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Uttar Himalay-Charit

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सृजनशील रचनाकार उच्चकोटि का यायावर या घुमक्कड़ भी हो, ऐसा संयोग प्राय: दुर्लभ होता है, और जब होता है तो उसकी प्रतिभा अविस्मरणीय कृतियों को जन्म देती है। प्रस्तुत पुस्तक ऐसी ही एक असामान्य और अविस्मरणीय कृति है, जिसमें बांग्ला के सुख्यात यायावर-कथाकार प्रबोध कुमार सान्याल ने अपनी उत्तर हिमालय-यात्रा का रोचक, रोमांचक और कलात्मक विवरण प्रस्तुत किया है। इस यात्रा-कथा में उत्तरी हिमालय-मेरुदंड के उन दुर्गम अंचलों की दृश्य-छवियों को शब्दों में उतारा गया है जिनसे हमारा परिचय आज भी नहीं के बराबर है और जहाँ की धूल का स्पर्श बाहरी लोगों ने शताब्दियों के दौरान कभी-कभी ही किया है। महासिन्धु, वितस्ता, विपाशा, शतद्रु, इरावती, कृष्णगंगा, चन्द्रभागा आदि नदियों के उस अनोखे उद्गम प्रदेश में पहाड़ी दर्रों के बीच दौड़ती-उछलती धाराओं के किनारे-किनारे चलता हुआ लेखक जैसे पाठक को भी अपने साथ ले चलता है और दिखाता है बिलकुल निकट से हिमशिखरों की अमल-धवल आकृतियाँ तथा सुनाता है एकान्त वन-प्रान्तर और नीरव मरुघाटियों का मुखर-मौन संगीत। इसी क्रम में वह जब-तब अतीत की गुफाओं में भी ले चलता है या फिर भविष्य की टोह लेने लगता है। समर्थ लेखक इस प्रकार अपनी यात्रा में पाठक को सहभागी ही नहीं, सहभोक्ता बना देता है जो रचनात्मक उपलब्धि का सबसे बड़ा प्रमाण है।

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सृजनशील रचनाकार उच्चकोटि का यायावर या घुमक्कड़ भी हो, ऐसा संयोग प्राय: दुर्लभ होता है, और जब होता है तो उसकी प्रतिभा अविस्मरणीय कृतियों को जन्म देती है। प्रस्तुत पुस्तक ऐसी ही एक असामान्य और अविस्मरणीय कृति है, जिसमें बांग्ला के सुख्यात यायावर-कथाकार प्रबोध कुमार सान्याल ने अपनी उत्तर हिमालय-यात्रा का रोचक, रोमांचक और कलात्मक विवरण प्रस्तुत किया है।

इस यात्रा-कथा में उत्तरी हिमालय-मेरुदंड के उन दुर्गम अंचलों की दृश्य-छवियों को शब्दों में उतारा गया है जिनसे हमारा परिचय आज भी नहीं के बराबर है और जहाँ की धूल का स्पर्श बाहरी लोगों ने शताब्दियों के दौरान कभी-कभी ही किया है। महासिन्धु, वितस्ता, विपाशा, शतद्रु, इरावती, कृष्णगंगा, चन्द्रभागा आदि नदियों के उस अनोखे उद्गम प्रदेश में पहाड़ी दर्रों के बीच दौड़ती-उछलती धाराओं के किनारे-किनारे चलता हुआ लेखक जैसे पाठक को भी अपने साथ ले चलता है और दिखाता है बिलकुल निकट से हिमशिखरों की अमल-धवल आकृतियाँ तथा सुनाता है एकान्त वन-प्रान्तर और नीरव मरुघाटियों का मुखर-मौन संगीत। इसी क्रम में वह जब-तब अतीत की गुफाओं में भी ले चलता है या फिर भविष्य की टोह लेने लगता है। समर्थ लेखक इस प्रकार अपनी यात्रा में पाठक को सहभागी ही नहीं, सहभोक्ता बना देता है जो रचनात्मक उपलब्धि का सबसे बड़ा प्रमाण है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2020
Weight
268 grams
ISBN-13
9789389598414
Pages
344
Reading time
~11 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
13 × 20 cm
Language
Hindi

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