Khidki To Main Ne Khol HI Li

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Author:

Shariq Kaifi

Language:

Hindi

Category:

Poetry

249

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शारिक़ कैफ़ी (सय्यद शारिक़ हुसैन) बरेली (उत्तर प्रदेश) में पहली जून 1961 को पैदा हुए। वहीं बी.एस.सी. और एम.ए. (उर्दू) तक शिक्षा प्राप्त की। उनके पिता कैफ़ी वजदानी (सय्यद रिफ़ाक़त हुसैन) मशहूर शाइ’र थे, इस तरह शाइ’री उन्हें विरासत में हासिल हुई। उनकी ग़ज़लों का पहला मज्मूआ ‘आ’म सा रद्द-ए-अ’मल’ 1989 में छपा। इस के बा’द, 2008 में दूसरा ग़ज़ल-संग्रह ‘यहाँ तक रौशनी आती कहाँ थी’ और 2010 में नज़्मों का मज्मूआ ‘अपने तमाशे का टिकट’ प्रकाशित हुआ। इन दिनों बरेली ही में रहते हैं।

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ISBN
9788194415084
Pages
165
Avg Reading Time
6 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

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About the Book

शारिक़ कैफ़ी (सय्यद शारिक़ हुसैन) बरेली (उत्तर प्रदेश) में पहली जून 1961 को पैदा हुए। वहीं बी.एस.सी. और एम.ए. (उर्दू) तक शिक्षा प्राप्त की। उनके पिता कैफ़ी वजदानी (सय्यद रिफ़ाक़त हुसैन) मशहूर शाइ’र थे, इस तरह शाइ’री उन्हें विरासत में हासिल हुई। उनकी ग़ज़लों का पहला मज्मूआ ‘आ’म सा रद्द-ए-अ’मल’ 1989 में छपा। इस के बा’द, 2008 में दूसरा ग़ज़ल-संग्रह ‘यहाँ तक रौशनी आती कहाँ थी’ और 2010 में नज़्मों का मज्मूआ ‘अपने तमाशे का टिकट’ प्रकाशित हुआ। इन दिनों बरेली ही में रहते हैं।

Book Details

  • ISBN
    9788194415084
  • Pages
    165
  • Avg Reading Time
    6 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Khidki To Main Ne Khol HI Li carries the weight of inheritance and the lightness of defiance. Shariq Kaifi (Syed Shariq Husain), born in Bareilly in 1961, received poetry not as a craft learned but as a legacy passed down from his father, the renowned poet Kaifi Wazdani (Syed Rifaqat Husain). This collection, part of a body of work that began with Aam Sa Radd-e-Amal in 1989, opens quiet windows onto lives lived at the margins of attention — the ordinary gestures that become acts of witness. Kaifi's ghazals do not shout; they murmur with the precision of someone who knows that opening a window is both a small act and a revolution. Educated in Urdu and rooted in Bareilly's literary soil, his voice moves between the inherited idiom of Urdu tradition and the lived realities of contemporary India. This is poetry for readers who listen closely, who value restraint over spectacle, and who understand that the most honest poems are often the quietest.

यह किताब पढ़ते समय मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?

यह संग्रह आपको एक शांत, आत्मीय स्वर में ले जाता है जहाँ रोज़मर्रा की चीज़ें गहरे अर्थ धारण कर लेती हैं। शारिक़ कैफ़ी की ग़ज़लें चिल्लाती नहीं, बल्कि धीरे से कहती हैं — जैसे कोई खिड़की खोलकर रोशनी और हवा को अंदर बुला रहा हो। यह पढ़ाई संयम, ठहराव और बारीक़ निरीक्षण की माँग करती है। हर शे'र एक छोटी सी खिड़की है जो किसी बड़े सच की ओर खुलती है।

यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए क्या चाहिए?

यह संग्रह उन पाठकों के लिए है जो उर्दू ग़ज़ल की परंपरा से परिचित हैं या उसे समझना चाहते हैं, और जो शोर के बजाय संकेतों में बात करने वाली कविता को सराहते हैं। यदि आप बरेली और उत्तर प्रदेश की साहित्यिक विरासत में रुचि रखते हैं, या पारिवारिक काव्य-परंपरा के जीवित रूपों को देखना चाहते हैं, तो यह आपके लिए है। धैर्य और ध्यान से पढ़ने की अपेक्षा रखती है यह किताब।

इस किताब के विषय का आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व क्या है?

यह संग्रह उर्दू शाइ'री की ज़िंदा विरासत को दिखाता है — वह परंपरा जो पिता से बेटे में आगे बढ़ती है, लेकिन हर पीढ़ी अपना स्वर जोड़ती है। आज जब उर्दू साहित्य को अक्सर अतीत की चीज़ समझा जाता है, शारिक़ कैफ़ी जैसे कवि यह साबित करते हैं कि यह आज भी समकालीन भारतीय जीवन की भाषा और संवेदना बन सकती है। यह किताब उस सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है जो हमें जोड़े रखती है।

इस विषय के प्रति लेखक का नज़रिया क्या ख़ास बनाता है?

शारिक़ कैफ़ी की आवाज़ में विरासत और विद्रोह दोनों हैं — वे अपने पिता कैफ़ी वजदानी की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, लेकिन अपनी निजी दृष्टि से। उनकी ग़ज़लें भव्यता की बजाय छोटी-छोटी चीज़ों में सच्चाई खोजती हैं। वे ऊँचे नारों की जगह रोज़मर्रा के इशारों को काव्यात्मक गवाही बनाते हैं, और यही उनकी विशिष्टता है — संयम, सादगी और गहराई का संतुलन।

यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में भावनात्मक या सांस्कृतिक रूप से क्या रह जाता है?

यह संग्रह आपको एक शांत आत्मविश्वास देता है — यह भरोसा कि छोटी चीज़ें भी महत्वपूर्ण होती हैं, कि खिड़की खोलना एक राजनीतिक और व्यक्तिगत कृत्य दोनों हो सकता है। पाठक के पास उर्दू काव्य-परंपरा की समझ और सम्मान बढ़ता है, और यह अहसास रहता है कि कविता ज़रूरी नहीं कि बड़े शब्दों में बोले — कभी-कभी सबसे गहरी बातें सबसे धीमी आवाज़ में कही जाती हैं।

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