Ye Jo Bihar Hai
(0)
Author:
Arvind MohanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
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यह जो बिहार है बिहार के स्वभाव, उसके बुनियादी चरत्रि, उसकी ताक़त और कमज़ोरियों को रेखांकित करते हुए किसी भी बिहारी, और साथ ही देश के अन्य लोगों को भी, यह बताने का प्रयास करती है कि बिहार वास्तव में है क्या, और क्यों किसी बिहारी को इस पर गर्व करना चाहिए। बिहार की बनावट में जनक, याज्ञवल्क्य, पाणिनी, आर्यभट्ट, बुद्ध, महावीर, पतंजलि, चाणक्य, सिख गुरुओं, कबीर, गोरखनाथ से लेकर गांधी तक का योगदान है। आज भी ज्ञान को लेकर जैसी उत्कंठा बिहार-भूमि में मिलती है, वैसी कहीं और दुर्लभ है। यहाँ के मूल्यबोध को गढ़ने में मुख्य भूमिका शासकों की नहीं, दार्शनिकों की रही है। यह किताब इन सब बातों की चर्चा करते हुए उस बिहार पर भी विचार करती है जो वह आज है—विकास के लगभग सभी पैमानों पर एकदम आखिरी, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, परिवहन तंत्र और नागरिक सुविधाओं आदि के मामले में पिछड़ा, जहाँ से लाखों लोग हर साल मजदूरों के रूप में पलायन करते हैं और जहाँ के लोगों को लोग बिहारी कहकर जैसे नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन द्वारा अलग-अलग समय पर लिखे गए आलेखों-टिप्पणियों के साथ खास तौर पर इसी किताब के लिए लिखी गई सामग्री से सम्पन्न यह किताब इन सबके राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों को तलाशने का काम करती है। साथ ही यह भी कि ज्ञान का आदर और विद्वत्ता की परम्परा आज भी बिहार से आनेवाले छात्रों, आम पाठकों और उनकी चर्चाओं, बहसों में क्यों सबसे अलग और सबसे ऊर्जावान दिखाई देती है, और क्यों यहाँ के लोग अनुकरण और भक्ति के ऊपर तर्क और विमर्श को तरजीह देते रहे हैं। यह किताब हमें बिहार को एक नयी समझ से देखने की वजहें उपलब्ध कराती है।
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यह जो बिहार है बिहार के स्वभाव, उसके बुनियादी चरत्रि, उसकी ताक़त और कमज़ोरियों को रेखांकित करते हुए किसी भी बिहारी, और साथ ही देश के अन्य लोगों को भी, यह बताने का प्रयास करती है कि बिहार वास्तव में है क्या, और क्यों किसी बिहारी को इस पर गर्व करना चाहिए।
बिहार की बनावट में जनक, याज्ञवल्क्य, पाणिनी, आर्यभट्ट, बुद्ध, महावीर, पतंजलि, चाणक्य, सिख गुरुओं, कबीर, गोरखनाथ से लेकर गांधी तक का योगदान है। आज भी ज्ञान को लेकर जैसी उत्कंठा बिहार-भूमि में मिलती है, वैसी कहीं और दुर्लभ है। यहाँ के मूल्यबोध को गढ़ने में मुख्य भूमिका शासकों की नहीं, दार्शनिकों की रही है।
यह किताब इन सब बातों की चर्चा करते हुए उस बिहार पर भी विचार करती है जो वह आज है—विकास के लगभग सभी पैमानों पर एकदम आखिरी, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, परिवहन तंत्र और नागरिक सुविधाओं आदि के मामले में पिछड़ा, जहाँ से लाखों लोग हर साल मजदूरों के रूप में पलायन करते हैं और जहाँ के लोगों को लोग बिहारी कहकर जैसे नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन द्वारा अलग-अलग समय पर लिखे गए आलेखों-टिप्पणियों के साथ खास तौर पर इसी किताब के लिए लिखी गई सामग्री से सम्पन्न यह किताब इन सबके राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों को तलाशने का काम करती है।
