Swayamsiddha
About the book
स्वयंसिध्दा - समाज और स्त्री मन को टटोलती कहानियांधूप और छाँव-सी ज़िंदगी खेलती रहती है एक खेल। जब उजाला आता है तो चारो तरफ चकाचौंध सा हो जाता है और जब अँधेरा घिरता है तो मन का जैसे हर कोना रिसने लगता है। तमाम उम्र परछाइयों के पीछे भागती स्वयंसिद्धा, जिंदगी की अजीब सी पहेली को सुलझाने का लाख जतन करती है पर उसके बाद भी उस भीगे मन के कोने को खोलने के लिए कोई सिरा नहीं मिलता। स्वयंसिद्धा अपने विचारों के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की जितनी कोशिश करती उसमें उतना ही गहराई तक चली जाती है। भला कोई कीट, मकड़ी के बेहद खूबसूरत और महीन जाले से क्या कभी बाहर आया है जो स्वयंसिद्धा आ जाती।स्त्री मन हर पल में ढेरों सपने बुनता है पर क्या कोई पुरुष उस मन के अंदर झाँककर उन भावों को पढ़ पाता है या सिर्फ देह से ही वापस लौटकर आ जाता है।
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About the Book
स्वयंसिध्दा - समाज और स्त्री मन को टटोलती कहानियांधूप और छाँव-सी ज़िंदगी खेलती रहती है एक खेल। जब उजाला आता है तो चारो तरफ चकाचौंध सा हो जाता है और जब अँधेरा घिरता है तो मन का जैसे हर कोना रिसने लगता है। तमाम उम्र परछाइयों के पीछे भागती स्वयंसिद्धा, जिंदगी की अजीब सी पहेली को सुलझाने का लाख जतन करती है पर उसके बाद भी उस भीगे मन के कोने को खोलने के लिए कोई सिरा नहीं मिलता। स्वयंसिद्धा अपने विचारों के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की जितनी कोशिश करती उसमें उतना ही गहराई तक चली जाती है। भला कोई कीट, मकड़ी के बेहद खूबसूरत और महीन जाले से क्या कभी बाहर आया है जो स्वयंसिद्धा आ जाती।स्त्री मन हर पल में ढेरों सपने बुनता है पर क्या कोई पुरुष उस मन के अंदर झाँककर उन भावों को पढ़ पाता है या सिर्फ देह से ही वापस लौटकर आ जाता है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- FlyDreams Publications
- Weight
- 175 grams
- ISBN-13
- 9788194113195
- Pages
- 150
- Reading time
- ~5 hrs
- Age
- 11-18
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 12.9 × 19.8 cm
- Language
- Hindi
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