Hanuman Prasad Poddar : An Exalted Divinity
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O.P. GuptaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
EnglishCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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You are holding in your hands the first book containing an authentic biography of two greatest divinities of this country about which people are not well acquainted. It contains a unique account not found elsewhere of the actual meetings of Bhaijee—Shri Hanuman Prasad Poddar — with Lord Vishnu in 1927, at Jasidih, in front of several gentlemen, and again in Gorakhpur. The second important event is the exclusive appearance of Saint Narad and the great sage Angira before Bhaijee in 1936. The conversation of Bhaijee with a Parsee ghost would certainly convince readers about the importance of Shraddh to be performed after one’s death. Bhaijee was not only a true saint and social reformer but also involved in India's independence movement. Founder-editor of the famous ‘Kalyan’, Bhaijee made Herculean efforts to translate rare and ancient scriptures like the Ramayana & Mahabharat from Sanskrit to Hindi and made them available to everyone at a very nominal price. Bhaijee presented evidence of the brightest identity of sweet love towards Radha-Krishna and explored the feasibility of achieving it with utmost simplicity through his discourses and texts. He did an extraordinary campaign for the divine name and religious devotion (Bhakti) among the general public. Inclusion of a short biography of another divinity—Sethji Shri Jaidayal Goyandka is another feature of this seminal book. The credit for the establishment of Gita Press in Gorakhpur, Govind Bhawan in Kolkata, Gita Bhawan of Swargashram at Rishikesh, and Rishikul Ashram in Churu, including a unique, authentic, and excellent commentary on the Gita, goes only to him.
Read moreAbout the Book
You are holding in your hands the first book containing an authentic biography of two greatest divinities of this country about which people are not well acquainted. It contains a unique account not found elsewhere of the actual meetings of Bhaijee—Shri Hanuman Prasad Poddar — with Lord Vishnu in 1927, at Jasidih, in front of several gentlemen, and again in Gorakhpur. The second important event is the exclusive appearance of Saint Narad and the great sage Angira before Bhaijee in 1936. The conversation of Bhaijee with a Parsee ghost would certainly convince readers about the importance of Shraddh to be performed after one’s death. Bhaijee was not only a true saint and social reformer but also involved in India's independence movement. Founder-editor of the famous ‘Kalyan’, Bhaijee made Herculean efforts to translate rare and ancient scriptures like the Ramayana & Mahabharat from Sanskrit to Hindi and made them available to everyone at a very nominal price. Bhaijee presented evidence of the brightest identity of sweet love towards Radha-Krishna and explored the feasibility of achieving it with utmost simplicity through his discourses and texts. He did an extraordinary campaign for the divine name and religious devotion (Bhakti) among the general public.
Inclusion of a short biography of another divinity—Sethji Shri Jaidayal Goyandka is another feature of this seminal book. The credit for the establishment of Gita Press in Gorakhpur, Govind Bhawan in Kolkata, Gita Bhawan of Swargashram at Rishikesh, and Rishikul Ashram in Churu, including a unique, authentic, and excellent commentary on the Gita, goes only to him.
