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Book Details
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ISBN9788194415046
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Pages167
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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अदनान ‘शाम के पृष्ठ पर एक असम्भव की तरफ़’ खुलते कवि हैं। कविता में ऐसी डूब विरल है। समकालीन संकटों के साये में यह कवि सिर्फ़ अपने देस, मुलुक और अपनी ज़बान का नहीं—अचम्भित और दबी-सहमी मनुष्यता का गहन पर्यवेक्षक और उसकी मरम्मत में मुस्तैद कारीगर भी है। अपने सन्ताप और अपनी घुटन को अदनान ने इतना कसा, इतना भुगता, इतना तपाया है कि उसकी निष्पत्ति में ही ऐसी कविता पैदा हो सकती है जिसमें ‘झाड़ियों सी जलती है रात।’ उस्ताद अमीर ख़ान कहते थे कि नग़्मा वही नग़्मा है जिसे रूह सुने और रूह सुनाए। अपने मर्म में संगीत का रुख़ करने वाली अदनान की कविता भी सच्चाई की इस असाधारण कसौटी पर खरा उतरती महसूस होती है। ‘लानत का प्याला’ संग्रह की कविताओं का शीर्षक—क्रम देखो तो वो भी मानो दूर तक खिंची चली आती एक लम्बी कविता है या अलग-अलग कविताओं की लड़ी। प्रेम और उदासियों से रची-बिंधी और नये-नये चक्कर बनाती कविताओं में नागरिक जीवन के तहस-नहस होने का दर्दनाक, ऐतिहासिक सिलसिला इस कदर बेकली और रुंधी हुई ख़ामोशी में दर्ज हुआ है कि पढ़ते हुए एक गहरी टूट, एक तीखी शर्मिंदगी दिल में पैबस्त हुई जाती हैं। उनकी चोटें हमारी याददिहानी हैं। आने वाली पीढ़ियाँ पढ़कर जानेंगी कि उनका कवि सिर्फ़ कविता नहीं कर रहा था। वह प्रकांडता और पांडित्य की धज से फूटने वाला कवि नहीं, सुदूर स्मृति के देहातों से टूटा-निकला एक कवि है जो यातना और दुष्चक्र का एक असाधारण बिंब बना रहा है, जिसे मालूम है प्रचंड आँधियाँ चल रही हैं और नयी गर्जनाएँ उसकी ओर लपकती आ रही हैं, वह कुछ-कुछ ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सॉल्टियूड’ उपन्यास के आत्मनिर्वासित और अकेले, बूढ़े जिप्सी कीमियागर मेल्केदिएस जैसा है जिसे दुनिया के विकट यथार्थों जितना ही यक़ीन अपनी नाज़ुक, अपार कल्पनाओं पर है लेकिन वो अवश्यंभाविता के लिए नहीं मानवीय प्रयत्न और जिजीविषा के लिए खड़ा है। अदनान को यक़ीनन कविता से किसी सर्वकालिक महानता का तोहफ़ा नहीं चाहिए, जो चाहिए वो यहाँ पेश है! —शिवप्रसाद जोशी
Avyakt
- Author Name:
Navin Mishra
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अभिव्यक्ति किसी भी कला को और उसकी ज़्यादातर आपूर्ति उसके स्वयं के परिवेश की परिकल्पना से होती है। जो भी व्यक्ति के साथ होता है, उन सभी अनुभवों को कमोबेश क्रम से प्रस्तुत करता है और वह साहित्य हो जाता है।
कई बार स्वयं को लगता है कि क्या यह सचमुच मैंने लिखा है? एक मोड़ पर आकर वह दैवीय शक्ति से अनुगृहीत हो जाता है। मैंने स्वयं लिखा है कि कविता किसी सुदूर तारागणों के पास से उन्हीं की धूल से अटी धरती तक पहुँचती है, फिर वह मुझमें बस जाती है, कविता मेरी हो जाती है—बस कविता हो जाती है।
मेरा योगदान सिर्फ़ इतना है कि मैंने ईमानदारी से उन क्षणों का, उन सम्बन्धों का चित्रण किया। वही लिखा जो सत्य था, जो पवित्र था और जो लेशमात्र भी कृत्रिम न था।
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