Hiye Ra Haraf

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Author:

Prakash Amrawat

Language:

Rajasthani

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हिये रा हरफ (कहाणी संग्रै) प्रकाश अमरावत री पैली पोथी है। विसय, सैली, भाव अर भासा री दीठ सूं सगली कहाणियां न्यारी-निकेवली अर टाळवीं हैं। समाज री कुरीतां नै मेटण रो जतन ए कहाणियां हैं। घणकरी कहाणियां गांवाई तबकै सूं सरोकार राखै। मूळ में ए कहाणियां नारी पात्रा नै लेयार लिखीजी हैं। कहाणियां भावना प्रधान हैं। हरैक कहाणी आपरै लारै एक सन्देस की नुवीं सोच अर सीख देवै।

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ISBN
8126016140
Pages
124
Avg Reading Time
4 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

हिये रा हरफ (कहाणी संग्रै) प्रकाश अमरावत री पैली पोथी है। विसय, सैली, भाव अर भासा री दीठ सूं सगली कहाणियां न्यारी-निकेवली अर टाळवीं हैं। समाज री कुरीतां नै मेटण रो जतन ए कहाणियां हैं। घणकरी कहाणियां गांवाई तबकै सूं सरोकार राखै।
मूळ में ए कहाणियां नारी पात्रा नै लेयार लिखीजी हैं। कहाणियां भावना प्रधान हैं। हरैक कहाणी आपरै लारै एक सन्देस की नुवीं सोच अर सीख देवै।

Book Details

  • ISBN
    8126016140
  • Pages
    124
  • Avg Reading Time
    4 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Hiye Ra Haraf marks Prakash Amaravat's entry into Rajasthani fiction with a collection that foregrounds the inner lives of rural women navigating entrenched social evils. Published by Sahitya Akademi, each story in this debut adopts a distinct emotional register and stylistic approach, yet all share a common commitment: to expose and erode practices that diminish dignity in village Rajasthan. The narratives are unapologetically emotion-driven, investing heavily in how characters feel their circumstances rather than merely documenting them. Amaravat constructs his protagonists as thinkers and witnesses, not just victims, embedding within each tale a reflective core—a message or a provocation to reconsider inherited norms. The language itself is tailored to echo the cadences of rural speech, grounding abstract moral questions in the particularity of place and idiom.

ई किताब पढ़ण सूं मनै कांई तरा रो अनुभव मिलसी?

ई कहाणी संग्रै भावनावां सूं भरियोड़ो अनुभव देवै। हरैक कहाणी में थे नारी पात्रा री भीतरली दुनिया में उतरोगा—थारै साथै उणां रा दुःख, संघरस अर आस रैवैगी। कहाणियां धीमी चाल सूं चालै, पण मन नै छूवै। ई ओ किस्सा-कहाणी नीं है जिको थनै रोमांचित करै, बल्कि ओ ओ लेखन है जिको थनै सोचण माथै मजबूर करै। हरैक कहाणी री अंत में एक सन्देस छूटै जिको थारै मन में बो़यो रैसी। जे थे धीरज सूं पढ़ण वाळा हो अर भावना प्रधान साहित्य नै पसंद करो, तो ई संग्रै थारै लारै एक गैरो अनुभव छोड़ैसी।

ई किताब किणा रै लारै खास तौर सूं सूटैगी अर पाठक सूं कांई अपेक्षा राखै?

  • जिणनै राजस्थानी गांवा री जिनगाणी अर बोली सूं प्रेम है अर जाणकारी चावै
  • जिणनै नारी पात्रा री भीतरली ताकत अर संघरस री कहाणियां पढ़ण में रुचि है
  • जिणनै समाजिक कुरीतां अर परम्परावां माथै सवाल उठावणो पसंद है
  • जिणनै भावना प्रधान, संदेस देवण वाळी कहाणियां चावै जिका तुरत-फुरत नीं बल्कि सोच-विचार मांगै

पाठक सूं अपेक्षा है कि वो राजस्थानी भासा अर गांवाई परिवेस नै समझण री तैयारी राखै।

ई किताब रो विसय भारतीय पाठकां खातर आज रै समै में कित्ती प्रासंगिक है?

ई संग्रै री कहाणियां समाजिक कुरीतां—खास करीनै नारियां रै खिलाफ होवण वाळी प्रथावां—नै उजागर करै, जिका आज बी भारत रै घणखरै गांवा अर कस्बां में जिंवदा हैं। स्त्री शिक्षा, स्वतंत्रता, सम्मान अर समानता रा सवाल आज बी केन्द्रीय हैं। ई कहाणियां राजस्थानी गांवा री पृष्ठभूमि में लिखीजी है, पण इणां में उठावीजी बातां पूरै भारत रै ग्रामीण समाज माथै लागू होवै। नारी पात्रा री भीतरली ताकत अर उणां री सोच नै केंद्र में राखणो आज री समकालीन बहसां सूं जुड़ै।

प्रकाश अमरावत री ई विसय माथै लिखण री सैली में कांई खास बात है?

प्रकाश अमरावत हरैक कहाणी नै नारी पात्रा री दीठ सूं लिखै, जठै वा पात्र केवल पीड़ित नीं बल्कि सोचण-समझण वाळी इंसान रूप में सामनै आवै। उणरी भासा गांवाई राजस्थानी री असली बोली नै पकड़ै, जिको पाठक नै उणै माहोल में लेय जावै। हरैक कहाणी री सैली न्यारी है—कोई भावुक है, कोई प्रतीकात्मक, कोई सीधी-साफ—पण सगळी में एक सन्देस छुप्यो रैवै। उणरो जोर घटनावां माथै कम, भावनावां अर सोच माथै बेसी है, जिको इणनै आम ग्रामीण कहाणियां सूं अलग बणावै।

ई किताब पाठक नै पढ़ लेवण रै बाद कांई देय जावै—भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप सूं?

  • भावनात्मक रूप सूं, थारै मन में नारियां री पीड़ा अर ताकत दोनूं री गैरी समझ बणैगी
  • बौद्धिक रूप सूं, थे समाजिक परम्परावां नै नुवै नजरियै सूं देखणो सीखोगा
  • सांस्कृतिक रूप सूं, राजस्थानी गांवाई जीवन री बारीकियां अर भासा री मिठास थारै साथै रैसी
  • हरैक कहाणी रो सन्देस थारै विचारां में बो़यो रैसी, जिको थनै अपणै आसपास री कुरीतां नै पिछाणण अर सवाल करण माथै मजबूर करैसी

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