100 Shabdon Ki Kahaniyan

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जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस कहानी-संग्रह में हर कहानी सिर्फ़ सौ शब्दों की है| कहानीकार मुबश्शिर अली ज़ैदी ने उर्दू में सौ शब्दों की कहानी लिखने का सिलसिला आरंभ किया और उसे लोकप्रिय बनाया| इस कहानी-संग्रह में आम ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती हुई सौ से अधिक कहानियाँ हैं जिनमें छुपी हुई संवेदना, तंज़, संदेश और हास्य के तत्व न सिर्फ़ हमारे दिल को छूते हैं बल्कि कई बार हमारा ध्यान उन छोटी-छोटी बारीकियों की ओर ले जाते हैं जो हमारी नज़रों के सामने घटित होकर भी हमें नज़र नहीं आ पातीं|

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ISBN
9789391080259
Pages
170
Avg Reading Time
6 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

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About the Book

जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस कहानी-संग्रह में हर कहानी सिर्फ़ सौ शब्दों की है| कहानीकार मुबश्शिर अली ज़ैदी ने उर्दू में सौ शब्दों की कहानी लिखने का सिलसिला आरंभ किया और उसे लोकप्रिय बनाया| इस कहानी-संग्रह में आम ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती हुई सौ से अधिक कहानियाँ हैं जिनमें छुपी हुई संवेदना, तंज़, संदेश और हास्य के तत्व न सिर्फ़ हमारे दिल को छूते हैं बल्कि कई बार हमारा ध्यान उन छोटी-छोटी बारीकियों की ओर ले जाते हैं जो हमारी नज़रों के सामने घटित होकर भी हमें नज़र नहीं आ पातीं|

Book Details

  • ISBN
    9789391080259
  • Pages
    170
  • Avg Reading Time
    6 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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100 Shabdon Ki Kahaniyan is a discipline masquerading as a collection. Mubashshir Ali Zaidi did not merely write short stories — he invented a form: the exactly 100-word story in Urdu, then carried it into Hindi with surgical precision. Each of the over one hundred pieces here captures a single moment from ordinary Indian life — a gesture at a bus stop, a lie told across a dinner table, a child's misunderstanding — and compresses it until only the emotional truth remains. The constraint is unforgiving: no word can be decorative. What emerges is a gallery of overlooked human exchanges, each flickering with sensitivity, irony, message, or humour. This is not minimalism for style's sake. It is observation sharpened to a point, then released into the reader's memory where it continues to unfold long after the hundred words end.

यह किताब पढ़कर मुझे कैसा अनुभव होगा?

यह किताब आपको झटके में डालती है — हर कहानी एक चुभन छोड़ जाती है। सौ शब्दों में कोई विस्तार नहीं, कोई भूमिका नहीं, सीधे मर्म पर चोट। आप एक कहानी पढ़ेंगे और सोचने लगेंगे कि जो पल आपने खुद जिया है, वह यहाँ कैसे पकड़ा गया। यह पढ़ाई तेज़, चुभती और लगातार चलने वाली है — हर पृष्ठ पर एक नई चोट, एक नई मुस्कान।

यह किताब किसके लिए सबसे उपयुक्त है और पाठक से क्या अपेक्षा रखती है?

  • जो पाठक लंबे वर्णन से ऊब चुके हैं और संक्षिप्तता में गहराई ढूँढ़ते हैं।
  • जो रोज़मर्रा की छोटी घटनाओं में छुपे मानवीय सत्य को पहचानना चाहते हैं।
  • जो उर्दू-हिंदी साहित्य में नए प्रयोगों का सम्मान करते हैं।
  • जो हर शब्द का वज़न समझते हैं और फ़ालतू विवरण से परहेज़ करते हैं।

इस किताब का विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?

आज का भारतीय पाठक तेज़ी, सोशल मीडिया और छोटे संदेशों की दुनिया में जी रहा है। यह किताब उसी भाषा में बात करती है — संक्षिप्त, तीखी, असरदार। लेकिन यह सतही नहीं है। यह उन अदृश्य पलों को साहित्य में लाती है जो हमारे समाज में रोज़ घटते हैं — वर्ग-भेद, रिश्तों की दरारें, छोटी क्रूरताएँ। यह समकालीन भारतीय जीवन का दस्तावेज़ है।

इस विषय पर मुबश्शिर अली ज़ैदी का नज़रिया क्या खास बनाता है?

ज़ैदी ने सौ शब्दों की कहानी का फ़ॉर्म उर्दू में गढ़ा और उसे लोकप्रिय बनाया — यह उनका मौलिक योगदान है। वे हर शब्द को तराशते हैं जैसे कोई जौहरी हीरा तराशे। उनकी दृष्टि में तंज़, संवेदना और हास्य एक साथ घुले हुए हैं। वे साधारण दृश्यों को असाधारण बना देते हैं — बिना नाटकीयता के, सिर्फ़ सटीक शब्द-चयन से।

यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के पास क्या बचता है — भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से?

  • एक नई दृष्टि जो रोज़मर्रा की छोटी घटनाओं में कहानियाँ देखने लगती है।
  • भाषा की मितव्ययिता का सम्मान — हर शब्द की ज़रूरत समझने की क्षमता।
  • उन अदृश्य लोगों के प्रति संवेदनशीलता जो हमारे आसपास हैं पर नज़रअंदाज़ हो जाते हैं।
  • एक बेचैनी कि कितना कुछ हम देखकर भी नहीं देखते।

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