Book Details
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ISBN9789352667772
-
Pages576
-
Avg Reading Time19 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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रेणु मानवीय भावनाओं के अप्रतिम चितेरे हैं, लेकिन उनका रचनाकार मन उन सामाजिक, राजनीतिक और प्राकृतिक त्रासदियों की अनदेखी नहीं करता, जो किसी भी भावना-लोक को प्रभावित करती हैं। एक योद्धा रचनाकार के नाते रेणु ने स्वयं ऐसी त्रासदियों का सामना किया था। यही कारण है कि उनके अनेक कथा-रिपोर्ताज़, जिन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को भी समृद्ध किया, विभिन्न त्रासद स्थितियों का अत्यन्त रचनात्मक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।
इतिहास पर अपने निशान छोड़ जानेवाली अनेक घटनाएँ, रचनाकार की विभिन्न भावस्थितियाँ, जीवन-स्थितियाँ और उसके लगाव-सरोकार इस विधा को निश्चय ही एक विशिष्ट ऊँचाई सौंपते हैं। ‘समय की शिला पर’ में रेणु के अब तक उपलब्ध सभी रिपोर्ताज़ संकलित हैं।
Subhedari
- Author Name:
Avinash Subhedar
- Book Type:

- Description: अविनाश सुभेदार यांचं ‘सुभेदारी' हे आत्मकथन म्हणजे लोकसेवेचं असिधारा व्रत स्वीकारून संपूर्ण सेवाकाल त्याच निष्ठेने व्यतीत करणाऱ्या एका ध्येयवेड्या ज्येष्ठ आयएएस अधिकाऱ्याचा, प्रसंगी अविश्वसनीय वाटू शकणारा जीवनप्रवास आहे. या मनमोकळ्या निवेदनाचा विशेष म्हणजे, त्याचा केंद्रबिंदू सर्वसामान्य माणूस हा आहे. साधारणपणे निवृत्त अधिकारी आपल्या आठवणी शब्दबद्ध करतात, तेव्हा प्रकाशझोत स्वत:वर ठेवतात. मात्र, सुभेदारांनी कटाक्षाने हा मोह टाळला आहे. ‘सुभेदारी'मधून लेखकाने लोकहितास केंद्रस्थानी ठेवल्याचे पानोपानी जाणवते. दुसरे वैशिष्ट्य म्हणजे, एखादा अपवाद सोडता कोठेही नकारात्मकता या लिखाणात जाणवत नाही. तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी यांचे खासगी सचिव म्हणून काम करताना या विलक्षण नेत्याचा सहवास त्यांना सलग चार वर्षांपेक्षा अधिक काळ लाभला. त्याबाबतच्या आठवणी अत्यंत वाचनीय आहेत. त्यात आजपर्यंत काळाच्या उदरात लपलेल्या अनेक प्रसंगांचा हृद्य परामर्श वाचकांच्या मनातील राजकारण्यांविषयीची प्रतिकूल प्रतिमा काही अंशी बदलू शकेल एवढा प्रभावी आहे. शासकीय सेवा पार पाडताना नोकरशाहीतील अनेक आव्हाने झेलावी लागतात, कौटुंबिक जीवनाचा प्राधान्यक्रमही कित्येक प्रसंगी दूर ठेवावा लागतो. ही बाजूही सुभेदार यांनी संयत शब्दांत मांडली आहे. व्यक्तिगत स्तरावर विविध मान्यवरांबरोबर सुभेदार यांचे अत्यंत जिव्हाळ्याचे ऋणानुबंध आहेत. तथापि, त्यांनी कधीही अशा नात्यागोत्याचा प्रभाव आपल्या कारकिर्दीवर पडू दिला नाही. ही उपलब्धी आजच्या काळात दुर्मिळ म्हणावी लागेल. ग्रामीण भागातून आलेला एक जिद्दी तरुण परिश्रम आणि सचोटी यांच्या जोरावर सार्वजनिक जीवनात उच्च पदावर कसा पोहोचू शकतो, समाजोपयोगी भरीव योगदान कसे देऊ शकतो, याचा वस्तुपाठ म्हणजे ‘सुभेदारी' हे प्रांजळ आत्मकथन म्हणता येईल. - दिलीप चावरे ‘टाइम्स ऑफ इंडिया'चे निवृत्त पत्रकार Subhedari | Avinash Subhedar सुभेदारी - अविनाश सुभेदार
Joothan-1
