Ashadh Ka Akhiri Din
(0)
Author:
Sunil Vikram SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
225
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आषाढ़ का आखिरी दिन कथाकार सुनील विक्रम सिंह का दूसरा कहानी संग्रह है। इस किताब का शीर्षक दिलचस्प है। मोहन राकेश का नाटक है: आषाढ़ का एक दिन और यह है आषाढ़ का आखिरी दिन । इस संग्रह की कहानियाँ प्रेम की सघन अनुभूति की कहानियाँ हैं। इन कहानियों में प्रकृति के रमणीय रूप मिलते हैं। आज जब बहुत-सी कहानियों में कथानक के नाम पर स्पष्टवादिता दिखलाई देती हैं, वहाँ सुनील विक्रम सिंह की कहानियाँ कल्पना का मनोरम संसार रचती हैं। इस संग्रह की कहानियों में पठनीयता है। कहानियों के संवाद मर्मस्पर्शी हैं।
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आषाढ़ का आखिरी दिन कथाकार सुनील विक्रम सिंह का दूसरा कहानी संग्रह है। इस किताब का शीर्षक दिलचस्प है। मोहन राकेश का नाटक है: आषाढ़ का एक दिन और यह है आषाढ़ का आखिरी दिन ।
इस संग्रह की कहानियाँ प्रेम की सघन अनुभूति की कहानियाँ हैं। इन कहानियों में प्रकृति के रमणीय रूप मिलते हैं। आज जब बहुत-सी कहानियों में कथानक के नाम पर स्पष्टवादिता दिखलाई देती हैं, वहाँ सुनील विक्रम सिंह की कहानियाँ कल्पना का मनोरम संसार रचती हैं। इस संग्रह की कहानियों में पठनीयता है। कहानियों के संवाद मर्मस्पर्शी हैं।
Book Details
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ISBN9789383522514
-
Pages112
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सागर यारा की कहानियाँ हमें बीसवीं सदी के उस दौर में ले जाती हैं जब रूमान की हैसियत एक समाजी ताक़त की होती थी। ज़िन्दगी की हक़ीक़तों से वह बराबर की टक्कर लेता था। किताबें पढ़ना, सपने देखना, ख़ुद के दायरे से निकलकर पूरी दुनिया के भविष्य के बारे में सोचना, पैसे की क़ुदरत को चुनौती देना और ज़िन्दगी के इस तरीक़े पर सवाल उठानेवाली रुकावटों से जान पर खेलकर लड़ना उस दौर के रौशन दिमाग़ों की अपनी जीवन-शैली थी, जो आज के संचार-सम्पन्न इकहरे माहौल में दूर की चीज़ लगती है।
लेकिन ऐसा नहीं कि ये आज की कहानियाँ नहीं हैं। वे सवाल, जो इन कहानियों के लिखे जाने की वजह बने, आज भी हमारे सामने हैं। आज भी आख़िरी कहानी के सफ़दर की तरह हर देशी भाषा के लेखक पूछ सकते हैं कि ‘इस मुल्क में हर आदमी, हर पेशेवाला अपना काम कर सकता है, सिर्फ़ लेखक, लेखक नहीं रह सकता। उसे या तो टीचर बनना पड़ता है या क्लर्क या मैकेनिक।’ या फिर मेरे भाईजान की शबनम जो परम्परागत मुस्लिम घर की दीवारों से निकलकर जब दुनिया देखती है तो ज़िन्दगी से वापस प्यार करने लगती है।
सागर सरहदी मूलत: नाटककार थे, उन्होंने अनेक सफल फ़िल्मों के संवाद भी लिखे, इसलिए इन कहानियों की दृश्य और संवाद योजना हमें कहानीपन के एक अलग ही आस्वाद तक ले जाती है। ऊपर से उर्दू अफ़सानानिगारी की रवानी और अपने किरदारों से लेखक की मुहब्बत इन कहानियों को एक खास पाठ बना देता है। इस लिहाज से देखें तो डायलॉग लिखवा लो, बाबूजी की बस निकल गई, रामलीला का राम, हर्षद मेहता का सूटकेस आदि कहानियाँ गहरा और देर तक रहनेवाला असर छोड़ती हैं। सरहदी साहब को सन् ’47 के विभाजन और शरणार्थी जीवन का भी निजी तजुर्बा रहा, इस किताब में उसकी भी कुछ झलकें दिखाई देती हैं, और हिन्दी फ़िल्म-संसार की भी जहाँ उनकी रचनात्मकता के कई पहलू उजागर हुए और जिसके विरोधाभासों को भी उन्होंने जिया-झेला।
Hashiye Ki Zindagi
- Author Name:
Nuzhat Hasan
- Book Type:

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Description:
