Majm-ul-Bahrain

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Author:

Dara Shikoh

Language:

Hindi

249

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"मज्म-उल-बहरैन" दारा शिकोह की प्रसिद्ध रचना है। दारा ने इस किताब में इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच की कड़ी ढूँढी है। इस पुस्तक में इस्लाम और हिन्दू धर्म के विभिन्न पहलुओं का तुलनात्मक वर्णन किया गया है। दारा शिकोह मुग़ल सम्राट शाहजहाँ का जयेष्ट पुत्र और उसका उत्तराधिकारी था। उसने वेदों,उपनिषदों और भारतीय धार्मिक साहित्य का ज्ञान प्राप्त किया था। जलालुद्दीन रूमी, मौलाना जामी, हकीम सनाई और निज़ामी जैसे महान फ़ारसी सूफ़ी कवियों का उसने गहन अअध्ययन किया था। उसने कई पुस्तकें लिखी हैं। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘मज्म-उल-बहरैन’ है। अब्दुल वासे 1 दिसम्बर 1975 को फ़ातेहान (बिहार) में जन्म। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए. एम.फिल, पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त लगभग तीन वर्षों तक इसी विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक वे तौर पर कार्यरत रहे। दिल्ली से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र, हिंदुस्तान एक्सप्रेस में सहायक संपादक के पद पर कार्यरत रहे। ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी काम किया। उर्दू के अलावा फ़ारसी, हिंदी, अरबी और अंग्रेज़ी भाषाओं का ज्ञान। सम्प्रति उर्दू ज़बान और शाइरी की संस्था रेख़्ता फ़ाउंडेशन में कार्यरत हूँ।

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ISBN
9789394494466
Pages
104
Avg Reading Time
3 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

"मज्म-उल-बहरैन" दारा शिकोह की प्रसिद्ध रचना है। दारा ने इस किताब में इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच की कड़ी ढूँढी है। इस पुस्तक में इस्लाम और हिन्दू धर्म के विभिन्न पहलुओं का तुलनात्मक वर्णन किया गया है। दारा शिकोह मुग़ल सम्राट शाहजहाँ का जयेष्ट पुत्र और उसका उत्तराधिकारी था। उसने वेदों,उपनिषदों और भारतीय धार्मिक साहित्य का ज्ञान प्राप्त किया था। जलालुद्दीन रूमी, मौलाना जामी, हकीम सनाई और निज़ामी जैसे महान फ़ारसी सूफ़ी कवियों का उसने गहन अअध्ययन किया था। उसने कई पुस्तकें लिखी हैं। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘मज्म-उल-बहरैन’ है। अब्दुल वासे 1 दिसम्बर 1975 को फ़ातेहान (बिहार) में जन्म। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए. एम.फिल, पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त लगभग तीन वर्षों तक इसी विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक वे तौर पर कार्यरत रहे। दिल्ली से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र, हिंदुस्तान एक्सप्रेस में सहायक संपादक के पद पर कार्यरत रहे। ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी काम किया। उर्दू के अलावा फ़ारसी, हिंदी, अरबी और अंग्रेज़ी भाषाओं का ज्ञान। सम्प्रति उर्दू ज़बान और शाइरी की संस्था रेख़्ता फ़ाउंडेशन में कार्यरत हूँ।

Book Details

  • ISBN
    9789394494466
  • Pages
    104
  • Avg Reading Time
    3 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Majm-ul-Bahrain (The Confluence of the Two Seas) is Dara Shikoh's radical attempt to prove that Sufi Islam and Hindu Vedanta spring from the same divine source. Written in 1655 by Shah Jahan's eldest son—who studied the Upanishads with Banaras pandits and debated theology with Sufi masters—this work argues that the tawhid of Islam mirrors the advaita of Hinduism. Dara drew on his deep readings of Rumi, Jami, and Nizami alongside Vedic texts to identify parallel concepts: fana and moksha, haqiqat and Brahman. His intellectual project cost him the throne and eventually his life under Aurangzeb, yet Majm-ul-Bahrain remains a foundational text for interfaith dialogue. This Hindi edition brings his vision to readers navigating India's plural spiritual heritage, offering not syncretism but a scholar-prince's evidence that mystical truth transcends communal boundaries.

मज्म-उल-बहरैन पढ़ने से मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?

यह पुस्तक आपको एक शांत, चिंतनशील यात्रा पर ले जाएगी जहाँ दो आध्यात्मिक परंपराएँ एक-दूसरे को प्रतिबिंबित करती हैं। दारा शिकोह की सूफ़ी दृष्टि और वेदांती ज्ञान का संगम पढ़ते हुए आप पाएँगे कि यह बहस नहीं, बल्कि एक खोज है। गहन, धीमी गति से चलने वाली यह रचना उन पाठकों को संतुष्ट करती है जो जल्दबाजी के बजाय अर्थ की परतों को खोलना पसंद करते हैं।

यह किताब किन पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है और इसके लिए किस तरह की तैयारी चाहिए?

  • जो पाठक सूफ़ीवाद और वेदांत के बीच संवाद में रुचि रखते हैं
  • भारत के धार्मिक इतिहास और मुग़ल बौद्धिक परंपरा को समझना चाहते हैं
  • जिन्हें तुलनात्मक धर्मशास्त्र या इंटरफेथ स्टडीज़ में दिलचस्पी है
  • जो धार्मिक पाठों को धैर्य और खुले मन से पढ़ सकते हैं, पूर्व निष्कर्षों के बिना

आज के भारतीय पाठकों के लिए इस पुस्तक का सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व क्या है?

समकालीन भारत में जहाँ धार्मिक पहचान अक्सर विभाजन का कारण बनती है, मज्म-उल-बहरैन एक मुग़ल राजकुमार की साक्ष्य-आधारित दलील प्रस्तुत करती है कि इस्लाम और हिन्दू धर्म आध्यात्मिक सत्य के दो तट हैं। दारा का बौद्धिक साहस—जिसने उसे सिंहासन और जीवन दोनों से वंचित किया—आज के संवाद-निर्माताओं के लिए एक ऐतिहासिक आधार देता है।

दारा शिकोह का इस विषय को संभालने का तरीका अन्य लेखकों से कैसे अलग है?

दारा केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि एक साधक-विद्वान थे जिन्होंने बनारस के पंडितों से संस्कृत सीखी और सूफ़ी मुर्शिदों से तालीम ली। वह सिद्धांतों की तुलना नहीं करते—वह अनुभवों की समानता दिखाते हैं: फ़ना और मोक्ष, हक़ीक़त और ब्रह्म। उनका स्वर न तो रक्षात्मक है, न आक्रामक—यह एक राजकुमार की निजी खोज है जो सत्ता से ज्यादा सत्य को चुनता है।

किताब समाप्त करने के बाद पाठक के पास भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से क्या बचता है?

  • यह विश्वास कि आध्यात्मिक सत्य किसी एक परंपरा की बपौती नहीं है
  • भारत की बहुलतावादी बौद्धिक विरासत पर गर्व
  • धार्मिक पाठों को तुलनात्मक नज़रिए से पढ़ने का साहस
  • दारा शिकोह की त्रासदी की याद—कि ज्ञान राजनीतिक शक्ति से हार सकता है, पर मिट नहीं सकता

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