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शारिक़ कैफ़ी (सय्यद शारिक़ हुसैन) बरेली (उत्तर प्रदेश) में पहली जून 1961 को पैदा हुए। वहीं बी.एस.सी. और एम.ए. (उर्दू) तक शिक्षा प्राप्त की। उनके पिता कैफ़ी वजदानी (सय्यद रिफ़ाक़त हुसैन) मशहूर शाइ’र थे, इस तरह शाइ’री उन्हें विरासत में हासिल हुई। उनकी ग़ज़लों का पहला मज्मूआ ‘आ’म सा रद्द-ए-अ’मल’ 1989 में छपा। इस के बा’द, 2008 में दूसरा ग़ज़ल-संग्रह ‘यहाँ तक रौशनी आती कहाँ थी’ और 2010 में नज़्मों का मज्मूआ ‘अपने तमाशे का टिकट’ प्रकाशित हुआ। इन दिनों बरेली ही में रहते हैं।
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शारिक़ कैफ़ी (सय्यद शारिक़ हुसैन) बरेली (उत्तर प्रदेश) में पहली जून 1961 को पैदा हुए। वहीं बी.एस.सी. और एम.ए. (उर्दू) तक शिक्षा प्राप्त की। उनके पिता कैफ़ी वजदानी (सय्यद रिफ़ाक़त हुसैन) मशहूर शाइ’र थे, इस तरह शाइ’री उन्हें विरासत में हासिल हुई। उनकी ग़ज़लों का पहला मज्मूआ ‘आ’म सा रद्द-ए-अ’मल’ 1989 में छपा। इस के बा’द, 2008 में दूसरा ग़ज़ल-संग्रह ‘यहाँ तक रौशनी आती कहाँ थी’ और 2010 में नज़्मों का मज्मूआ ‘अपने तमाशे का टिकट’ प्रकाशित हुआ। इन दिनों बरेली ही में रहते हैं।
Book Details
-
ISBN9788194415084
-
Pages165
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ये किताब आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के बेमिसाल शायर शकेब जलाली की ग़ज़लों और नज़्मों का संग्रह है। उनकी शायरी एक मुसलसल सफ़र की तरह है जिसमें कुछ मंज़र ख़ुशनुमा हैं तो कुछ हैरत-कुन और कुछ बे-इन्तिहा अफ़सुर्दा। उनके इज़हार की शैली बेहद अनोखी और नायाब है जिसमें क़ुदरत, रात-दिन, जंगल-सेहरा, बहार-ख़िज़ाँ सहित सारे नुमाइन्दा इस्तियारे जलवा-नुमा नज़र आते हैं। ये किताब उर्दू ग़ज़ल के नौजवान पाठकों को काफ़ी पसन्द आएगी।
Har Mauqe Ke Liye Sher
- Author Name:
Sanjiv Saraf
- Book Type:

- Description:
"हर मौक़े के लिए शेर" उर्दू शाइरी की सदा-बहार खूबसूरती को इस तरह पेश करती है कि वो न सिर्फ़ आसानी से समझ में आए, बल्कि पढ़ने वाला अपनी ज़िंदगी के वाक़िआत को भी इन शेरों के आईने में देख सके। इस संग्रह में ऐसे यादगार शेर शामिल हैं जो इंसानी ज़िंदगी के पूरे दाइरे की तस्वीर पेश करते हैं - चाहे वो हमारे बदलते जज़्बात के विषय में, चाहे ज़िंदगी के ख़ुश-नुमा लम्हों की यादें हो। वो तमाम मौक़े जो हमारी ज़िंदगी को शक्ल देते हैं, इन अशआर में इज़्हार पाते हैं। चाहे मोहब्बत हो या जुदाई, खुशी हो या तड़प, जश्न हो या चिंता - हर एहसास और हर लम्हे के लिए इस संकलन में ऐसा कोई न कोई शेर मौजूद है, जो उलझी से उलझी परिस्थितियों में भी आपके दिल को अपनी बात कहने के लिए सुलझे हुए शब्द मुहय्या करता है। सोच-समझकर चुने और खूबसूरती से पेश किए गए ये शेर पढ़ने, याद कर के दोस्तों को सुनाने और पलट कर फिर से पढ़ने और विचार करने के लिए हैं। "हर मौक़े के लिए शेर" सिर्फ़ उद्धरणों की किताब नहीं बल्कि एक साथी है, जो ज़िंदगी के जज़्बात और लम्हों को को शाइरी की रोशनी से मुनव्वर करती है।
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Book
Khidki To Main Ne Khol HI Li carries the weight of inheritance and the lightness of defiance. Shariq Kaifi (Syed Shariq Husain), born in Bareilly in 1961, received poetry not as a craft learned but as a legacy passed down from his father, the renowned poet Kaifi Wazdani (Syed Rifaqat Husain). This collection, part of a body of work that began with Aam Sa Radd-e-Amal in 1989, opens quiet windows onto lives lived at the margins of attention — the ordinary gestures that become acts of witness. Kaifi's ghazals do not shout; they murmur with the precision of someone who knows that opening a window is both a small act and a revolution. Educated in Urdu and rooted in Bareilly's literary soil, his voice moves between the inherited idiom of Urdu tradition and the lived realities of contemporary India. This is poetry for readers who listen closely, who value restraint over spectacle, and who understand that the most honest poems are often the quietest.