साथ ही यह भी कि ज्ञान का आदर और विद्वत्ता की परम्परा आज भी बिहार से आनेवाले छात्रों, आम पाठकों और उनकी चर्चाओं, बहसों में क्यों सबसे अलग और सबसे ऊर्जावान दिखाई देती है, और क्यों यहाँ के लोग अनुकरण और भक्ति के ऊपर तर्क और विमर्श को तरजीह देते रहे हैं।
यह किताब हमें बिहार को एक नयी समझ से देखने की वजहें उपलब्ध कराती है।
Book Details
-
ISBN9789360866563
-
Pages236
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: On 22 April 2025, the Baisaran Valley in Pahalgam, south Kashmir, witnessed a horrifying attack when heavily armed terrorists from the Resistance Front, a proxy of Lashkar-e-Taiba (LeT), fully sponsored by the Pakistan Army and Inter-Services Intelligence (ISI), shattered its serenity with gunfire, killing twenty-six innocent individuals and injuring several others. The victims included newlyweds, elderly parents and solo trekkers. A Hindu professor narrowly escaped death by reciting the kalma, a Christian sacrificed his life to save his family and a local Muslim was killed while saving others. This was an attempt to rupture India’s religious harmony and create widespread outrage in the country. India chose to respond to this incident, which shook not just the nation but the world, with Operation SINDOOR, showcasing its military modernization and might. The mission targeted terror camps, including the ones in Bahawalpur and Muridke, linked to Jaish-e-Mohammed and LeT, respectively, and terrorist launch pads in Pakistan-occupied Jammu and Kashmir. India’s response demonstrated military professionalism, technological maturity and diplomatic sagacity, ensuring regional stability while delivering a powerful message against Pakistan and its terror factory. This book carries minute details and a blow-by-blow account of the ‘Four-Day War’ between two hostile nuclear powers. The author underscores the intelligent use of media and social media in the battle of narratives, discusses the ‘new normal’ and emerging rules of engagement, and suggests a way forward. Offering hitherto unrevealed information, Lt Gen. ‘Tiny’ Dhillon (Retd) opens a window to Operation SINDOOR, a testament to the strength of the Indian military and the unity of India when confronted with an adverse situation. With visuals from the destroyed target areas, this book is a powerful reminder of the impact of terrorism and the enduring hope for peace and justice. Operation SINDOOR is a must-read for everyone.
Hamar Champaran
- Author Name:
Arvind Mohan
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Description:
चम्पारण को आज हम ख़ासतौर पर गांधी के साथ याद करते हैं। सत्याग्रह और अहिंसा के अपने पहले प्रयोग भारत में उन्होंने इसी भूमि पर किये थे। लेकिन इसका इतिहास बहुत पीछे तक जाता है जिसमें राजा जनक, सीता, वाल्मीकि, लव-कुश जैसे पौराणिक चरित्रों से लेकर भगवान बुद्ध, चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक, हर्षवर्द्धन जैसे ऐतिहासिक शासकों के नाम आते हैं।
