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हमारे समय के प्रमुख कवि मंगलेश डबराल की यह यात्रा-पुस्तक केवल यात्रा-वृतान्त नहीं है; यह एक कैनवस की तरह है जिसमें हमें अमेरिका दीखता है, उस चीरफाड़ के साथ जिसे यात्रा करते हुए कवि ने अपने ढंग से, अंजाम दिया—शायद अमेरिका को कुछ ज़्यादा अच्छे ढंग से समझने के लिए ही। इसमें वह आतंक नहीं है जो वर्तमान अमेरिका जैसे लगभग मिथक बन चुके देश में भारत के एक संवेदी मन को हो सकता था, नएपन का अहसास जरूर है; जिस पर लेखक ने कई जगह ख़ास जोर भी दिया है। एक अच्छे गद्य के अलावा यह पुस्तक हमें अमेरिका के बारे में, उसके दैनिक जीवन, सांस्कृतिक और सामाजिक वातावरण के बारे में कुछ प्रामाणिक सूचनाएँ भी देती है।
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About the Book
हमारे समय के प्रमुख कवि मंगलेश डबराल की यह यात्रा-पुस्तक केवल यात्रा-वृतान्त नहीं है; यह एक कैनवस की तरह है जिसमें हमें अमेरिका दीखता है, उस चीरफाड़ के साथ जिसे यात्रा करते हुए कवि ने अपने ढंग से, अंजाम दिया—शायद अमेरिका को कुछ ज़्यादा अच्छे ढंग से समझने के लिए ही। इसमें वह आतंक नहीं है जो वर्तमान अमेरिका जैसे लगभग मिथक बन चुके देश में भारत के एक संवेदी मन को हो सकता था, नएपन का अहसास जरूर है; जिस पर लेखक ने कई जगह ख़ास जोर भी दिया है। एक अच्छे गद्य के अलावा यह पुस्तक हमें अमेरिका के बारे में, उसके दैनिक जीवन, सांस्कृतिक और सामाजिक वातावरण के बारे में कुछ प्रामाणिक सूचनाएँ भी देती है।
Book Details
-
ISBN9788171197057
-
Pages96
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘‘मंगलेश की कविताएँ जहाँ एक ओर समकालीन जीवन के अँधेरों में घूमती हुई अपने सघन और तीव्र संवेदन से जीवित कर्मरत मनुष्यों तथा दृश्य और ध्वनि बिम्बों की रचना करती हैं और हमारी सामूहिक स्मृति के दुखते हिस्सों को उजागर करती हैं, वहीं वे उस उजाले को भी आविष्कृत करती हैं जो अवसाद के समानान्तर विकसित हो रही जिजीविषा और संघर्षों से फूटता उजाला है।
‘‘अपने अनेक समकालीन जनवादी कवियों से मंगलेश कई अर्थों में भिन्न और विशिष्ट है। उसकी कविताओं में ऐतिहासिक समय में सुरक्षित गति और लय का एक निजी समय है जिसमें एक ख़ास क़िस्म के शान्त अन्तराल हैं। पर ये शान्त कविताएँ नहीं हैं। इन कविताओं की आत्मा में पहाड़ों से आए एक आदमी के सीने में जलती-धुकधुकाती लालटेन है जो मौजूदा अंधड़-भरे सामाजिक स्वभाव के बीच अपने उजाले के संसार में चीज़ों को बटोरना-बचाना चाह रही है और चीज़ों तथा स्थितियों को नए संयोजन में नई पहचान दे रही
है।‘‘कविता के समकालीन परिदृश्य में ‘पहाड़ पर लालटेन’ की कविताएँ हमें एक विरल और बहुत सच्चे अर्थों में मानवीय कवि-संसार में ले जाती हैं जिसमें बचपन है, छूटी जगहों की यादें हैं, अँधेरे-उजालों में खुलती खिड़कियाँ हैं, आसपास घिर आई रात है, नींद है, स्वप्न-दुस्वप्न हैं, ‘सम्राज्ञी’ का एक विरूप मायालोक है मगर यह सब ‘एक नए मनुष्य की गंध से’ भरा हुआ है और ‘सड़कें और टहनियाँ, पानी और फूल और रोशनी और संगीत तमाम चीज़ें हथियारों में बदल गई हैं।’
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वे कहते हैं—‘समय मेरी अदृश्य छाया है/उजाले में अदृश्य/नंगी आँखों से छिपी/सहज-बोध के लिए खुली।’ इस समय को पकड़ने और इन कविताओं के अन्तस तक पहुँचने के लिए हमें एक समतल अहसास के रास्ते पर चलना होता है। उनके कवि ने अपनी हर पद-चाप को ध्यान से सुना है, और बहुत करीने से कविता में निथारा है।
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प्रकृति के साथ मनुष्य के सम्बन्धों पर भी एक हिसाबी-किताबी दृष्टि का ही क़ब्ज़ा होता जा रहा है। मंगलेश की कविता पेड़ को ‘करोड़ों चिड़ियों की नींद’ से जोड़ती हुई जैसे इस तरह के क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ ही खड़ी है। महानगर में रहते हुए मंगलेश का ध्यान जूझती हुई गृहस्थिन की दिनचर्या, बेकार युवकों और चीज़ों के लिए तरसते बच्चों से लेकर दूर गाँव में इन्तज़ार करते पिता, नदी, खेतों और ‘बर्फ़ झाड़ते पेड़’ तक पर टिका है। उनकी नज़र उस अघाए हुए वर्ग के बीच जाकर बेचैन हो जाती है जो सब कुछ को बाज़ार-भाव के हवाले करने पर तुला है।
मंगलेश की कविता के शब्द करुण संगीत से भरे हुए हैं। इनमें एक पारदर्शी ईमानदारी और आत्मिक चमक है। लेकिन उनकी कविता अगर हमारे समय का एक शोकगीत है तो आदमी की जिजीविषा की टंकार भी हम उसमें सुनते हैं और उसमें स्वयं अपनी निजी स्थिति का एक साक्षात्कार भी है। बहुत सामान्य-सी लगनेवाली चीज़ों का मर्म भी मंगलेश की कविता इस तरह खोलती है कि उसमें से एक पूरी दुनिया झाँकने लगती है। ‘माचिस की तीली बराबर रोशनी’ इसी तरह की एक पंक्ति है।
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उनकी अपनी कविता हमेशा यह काम करती रही। उथले अनुभवों को जल्दबाजी में जुटाए गए वाक्यों में प्रस्तुत कर देने के बजाय उन्होंने भाषा की गुरुता को बरकरार रखते हुए उसका प्रयोग किया, उसे काव्यात्मकता दी और सावधानी से चुनी गई शब्दावली में अपने अनुभवों, अपनी उम्मीदों, अपने दुखों और स्मृतियों को अनुस्यूत किया। उनकी कविताएँ पहाड़ के निर्जन में बहती उस निर्मल जलधारा की तरह हैं जिसके पानी में सबकुछ साफ़-साफ़ दिखाई देता है, नीचे तली में पड़े सब पत्थर, एक-एक कण रेत।
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