Dil Se Maine Duniya Dekhi
(0)
Author:
Harivansh, Suresh SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Travelogues₹
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हिन्दी के ज़्यादातर पत्रकारों के यात्रा-वृत्तान्त आम तौर पर रपट होते हैं। उनके केन्द्र में सिर्फ़ तथ्य और विवरण होते हैं। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और सांसद हरिवंश के इन यात्रा-विवरणों में तथ्यों के साथ-साथ संवेदना और मानवीय प्रसंगों को भी बख़ूबी पिरोया गया है। इसी के चलते उनकी ये पत्रकारीय रपटें साहित्यिक आस्वाद से युक्त हो जाती हैं।</p> <p>यात्रा के दौरान उनके मन में एक अन्तर्यात्रा भी समानान्तर चलती रहती है, विदेश उन्हें अपने देश को और सतर्क निगाह से देखने को प्रेरित करता है। वे सिर्फ़ पर्यटक की तरह नहीं एक प्रबुद्ध विचारक की तरह दुनिया को देखने लगते हैं। उनके इन यात्रा-संस्मरणों में सतत एक बेचैनी दिखाई देती है। साथ ही उनका पत्रकार भी अपनी वस्तुगतता के साथ लगातार उनके यात्री के साथ रहता है। उनका प्रयास होता है कि वे जहाँ भी जाएँ, वहाँ के यथार्थ को इस तरह प्रस्तुत करें, जिससे समय और समाज की समझ को विस्तार मिले—उनकी अपनी समझ भी खुले और पाठक की भी।</p> <p>यही विशेषता इस पुस्तक को एक साहित्यिक कृति बनाती है। आप इन यात्रा-विवरणों को पढ़कर रोमांचित भी होंगे, उत्तेजित भी होंगे और देश तथा दुनिया के विषय में सोचने के लिए व्याकुल भी होंगे।
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हिन्दी के ज़्यादातर पत्रकारों के यात्रा-वृत्तान्त आम तौर पर रपट होते हैं। उनके केन्द्र में सिर्फ़ तथ्य और विवरण होते हैं। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और सांसद हरिवंश के इन यात्रा-विवरणों में तथ्यों के साथ-साथ संवेदना और मानवीय प्रसंगों को भी बख़ूबी पिरोया गया है। इसी के चलते उनकी ये पत्रकारीय रपटें साहित्यिक आस्वाद से युक्त हो जाती हैं।</p>
<p>यात्रा के दौरान उनके मन में एक अन्तर्यात्रा भी समानान्तर चलती रहती है, विदेश उन्हें अपने देश को और सतर्क निगाह से देखने को प्रेरित करता है। वे सिर्फ़ पर्यटक की तरह नहीं एक प्रबुद्ध विचारक की तरह दुनिया को देखने लगते हैं। उनके इन यात्रा-संस्मरणों में सतत एक बेचैनी दिखाई देती है। साथ ही उनका पत्रकार भी अपनी वस्तुगतता के साथ लगातार उनके यात्री के साथ रहता है। उनका प्रयास होता है कि वे जहाँ भी जाएँ, वहाँ के यथार्थ को इस तरह प्रस्तुत करें, जिससे समय और समाज की समझ को विस्तार मिले—उनकी अपनी समझ भी खुले और पाठक की भी।</p>
<p>यही विशेषता इस पुस्तक को एक साहित्यिक कृति बनाती है। आप इन यात्रा-विवरणों को पढ़कर रोमांचित भी होंगे, उत्तेजित भी होंगे और देश तथा दुनिया के विषय में सोचने के लिए व्याकुल भी होंगे।
Book Details
-
ISBN9788126730766
-
Pages13
-