गत डेढ़ दशक से हाशिए के लोगों की ज़िन्दगी भारतीय साहित्य में केन्द्रीय विषय के रूप में प्रमुखता से रेखांकित हो रही है। पश्चिमी साहित्य में तो ऐसा पहले से ही था। व्यावहारिक तौर पर हाशिया और हाशिए के लोग, मुख्यधारा के पोषक, रक्षक और उसकी मान-मर्यादा-संस्कार-सौष्ठव के संरक्षक होते हैं। मुख्यधारा के लोगों की जीवन-पद्धति के लिए वे बड़े उपयोगी, किन्तु बहुत जल्दी त्याज्य हो जाते हैं। उपयोग और उपेक्षा की यह अवधि इनके लिए इतनी वेदनामयी होती है कि मानवता के ढाँचे की बुनियाद हिल जाती है।
नुज़्हत हसन की सात कहानियों का यह संकलन ‘हाशिए की ज़िन्दगी’ समाज की ऐसी ही विडम्बनाओं का जीवन्त लेखा-जोखा है। हिन्दी में हाशिए के लोगों की ज़िन्दगी पर काफ़ी कुछ लिखा-पढ़ा गया है, बावजूद इसके अपने चिन्तन की ताज़गी के कारण ये कहानियाँ भारतीय पाठकों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। मानवीय संवेदनाओं की नाजुक परतें इन कहानियों में स्तब्ध हो उठती हैं। मृतात्माओं की अर्थी को शीश नवानेवाले इस देश में कोढ़ियों की लाश की क्या दुर्गति होती है, थोपे गए कलंक के कारण हत्या कर दिए गए व्यक्ति की सन्तान समाज में किस अपमान का शिकार होती है, एक जल्लाद के मन में अपनी सन्तान के लिए कैसी हलचल होती है...ये कहानियाँ इन तमाम बातों का जायज़ा विस्तार से लेती हैं। साहित्य में ये विषय अछूते नहीं हैं, पर यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि इन विषयों के आयाम एकदम से अछूते हैं। जिस कौशल और संवेदनाओं के जिस धरातल से इन कहानियों में बात उठाई गई है, वह लेखिका की जीवनदृष्टि और सामाजिक दायित्व का स्पष्ट फलक रेखांकित करता है। मूल अंग्रेज़ी से अनूदित इन कहानियों में हमारे आस-पास बिखरे कथा-सूत्र हमारी ही आँखों में उँगलियाँ डाल रही है।
Kathgodam
- Author Name:
Krishna Kumar
- Book Type:

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Description:
कृष्ण कुमार सिर्फ़ पेशे से नहीं, पैशन से भी शिक्षाशास्त्री हैं और अपने गहरे मानव-बोध के चलते समाजशास्त्री। उनके लेखन में कहीं भी, कभी भी यह नहीं लगता कि यह उन्होंने किसी व्यावसायिक तक़ाज़े पर लिखा है। उनकी चिन्ताओं की वास्तविकता को उनके गद्य की संरचना स्वयं बयान कर देती है।
इस पुस्तक में उनकी कहानियाँ हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि जिस तरह उनका वैचारिक लेखन अपने सरोकारों और चिन्ताओं को स्पष्ट ढंग से रेखांकित करते हुए हमें एक समर्थ गद्य भी उपलब्ध कराता है जिससे हिन्दी के लिक्खाड़ भी कुछ सीख सकते हैं, उसी तरह उनकी ये कहानियाँ कहानी के मौजूदा बाज़ार में एक अलग कोने से किया गया हस्तक्षेप हैं। ये एक समाजशास्त्री द्वारा लिखी हुई कहानियाँ हैं जिनमें वह कहानी विधा के प्रचलित पैमानों से ज़्यादा फ़िक्र इस बात की करता है कि उसके देखे-जाने सुख-दु:ख अपनी पूरी गहराई और फैलाव के साथ भाषा में अंकित हो सकें।
वे अपनी बात को पहुँचाना चाहते हैं, सिर्फ़ 'रच' देना भर उनका उद्देश्य नहीं है, और पहुँचाने की यह इच्छा भी उनकी भाषा की शिराओं में बिंधी मिलती है। वे भाषा को वह पूरा का पूरा दे देना चाहते हैं जो उनकी संवेदना ने अपने परिवेश से पाया, महसूस करने की अपनी क्षमता के चलते जो उन्होंने जाना, और जिसने उन्हें व्यथित किया। और इसके लिए वे भाषा को इतना समर्थ बनाने का प्रयास करते हैं जितनी वह अपने देश और काल की सीमाओं के भीतर हो सकती है। हर बड़ा लेखक यही करता है। वह अभिव्यक्ति के उपलब्ध और प्रचलित भाषिक उपकरणों में अपनी बात कहकर सन्तुष्ट नहीं होता। वह जान रहा होता है कि उसे अपने शब्दों को उस तरह प्रशिक्षित करके बाहर भेजना है कि वे अपनी पूरी बात कहकर ही रहें।
इन कहानियों के विषय विविध हैं। हिन्दी में और भी कहानियाँ इन्हीं विषयों पर या इन जैसे विषयों पर लिखी गई हैं, लिखी जाएँगी, लेकिन जिस तरह कृष्ण कुमार उन्हें लिखते हैं, वह अपनी एक अलग श्रेणी बनाता है।
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