‘हमर चम्पारण’ इस ज़िले के जीवन, स्वभाव, इतिहास के कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ावों और इसकी आर्थिक-सामाजिक अवस्थिति के साथ उस भाव को साकार करने की कोशिश करती है, जिसे चम्पारण को जीने और जानने वाले महसूस करते हैं।
‘कुछ अपनी’ और ‘कुछ पराई’ शीर्षक दो भागों में संयोजित इस पुस्तक के पहले भाग में वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन चम्पारण से अपनी भावनात्मक तारतम्यता को बनाए रखते हुए एक तरफ जहाँ उसका ऐतिहासिक और भौगोलिक परिचय देते हैं, वहीं चम्पारण सत्याग्रह, ध्रुपद की परम्परा, वहाँ की चीनी मिलों और गन्ने की खेती आदि विभिन्न विषयों पर लिखे गए अपने शोधपरक आलेखों में चम्पारण का एक वृहत्तर चित्र पाठक के सामने रखते हैं जिसमें गांधी, नील की खेती, निलहों का जुल्म और चम्पारण के लोगों का संघर्ष ख़ासतौर पर दिखाई देता है। दूसरे भाग में लम्बे समय के दौरान इकट्ठा की गई सामग्री के साथ वे यहाँ कुछ ऐसे आलेख भी प्रस्तुत कर रहे हैं जो उन लोगों ने लिखे थे जिन्होंने बहुत गहराई से यहाँ के जीवन, आबोहवा और विडम्बना को देखा था। इनमें जॉन बीम्स, नगेन्द्रनाथ गुप्त, राजेन्द्र प्रसाद, पीर मुहम्मद मूनिस, शम्भुनाथ मिश्र और महात्मा गांधी के लेख उल्लेखनीय हैं।
यह चम्पारण का भाव-चित्र भी है और तथ्य-विश्लेषण भी।
Aadhunik Bharat Mein Jati
- Author Name:
M.N. Shrinivas
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Description:
अथक अध्ययन और शोध के परिणामस्वरूप एम.एन. श्रीनिवास के निबन्ध आकार ग्रहण करते हैं। भारतीय समाज की नब्ज़ पर उनकी पकड़ गहरी और मज़बूत है। उनके लेखन में इतिहास और बुद्धि का बोझिलपन नहीं है। प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत निबन्धों में समाजशास्त्र व नृतत्त्वशास्त्र विषयक समस्याओं के व्यावहारिक पक्षों पर रोशनी डाली गई है। लेखक समस्याओं की तह में जाना पसन्द करता है और उसके विश्लेषण का आधार भी यही है।
हर समाज की अपनी मौलिक संरचना होती है। जिस संरचना को उस समाज के लोग देखते हैं, वह वैसी नहीं होती जैसी समाजशास्त्री शोध और अनुमानों के आधार पर प्रस्तुत करते हैं। भारतीय समाजशास्त्रियों ने जाति- व्यवस्था के जटिल तथ्यों को ‘वर्ण’ की मर्यादाओं में समझने की भूल की और जिसके चलते सामाजिक संरचना का अध्ययन सतही हो गया। गत सौ-डेढ़ सौ वर्षों के दौरान जाति-व्यवस्था का असर कई नए-नए कार्यक्षेत्रों में विस्तृत हुआ है और उसकी ऐतिहासिक व मौजूदा तंत्र की नितान्त नए दृष्टिकोण से विश्लेषण करने की माँग एम.एन. श्रीनिवास करते हैं। हमारे यहाँ जाति-व्यवस्था की जड़ें इतनी गहरी हैं कि बिना इसके सापेक्ष परिकलन किए मूल समस्याओं की बात करना बेमानी है। एम.एन. श्रीनिवास का मानना है कि समाज-वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए राजनीतिक स्तर के जातिवाद तथा सामाजिक एवं कर्मकांडी स्तर के जातिवाद में फ़र्क़ करना ज़रूरी है।
Bhago Nahin Duniya Ko Badlo
- Author Name:
Rahul Sankrityayan