Avg Reading Time0 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह तीसरा खंड पूर्व के दोनों खंडों से इसलिए भी भिन्न है क्योंकि इस दौरान चन्द्रशेखर देश के मुख्य कार्यकारी की भूमिका में हैं। इस दौरान वे देश की जनता की बुनियादी समस्याओं के बारे में कैसा रुख रखते हैं और इनके निदान के लिए उनके पास क्या कार्यक्रम है, इसकी झलक इस खंड के साक्षात्कारों से मिलती है। प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने धर्म, सांप्रदायिकता, राजनीति, राष्ट्रीय सरकार, समाजवाद, विदेश नीति तथा अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर खुलकर अपना पक्ष रखा है। प्रधानमंत्री के रूप में दिए गए चन्द्रशेखर के साक्षात्कारों की विशेषता है कि वे दृढ़ता से भारत का पक्ष रखते हैं। भेंटवार्ताओं में विभिन्न बुनियादी मुद्दों पर चन्द्रशेखर के विचार अनायास व्यक्त हुए हैं। विभिन्न मुद्दों पर चन्द्रशेखर की मान्यताओं से उनकी अंतर्दृष्टि का भी पता चलता है। उन्हें और मूलभूत राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रश्नों को जानने-समझने में भी ये साक्षात्कार मदद पहुँचाते हैं। सत्तर के दशक से शुरू हुआ विमर्श पूर्व-पक्ष है तो इस तीसरे खंड का विमर्श उत्तर-पक्ष।
Lutian Ke Tile Ka Bhugol
- Author Name:
Prabhash Joshi +1
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‘लुटियन के टीले का भूगोल’ में प्रभाष जोशी के वे लेख संकलित किए गए हैं जिनके केन्द्र में हैं राजनीतिक दल और उनसे जुड़े राजनीतिज्ञ तथा लोकतंत्र को क़ायम रखनेवाली संस्थाएँ। इसके अलावा ऐसे लेख भी हैं जो समाज और समुदाय के समकालीन प्रसंगों का विवेचन करते हैं और अपने समय की राजनीति से भी जुड़ते हैं।
प्रभाष जोशी अपनी भूमिका में लिखते हैं :
“ ‘लुटियन के टीले का भूगोल’ में ऐसे कागद हैं जो मैंने राजनीति पर कारे किए। नई दिल्ली में जहाँ केन्द्र सरकार बैठकर काम करती है—वह लुटियंस हिल कहलाती है। वहाँ अंग्रेज़ राजधानी लाए, उसके पहले रायसीना गाँव था और जिस पर अंग्रेज़ों ने अपनी सरकार के बैठने के लिए भवन बनवाए, वह रायसीना की पहाड़ी कही जाती थी। लुटियन उस वास्तुशास्त्री का नाम था जिसने रायसीना पहाड़ी पर वायसराय की लॉज (जो अब राष्ट्रपति भवन है) नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक और उसके नीचे एसेम्बली (जो अब संसद भवन है) बनवाए। बाद में यह पूरा परिसर लुटियंस हिल कहलाने लगा। उज्जैन के विक्रम के टीले की तर्ज पर इसे मैंने लुटियन का टीला बना लिया—दोनों का अन्तर्विरोध और विडम्बना दिखाने के लिए। आज की राजनीति और सत्ता का केन्द्र यह लुटियन का टीला है।
लेकिन ये मेरे राजनीति पर लिखे लेख नहीं हैं। वे मैंने ‘जनसत्ता’ के सम्पादकीय पेज पर लिखे और यहाँ संकलित नहीं हैं। ‘कागद कारे’ में राजनीति के मानवीय और निजी पहलुओं को खोलने की कोशिश करता हूँ। इनमें उन दस सालों की सभी राजनीतिक घटनाओं और उनके नायक-नायिकाओं के मानवीय और निजी पक्षों को समझने की कोशिश की गई है। नरसिंह राव, सोनिया गांधी, चन्द्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी, मायावती आदि राजनीतिक व्यक्तित्वों को महज़ राजनीति के नज़रिए से नहीं देखा गया है। इनमें वे पहलू खोजे गए हैं जिनके बिना राजनीति नहीं होती। राजनीति के बिना लोकतंत्र नहीं हो सकता।”
Rachnatmak Bechaini Mein
- Author Name:
Chandrashekhar +1