यह किताब पढ़ते समय मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?
यह संग्रह आपको एक शांत, आत्मीय स्वर में ले जाता है जहाँ रोज़मर्रा की चीज़ें गहरे अर्थ धारण कर लेती हैं। शारिक़ कैफ़ी की ग़ज़लें चिल्लाती नहीं, बल्कि धीरे से कहती हैं — जैसे कोई खिड़की खोलकर रोशनी और हवा को अंदर बुला रहा हो। यह पढ़ाई संयम, ठहराव और बारीक़ निरीक्षण की माँग करती है। हर शे'र एक छोटी सी खिड़की है जो किसी बड़े सच की ओर खुलती है।
यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए क्या चाहिए?
यह संग्रह उन पाठकों के लिए है जो उर्दू ग़ज़ल की परंपरा से परिचित हैं या उसे समझना चाहते हैं, और जो शोर के बजाय संकेतों में बात करने वाली कविता को सराहते हैं। यदि आप बरेली और उत्तर प्रदेश की साहित्यिक विरासत में रुचि रखते हैं, या पारिवारिक काव्य-परंपरा के जीवित रूपों को देखना चाहते हैं, तो यह आपके लिए है। धैर्य और ध्यान से पढ़ने की अपेक्षा रखती है यह किताब।
इस किताब के विषय का आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व क्या है?
यह संग्रह उर्दू शाइ'री की ज़िंदा विरासत को दिखाता है — वह परंपरा जो पिता से बेटे में आगे बढ़ती है, लेकिन हर पीढ़ी अपना स्वर जोड़ती है। आज जब उर्दू साहित्य को अक्सर अतीत की चीज़ समझा जाता है, शारिक़ कैफ़ी जैसे कवि यह साबित करते हैं कि यह आज भी समकालीन भारतीय जीवन की भाषा और संवेदना बन सकती है। यह किताब उस सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है जो हमें जोड़े रखती है।
इस विषय के प्रति लेखक का नज़रिया क्या ख़ास बनाता है?
शारिक़ कैफ़ी की आवाज़ में विरासत और विद्रोह दोनों हैं — वे अपने पिता कैफ़ी वजदानी की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, लेकिन अपनी निजी दृष्टि से। उनकी ग़ज़लें भव्यता की बजाय छोटी-छोटी चीज़ों में सच्चाई खोजती हैं। वे ऊँचे नारों की जगह रोज़मर्रा के इशारों को काव्यात्मक गवाही बनाते हैं, और यही उनकी विशिष्टता है — संयम, सादगी और गहराई का संतुलन।
यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में भावनात्मक या सांस्कृतिक रूप से क्या रह जाता है?
यह संग्रह आपको एक शांत आत्मविश्वास देता है — यह भरोसा कि छोटी चीज़ें भी महत्वपूर्ण होती हैं, कि खिड़की खोलना एक राजनीतिक और व्यक्तिगत कृत्य दोनों हो सकता है। पाठक के पास उर्दू काव्य-परंपरा की समझ और सम्मान बढ़ता है, और यह अहसास रहता है कि कविता ज़रूरी नहीं कि बड़े शब्दों में बोले — कभी-कभी सबसे गहरी बातें सबसे धीमी आवाज़ में कही जाती हैं।