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- Description: राहुल सांकृत्यायन का समूचा जीवन घुमक्कड़ी का था। भिन्न-भिन्न भाषा, साहित्य एवं प्राचीन संस्कृत-पाली-प्राकृत-अपभ्रंश आदि भाषाओं का अनवरत अध्ययन-मनन करने का अपूर्व वैशिष्ट्य उनमें था। उनके घुमक्कड़ जीवन के मूल में अध्ययन की प्रवृति ही सर्वोपरि रही। राहुल जी जब जिसके सम्पर्क में गए, उसकी पूरी जानकारी हासिल की। जब वे साम्यवाद के क्षेत्र में गए, तो कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्तालिन आदि के राजनीतिक दर्शन की पूरी जानकारी प्राप्त की। यही कारण है कि उनके साहित्य में जनता, जनता का राज्य और मेहनतकश मजदूरों का स्वर प्रबल और प्रधान है। उनकी रचनाओं में प्राचीन के प्रति आस्था, इतिहास के प्रति गौरव और वर्तमान के प्रति सधी हुई दृष्टि का समन्वय देखने को मिलता है। यह केवल राहुल जी थे जिन्होंने प्राचीन और वर्तमान भारतीय साहित्य-चिन्तन को समग्रत: आत्मसात् कर हमें मौलिक दृष्टि देने का निरन्तर प्रयास किया। ‘भागा नहीं दुनिया का बदलो’ राहुल जी की अनुपम क्रान्तिकारी रचना है। यह कहानियों और उपन्यास के बीच की एक अनोखी राजनीतिक कथाकृति है। इस कृति की रचना का विशेष उद्देश्य यह है कि कम पढ़े-लिखे लोग राजनीति को समझ सकें। उन्हें अपनी अच्छाई-बुराई भी मालूम हो और उन्हें इसका भी ज्ञान हो कि राजनीति की दुनिया में कैसे-कैसे दाँव-पेंच खेले जाते हैं। राहुल-साहित्य में इस कृति का एक विशिष्ट स्थान है।
Mahabharatkalin Samaj
- Author Name:
Sukhmay Bhattacharya
- Book Type:

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Description:
मुझे यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई है कि श्रीमती पुष्पा जैन ने ‘महाभारतकालीन समाज’ का सुन्दर हिन्दी अनुवाद किया है। इस पुस्तक के लेखक श्री सुखमय जी भट्टाचार्य मेरे बहुत निकट के मित्र हैं। मैने स्वयं देखा है कि उन्होंने कितने परिश्रम से इस ग्रन्थ की रचना की थी, कितनी बार उन्हें ‘महाभारत’ का पारायण करना पड़ा है, कितनी बार उन्हें एक वक्तव्य का दूसरे वक्तव्य से संगति मिलान के लिए माथापच्ची करनी पड़ी है, यह सब मेरे सामने ही हुआ है। वे बड़े धीर स्वभाव के गम्भीर विद्वान हैं। जब तक किसी समस्या का समाधान तर्कसंगत और सन्तोषजनक ढंग से नहीं हो जाता, तब तक उन्हें चैन नहीं मिलता। बड़े धैर्य, अध्यवसाय और उत्साह के साथ उन्होंने इस कठिन कार्य को सम्पन्न किया है। कार्य सचमुच कठिन था।
‘महाभारत’ भारतीय चिन्तन का विशाल विश्वकोश है। पंडितों में यह भी जल्पना-कल्पना चलती रहती है कि इसका कौन-सा अंश पुराना है, कौन-सा अपेक्षाकृत नवीन। कई प्रकार की समाज व्यवस्था का पाया जाना विभिन्न कालों में लिखे गए अंशों के कारण भी हो सकता है। फिर इस ग्रन्थ में अनेक श्रेणी के लोगों के आचार-विचार की चर्चा है। सब प्रकार की बातों की संगति बैठना काफ़ी कठिन हो जाता है। पं. सुखमय भट्टाचार्य जी ने समस्त विचारों और व्यवहारों का निस्संग दृष्टि से संकलन किया है। पाठक को अपने निष्कर्ष पर पहुँचने की पूरी छूट है। फिर भी उन्होंने परिश्रमपूर्वक निकाले अपने निष्कर्षों से पाठक को वंचित भी नहीं रहने दिया, इसीलिए यह अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है।