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इस दूसरे खंड के साक्षात्कारों का दौर वह दौर है जब चन्द्रशेखर भारतीय राजनीति के पटल पर छाए हुए हैं। यह दौर कांग्रेस में रहकर पार्टी नीतियों का विरोध, जेपी आंदोलन और आपातकाल में उनके जबरदस्त हस्तक्षेप तथा जनता पार्टी के गठन और उसके अध्यक्ष बनने का दौर है। पुस्तक में संकलित साक्षात्कारों पर एक नजर डालें तो चन्द्रशेखर एक खास तरह की रचनात्मक बेचैनी और कुछ करने के लिए जल्दबाजी में दिखाई देते हैं। इस दौरान उनका अद्भुत रूप सामने आता है, जिसमें उनकी ऊर्जा और लक्ष्य दोनों साफ-साफ परिलक्षित होते हैं। उनके पास केवल लक्ष्य ही नहीं है, बल्कि उस तक पहुँचने का रास्ता भी है, जिसे वे मौजूदा कठिनाइयों के बीच से ही निकालना चाहते हैं। गत 30 वर्षों के भारतीय राजनीति के घटनाक्रम से साक्षात्कार करानेवाली एक संग्रहणीय पुस्तक।
Grameen Jeevan Evam Aajeevikaen
- Author Name:
Suresh Sharma
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ये कहानियाँ व्यक्तिगत स्तर पर थोड़ी-सी आय अर्जित करने या शिशु और परिवार के लिए बेहतर स्वास्थ्य या बेहतर शिक्षा प्राप्त करने के लिए, उनके अल्प संसाधनों के उपयोग में समझदारी को दर्शाती हैं। ग्रामीण व्यक्तियों के पास भौतिक संसाधनों की कमी है, लेकिन जीवन में आगे बढऩे की चाहत और कठिन प्रयास की इच्छा में कोई कमी नहीं है। जैसा कि कहानियों में पाएँगे, सामाजिक कार्यकर्ता और सामाजिक रूप से उन्मुख सरकारी अधिकारी, उन्हें मार्गदर्शन, सुविधा, सामग्री-सहायता और उचित सरकारी योजनाओं के साथ जोडऩे में मदद करते हैं। ग्रामीण भारत में जश्न मनाने के लिए बहुत कुछ है। मैं उन सभी लोगों के लिए इस पुस्तक की अनुशंसा करता हूँ, जो इस बारे में पढऩे में रुचि रखते हैं कि ग्रामीण भारत कैसे रहता है और कैसे अपनी समस्याओं को हल करता है। संजीव फंसालकर निदेशक, विकास अण्वेष फाउंडेशन
Soochana Ka Adhikar
- Author Name:
Arvind Kejariwal +2
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राजशाही में व्यक्ति और समाज के पास कोई अधिकार था, तो सिर्फ़ इतना कि वह सत्तावर्ग की आज्ञा का चुपचाप पालन करे। राजा निरंकुश था, सर्वशक्तिमान। उस पर कोई उँगली नहीं उठा सकता था, न उसे किसी चीज़ के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता था। औद्योगिक क्रान्ति तथा उदारवाद के आगमन और लोकतांत्रिक शासन पद्धतियों के प्रारम्भ के साथ ही नागरिक स्वतंत्रता की अवधारणा आई। इसके बावजूद द्वितीय विश्वयुद्ध तक प्रजातांत्रिक देशों में भी शासनतंत्र में ‘गोपनीयता’ एक स्वाभाविक चीज़ बनी रही। विभिन्न दस्तावेज़ों में क़ैद सूचनाओं को ‘गोपनीय’ अथवा ‘वर्गीकृत’ करार देकर नागरिकों की पहुँच से दूर रखा गया। लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के बावजूद राजनेताओं एवं अधिकारियों में स्वयं को ‘शासक’ या ‘राजा’ समझने की प्रवृत्ति हावी रही। यही शासकवर्ग आज भारतीय लोकतंत्र का असली मालिक है। नागरिक का पाँच साल में महज़ एक वोट डाल आने का बेहद सीमित अधिकार इतना निरुत्साहित करनेवाला है कि चुनावों में बोगस वोट न पड़ें तो मतदान का प्रतिशत तीस-चालीस फ़ीसदी भी न पहुँचे। यही कारण है कि अक्टूबर 2005 से लागू सूचनाधिकार लोकतांत्रिक राजा की सत्ता के लिए गहरे सदमे के रूप में आया है। राजनेता और नौकरशाह हतप्रभ हैं कि इस क़ानून ने आम नागरिक को लगभग तमाम ऐसी चीज़ों को देखने, जानने, समझने, पूछने की इजाज़त दे दी है, जिन पर परदा डालकर लोकतंत्र को राजशाही अन्दाज़ में चलाया जा रहा था। इस पुस्तक में संकलित उदाहरणों में आप देख पाएँगे कि किस तरह लोकतांत्रिक राजशाही तेज़ी से अपने अन्त की ओर बढ़ रही है। साथ ही इस पुस्तक में यह भी बताया गया है कि हम अपने इस अधिकार का प्रयोग कैसे करें।