- Author Name:
Omprakash Valmiki
- Book Type:

- Description: आज़ादी के पाँच दशक पूरे होने और आधुनिकता के तमाम आयातित अथवा मौलिक रूपों को भीतर तक आत्मसात् कर चुकने के बावजूद आज भी हम कहीं-न-कहीं सवर्ण और अवर्ण के दायरों में बँटे हुए हैं। सिद्धान्तों और किताबी बहसों से बाहर, जीवन में हमें आज भी अनेक उदाहरण मिल जाएँगे, जिनमें हमारी जाति और वर्णगत असहिष्णुता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। ‘जूठन' ऐसे ही उदाहरणों की श्रृंखला है जिन्हें एक दलित व्यक्ति ने अपनी पूरी संवेदनशीलता के साथ ख़ुद भोगा है। इस आत्मकथा में लेखक ने स्वाभाविक ही अपने उस 'आत्म' की तलाश करने की कोशिश की है जिसे भारत का वर्ण-तंत्र सदियों से कुचलने का प्रयास करता रहा है, कभी परोक्ष रूप में, कभी प्रत्यक्षत:। इसलिए इस पुस्तक की पंक्तियों में पीड़ा भी है, असहायता भी है, आक्रोश और क्रोध भी और अपने आपको आदमी का दर्जा दिए जाने की सहज मानवीय इच्छा भी।
Kunnu Kayari Thirinju Nokumpol
- Author Name:
Sudhakaran Ramanthali +1
- Book Type:

- Description: കുന്നു കയറി തിരിഞ്ഞുനോക്കുമ്പോൾ: ആത്മകഥനങ്ങ ളും ഓർമ്മപ്പുസ്തകങ്ങളും സ്വയം മഹത്വവൽക്കരിക്കു വാനുള്ള ഉപാധികളായി മാറുന്ന ഒരു കാലഘട്ടത്തിൽ ത ന്റെ അനുഭവങ്ങൾക്കും ചെയ്തികൾക്കും നൈതികമായ സാധൂകരണം നൽകാൻ ഒട്ടും ശ്രമിക്കാതെ ഡോ. വിജയ ജീവിതം പറയുന്നു. ഈ കൃതി ഇതിൻ്റെ തുറന്ന പ്രകൃ തംകൊണ്ടുതന്നെ നാനാരീതിയിലുള്ള ചോദ്യങ്ങൾക്ക് പ്രചോദനമാവുന്നുണ്ട്. ചോദ്യങ്ങൾക്കൊന്നിനും ഉത്ത രം നൽകാൻ എഴുത്തുകാരി മുതിരുന്നില്ല എന്നതാണ് ഇ തിന്റെ വൈശിഷ്ട്യം.
Azim Premji Ki Biography
- Author Name:
A.K. Gandhi
- Book Type:

- Description: भारतीय व्यापार-जगत के एक चमकते सितारे अजीम प्रेमजी सफल व्यापारी, आई.टी. उद्योग के सिरमौर और निवेशक हैं, जिन्होंने अपने अद्भुत कर्तृत्व से सफलता का नया इतिहास लिखा है। भारत सरकार द्वारा ‘पद्म विभूषण’, ‘पदम भूषण’ तथा अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत अजीम प्रेमजी को ‘टाइम’ मैगजीन ने उन्हें दो बार 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया है। 1960 के दशक में जब विप्रो ने उपभोक्ता स्वास्थ्य उद्योग से हाई-टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नई पारी की शुरुआत की तो अजीम प्रेमजी ने उसे सफलता दिलाई। व्यापारिक सफलता पाकर उन्होंने भारत की सनातन परंपरा ‘लोकोपकार’ को पुष्ट किया। ‘गिविंग प्लेज’ पर साइन किया है। परोपकार के लिए जाना जाता है। प्रेमजी ने ‘अजीम प्रेमजी फाउंडेशन’ को 2.2 बिलियन अमरीकी डॉलर का दान दिया है। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अद्वितीय काम किए हैं और एक ‘साक्षर भारत’ बनने की यात्रा में अपना अपूर्व योगदान किया है। उद्यमशीलता, नेतृत्व, कौशल, प्रशासनिक दक्षता, सहृदयता और परोपकार के प्रतीक अजीम प्रेमजी ने अपार धन-समृद्धि अर्जित की, पर मुक्त हाथों से उसे समाज को लौटाया भी। एक यशस्वी, लोककल्याणकारी व्यक्तित्व की यह प्रेरक जीवनगाथा समाज को मानवीयता और देने का महत्त्व बताएगी।
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