इस ग्रन्थ का हिन्दी में अनुवाद करके श्रीमती पुष्पा जैन ने उत्तम कार्य किया है। इस अनुवाद के लिए वे सभी सहृदय पाठकों की बधाई की अधिकारिणी हैं।
—हजारीप्रसाद द्विवेदी
Kinnar : Abujh Rahasyamay Jeevan
- Author Name:
Sharad Dwivedi
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Description:
‘किन्नर : अबूझ रहस्यमय जीवन’ में किन्नरों के दर्द, उनकी खूबी, उनके संस्कार, संस्कृति व परम्पराओं को समाहित किया गया है।
थर्ड जेंडर अर्थात किन्नर कानूनी दायरे में नहीं आते। इनसान होने के बावजूद किन्नर उपेक्षित हैं। इनके हित में कानून तो बने लेकिन उसका जमीनी स्तर पर पालन नहीं हो रहा है। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि किन्नर न स्त्री हैं और न ही पुरुष। फिर उन्हें कोई आरक्षण अथवा कानून का लाभ कैसे दिया जाए? यह स्थिति भारत सहित विश्व के लगभग सभी देशों में है। आखिर यह बड़ी विडम्बना है ना! यहाँ व्यक्ति को बिना किसी गलती की सजा दी जा रही है। उन्हें धार्मिक, सांस्कृतिक पहचान दिलाने की कागजी कार्रवाई शुरू हुई। लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है।
यह पुस्तक किन्नरों से आत्मीय जुड़ाव कराती है। साथ ही किन्नरों के अधिकार व सम्मान के लिए पुरजोर आवाज उठाने को प्रेरित भी करती है।
Vivekwadi Dr. Narendra Dabholkar : Lekh Aur Sakshatkar
- Author Name:
Narendra Dabholkar
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Description:
प्राचीन भारतीय परम्परा में चार्वाक, भगवान बुद्ध, महावीर, कबीर आदि सन्तों तथा चिन्तकों ने कार्यकारण-भाव के आधार पर व्यक्ति, समाज, धर्म की समीक्षा कर उसे विवेकवादी तथा विज्ञाननिष्ठ बनाने की पहल की। महाराष्ट्र में सन्त तुकाराम, सन्त ज्ञानेश्वर, सन्त गाडगे बाबा, महात्मा फुले, महर्षि विट्ठल रामजी शिंदे, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, राजर्षि शाहूजी महाराज तथा डॉ. बाबासाहेब आदि चिन्तकों एवं सुधारकों ने इसी परम्परा को आगे बढ़ाया। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने भी इसी परम्परा को आगे ले जाने का कार्य किया
है।
प्रस्तुत किताब डॉ. नरेंद्र दाभोलकर द्वारा लिखित चार लेखों और एक दीर्घ साक्षात्कार का संकलन है। पहले लेख में 'समाजवादी युवक दल' की स्थापना और उसके कार्य का विवेचन है।
‘संघर्ष के मोर्चे पर’ लेख में बुवा-बाबा द्वारा चलाए गए गुरुडम जैसे अन्धविश्वासों तथा समिति द्वारा इसके विरोध में किए गए आन्दोलनों का विवेचन है। ऐसे अन्धविश्वासों के ख़िलाफ़ आन्दोलन कर चुनौती प्रक्रिया पूरी करते समय समिति के कार्यकर्ता कौन-सी सावधानियाँ बरतें, इसका मार्गदर्शन है। ‘कौल विवेक का’ लेख में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विवेकवाद के आधार पर जीवन की उन्नति सम्भव है तथा इन्हीं हथियारों से गुरुडम के ख़िलाफ़ संघर्ष कर समाज को अन्धविश्वास से मुक्त किया जा सकता है, इसका सन्देश है। ‘एक अनन्त यात्रा’ एक प्रकार से लेखक की तथा ‘अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति’ की जीवन-यात्रा ही है। इस यात्रा में ‘अंनिस’ के कार्य की शुरुआत, उसका विस्तार तथा महाराष्ट्र की जनता के मन में जाग्रत किए गए विज्ञाननिष्ठ तथा विवेकवादी का विवेचन है।
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