—मैं तो कहूँगा, बल्कि वह मरने के साथ मारने की भी कोशिश करे; क्योंकि जो इस तरह भागता है, वह अपने मन पर अन्याय करता है। वह इसलिए भागता है कि मारते-मारते मरने का साहस उसमें नहीं है। एक समूची जाति के निस्तेज होने की अपेक्षा मैं हिंसा को हज़ार बार अच्छा समझूँगा। भारत स्वयं ही अपने अपमान का पंगु साक्षी बनकर बैठा रहे, इसके बदले अगर हाथों में हथियार उठा लेने को तैयार हो तो इसे मैं बहुत अधिक पसन्द करूँगा।” बाद में गांधी जी ने इतना और जोड़ दिया— “मैं जानता हूँ कि हिंसा की अपेक्षा अहिंसा कई गुनी अच्छी है। यह भी जानता हूँ कि दंड की अपेक्षा क्षमा अधिक शक्तिशाली है। क्षमा सैनिक की शोभा है लेकिन क्षमा तभी सार्थक है, जब शक्ति होते हुए भी दंड नहीं दिया जाता। जो कमज़ोर है, उसकी क्षमा बेमानी है। मैं भारत को कमज़ोर नहीं मानता। तीस करोड़ भारतीय एक लाख अंग्रेज़ों के डर से हिम्मत न हारेंगे। इसके अलावा वास्तविक शक्ति शरीर-बल में नहीं होती, होती है अदम्य मन में। अन्याय के प्रति ‘भले आदमी’ की तरह आत्मसमर्पण का नाम अहिंसा नहीं है—अत्याचारी की प्रबल इच्छा के विरुद्ध अहिंसा केवल आत्मिक शक्ति से टिकती है। इसी तरह केवल एक मनुष्य के लिए भी समूचे साम्राज्य का विरोध करना और उसको गिराना सम्भव हो सकता है।”
Meri Jindagi Mein Chekhov
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Lydia Evilov +3
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लीडिया एविलोव चेख़व से चार वर्ष छोटी थीं। उनका जन्म 1864 में मॉस्को में हुआ और पहली बार जब वे चेख़व से मिलीं तो केवल पच्चीस की थीं। चेख़व के साथ अपने सम्बन्ध के ब्यौरे में—जो 1942 में, 78 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु के कई वर्ष बाद ‘चेख़व इन माई लाइफ़’ शीर्षक से छपा—उन्होंने 1889 और 1899 के बीच चेख़व के साथ अपनी केवल आठ मुलाक़ातों का वर्णन किया है, मगर साफ़ मालूम होता है कि वे अक्सर ही मिलते रहे होंगे। संस्मरण में काफ़ी कुछ दिलचस्प सामग्री है मगर उसमें भी ख़ास महत्त्व चेख़व के जीवन की उन घटनाओं का है जो उनके सबसे कल्पना-प्रणव नाटक ‘द सी गल’ की पृष्ठभूमि में थीं। इस नाटक ने उनके कई आलोचकों की बुद्धि की आज़माइश की और नाटक के कई पात्रों के विषय में उनके अनुमान अब सर्वथा निराधार मालूम देते हैं। इस पुस्तक में लीडिया ने अपने और चेख़व के, दस वर्ष तक चले दुखद प्रेम-प्रसंग का वर्णन किया है। यही समय चेख़व के लेखकीय जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण समय भी था। चेख़व के जीवन के अब तक अनजाने इस अध्याय से उनकी कहानियों और नाटकों में उपस्थित उस वेदना और विषाद को समझने में अन्य किसी भी बात से ज़्यादा मदद मिलती है जो ‘चेरी ऑर्चर्ड’ में वायलिन के तार टूटने की मातमी आवाज़ की तरह ही उनकी सृजन-प्रतिभा और लेखनी से निकली हर प्रेमकथा की विशेषता है।
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Book
Yogigatha structures Yogi Adityanath's life across four distinct phases, opening with his unexpected 2017 elevation to the Panchma Tal — the Uttar Pradesh Chief Minister's office — rather than his childhood. This reverse chronology immediately grounds the biography in the electoral arithmetic and internal party negotiations that brought a five-term MP from Gorakhpur to state leadership. The second section reconstructs his two-decade parliamentary career, examining speeches labeled controversial by the media but presented here with full context and the author's interpretation of the logic behind positions on love jihad and ghar wapsi. Rather than hagiography, the book positions itself as a defense brief, written for readers who encounter Yogi Adityanath primarily through headline fragments. The narrative traces how a temple mahant became a political operator skilled in both religious mobilization and the legislative process, arguing that his ideology is consistent rather than opportunistic.