Jivan Jaisa Jiya
- Author Name:
Chandrashekhar +1
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पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की यह आत्मकथा सिर्फ़ उनकी निजी ज़िन्दगी की कहानी नहीं है। यह उनके समय का प्रामाणिक दस्तावेज़ भी है। वे आज़ादी के बाद की निर्णायक राजनैतिक घटनाओं से जुड़े रहे। उन घटनाओं को एक निश्चित दिशा देने में उन्होंने ऐतिहासिक भूमिका भी निभाई। इसलिए उनकी इस आत्मकथा में उनके दौर का अनुद्घाटित इतिहास सुरक्षित है। अपने समय के अनेक व्यक्तित्वों और घटनाओं के बारे में उन्होंने ऐसी जानकारियाँ भी दी हैं जिनसे समकालीन राजनैतिक-सामाजिक इतिहास को समझने के लिए नए तथ्य प्राप्त होते हैं।
बलिया के एक किसान परिवार में जनमे चन्द्रशेखर अपनी जीवन-यात्रा में अनेक पड़ावों से गुज़रे। स्वाधीनता-आन्दोलन में शिरकत की। आज़ादी के बाद समाजवाद के लिए चलाए जानेवाले संघर्ष को आगे बढ़ाया। कांग्रेस को प्रगतिशील बनाने के लिए नए कार्यक्रम रखे। आपातकाल की जेल-यात्रा के बाद जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष बने। जनता दल की सरकार के जाने के बाद देश के प्रधानमंत्री पद पर पहुँचे और समझौताविहीन व्यक्तित्व के कारण अन्तत: इस्तीफ़ा दिया। उदारीकरण और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नव-साम्राज्यवाद का वे विरोध करते रहे। उनकी इस आत्मकथा में बाहरी संसार के अलावा उनके व्यक्तित्व की गहरी संवेदनशीलता और मानवीय पक्ष का वृत्तान्त भी शामिल है। हिन्दी में आत्मकथा साहित्य की परम्परा में चन्द्रशेखर की यह आत्मकथा एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
Cinema Ki Duniya Aur Duniya Ka Cinema
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Vimal Chandra Pandey
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विमल चन्द्र पाण्डेय का जन्म 20 अक्टूबर, 1981 को बनारस, उत्तर प्रदेश में हुआ। मूल रूप से गाँव कड़सर, जिला बलिया के निवासी। शुरुआती पढ़ाई बनारस में ही। फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई और पाँच साल तक पत्रकारिता करने के बाद इस्तीफा। वर्तमान में फ्रीलांसिंग, लेखन और फिल्म-निर्देशन। उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं- ‘डर’, ‘मस्तूलों के इर्द-गिर्द’, ‘उत्तर प्रदेश की खिड़की’, 'मेरी प्रिय कहानियाँ' और ‘मारण मंत्र’ (कहानी-संग्रह); ‘भले दिनों की बात थी’ (उपन्यास); ‘ई इलहाब्बाद है भइया’ (संस्मरण)। उनकी कहानियों और कविताओं के अनुवाद कन्नड़, मराठी, मलयालम, तमिल, गुजराती, रूसी और अंग्रेज़ी भाषाओं में हुए हैं। उनकी पहली फ़िल्म है ‘द होली फिश’ जिसके निर्देशन के अलावा लेखन और निर्माण भी उन्होंने स्वयं ही किया। दूसरी फ़िल्म ‘धतूरा’ रिलीज के लिए तैयार है। उन्हें ‘भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार’ और ‘मीरा स्मृति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है।
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