यह जीवनी "Yogigatha" पढ़ने से मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?
यह जीवनी आपको राजनीतिक रणनीति और वैचारिक दृढ़ता के बीच संतुलन दिखाती है। पुस्तक उल्टे कालक्रम में चलती है — मुख्यमंत्री पद से शुरू होकर संसदीय कार्यकाल और फिर प्रारंभिक जीवन की ओर बढ़ती है। लेखन शैली तथ्यात्मक है, जो विवादित भाषणों को पूर्ण संदर्भ में रखकर पाठक को स्वयं निर्णय लेने की जगह देती है। यह एकपक्षीय नहीं है, लेकिन योगी आदित्यनाथ की छवि को मीडिया के शीर्षकों से परे समझाने का प्रयास करती है।
Yogigatha पुस्तक किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है, और इसे समझने के लिए क्या चाहिए?
- उत्तर प्रदेश की राजनीति और 2017 के चुनावी परिदृश्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए।
- जो योगी आदित्यनाथ के विचारों को मीडिया रिपोर्टिंग से परे समझना चाहते हैं।
- समकालीन हिंदू राजनीति और धार्मिक नेतृत्व की भूमिका का अध्ययन करने वाले पाठकों के लिए।
- राजनीतिक जीवनियों में रुचि रखने वालों के लिए जो तथ्य-आधारित वर्णन पसंद करते हैं।
भारतीय पाठकों के लिए आज Yogigatha पुस्तक की विषयवस्तु का सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व क्या है?
यह पुस्तक उस समय को दर्ज करती है जब धार्मिक पहचान और राजनीतिक शक्ति का संबंध भारतीय लोकतंत्र में नए रूप ले रहा था। योगी आदित्यनाथ का गोरखनाथ मंदिर से मुख्यमंत्री कार्यालय तक का सफर यह दिखाता है कि कैसे पारंपरिक धार्मिक संस्थान आधुनिक राजनीतिक संरचनाओं में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में इस बदलाव को समझना आज की भारतीय राजनीति को समझने के लिए आवश्यक है।
Yogigatha विषय पर लेखक का दृष्टिकोण विशिष्ट किस प्रकार बनाता है?
लेखक विपरीत कालक्रम अपनाता है — वर्तमान से अतीत की ओर — जो असामान्य है। पुस्तक विवादित भाषणों को काटे बिना पूर्ण संदर्भ में प्रस्तुत करती है, और लव-जिहाद तथा घर वापसी जैसे मुद्दों पर योगी के तर्क को विस्तार से समझाती है। यह प्रचार-पत्र नहीं बल्कि एक बचाव पक्ष की तरह लिखी गई है, जो मीडिया द्वारा छोड़े गए संदर्भ को भरने का प्रयास करती है।
Yogigatha पुस्तक पाठक को भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से क्या देती है जो समाप्ति के बाद भी बना रहता है?
पाठक समकालीन भारतीय राजनीति में धर्म की भूमिका के बारे में अधिक सूक्ष्म समझ के साथ निकलता है। पुस्तक यह प्रश्न छोड़ती है कि क्या राजनीतिक सफलता वैचारिक स्थिरता से आती है या लचीलेपन से। यह उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास और गोरखपुर की राजनीतिक संस्कृति का दस्तावेज़ भी है। पाठक योगी आदित्यनाथ को एक व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि एक राजनीतिक घटना के रूप में समझने लगता है।