Hoshiyari Dil-e-Nadan Bahut Karta Hai

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Author:

Irfan Siddiqi

Language:

Hindi

Category:

Poetry

249

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"होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है" जनाब इरफ़ान सिद्दीक़ी की चुनिन्दा उर्दू ग़ज़लों का संग्रह है जिसे रेख़्ता फाउन्डेशन के "रेख़्ता नुमाइन्दा कलाम" सीरीज़ के तहत शाया किया गया है| इस सीरीज़ के ज़रीए रेख़्ता फाउन्डेशन आज के दौर के नायाब लेकिन कम मशहूर शाइरों का सर्वश्रेष्ठ कलाम आम पाठकों के दरमियान ला रहा है| इरफ़ान सिद्दीक़ी नौ-रवायती शाइरी के अलमबरदार शाइर हैं जिन्होंने अपनी मेधा और मंतिक़ से उर्दू शाइरी को एक नया हुस्न अता किया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी 11 मार्च 1939 को बदायूँ (उत्तर प्रदेश) में पैदा हुए। बदायूँ और बरेली में शिक्षा प्राप्त की और समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रैजुएशन किया। इरफ़ान सिद्दीक़ी का पहला कविता संग्रह ‘कैन्वस’ 1978 में प्रकाशित हुआ जिसके बा’द शब-दर्मियाँ (1984), सात समावात (1992), इ’श्क़-नामा (1997) और हवा-ए-दश्त-ए-मारिया (1998) का प्रकाशन हुआ। उनके दो कुल्लियात (संग्रह) में से ‘दरिया’ 1999 इस्लामाबाद से और ‘शह्र-ए-मलाल’ 2016 में देहली से प्रकाशित हुआ। उनकी अन्य किताबों में ‘अ’वामी तर्सील’ (1977) और ‘राब्ता-ए-आ’म्मा’, (1984) ‘रुत-सिंघार’ (कालिदास के नाटक ऋतु संघारम का उर्दू अनुवाद), मालविका आग्नि मित्रम (कालिदास के नाटक का उर्दू अनुवाद) और ‘रोटी की ख़ातिर’ (अरबी उपन्यास का उर्दू अनुवाद) शामिल हैं। उन्हें उर्दू अकादमी उत्तर प्रदेश और ग़ालिब इंस्टीट्यूट, दिल्ली के सम्मान प्राप्त हुए।

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ISBN
9788194415053
Pages
139
Avg Reading Time
5 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

"होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है" जनाब इरफ़ान सिद्दीक़ी की चुनिन्दा उर्दू ग़ज़लों का संग्रह है जिसे रेख़्ता फाउन्डेशन के "रेख़्ता नुमाइन्दा कलाम" सीरीज़ के तहत शाया किया गया है| इस सीरीज़ के ज़रीए रेख़्ता फाउन्डेशन आज के दौर के नायाब लेकिन कम मशहूर शाइरों का सर्वश्रेष्ठ कलाम आम पाठकों के दरमियान ला रहा है|

इरफ़ान सिद्दीक़ी नौ-रवायती शाइरी के अलमबरदार शाइर हैं जिन्होंने अपनी मेधा और मंतिक़ से उर्दू शाइरी को एक नया हुस्न अता किया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी 11 मार्च 1939 को बदायूँ (उत्तर प्रदेश) में पैदा हुए। बदायूँ और बरेली में शिक्षा प्राप्त की और समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रैजुएशन किया। इरफ़ान सिद्दीक़ी का पहला कविता संग्रह ‘कैन्वस’ 1978 में प्रकाशित हुआ जिसके बा’द शब-दर्मियाँ (1984), सात समावात (1992), इ’श्क़-नामा (1997) और हवा-ए-दश्त-ए-मारिया (1998) का प्रकाशन हुआ। उनके दो कुल्लियात (संग्रह) में से ‘दरिया’ 1999 इस्लामाबाद से और ‘शह्र-ए-मलाल’ 2016 में देहली से प्रकाशित हुआ। उनकी अन्य किताबों में ‘अ’वामी तर्सील’ (1977) और ‘राब्ता-ए-आ’म्मा’, (1984) ‘रुत-सिंघार’ (कालिदास के नाटक ऋतु संघारम का उर्दू अनुवाद), मालविका आग्नि मित्रम (कालिदास के नाटक का उर्दू अनुवाद) और ‘रोटी की ख़ातिर’ (अरबी उपन्यास का उर्दू अनुवाद) शामिल हैं। उन्हें उर्दू अकादमी उत्तर प्रदेश और ग़ालिब इंस्टीट्यूट, दिल्ली के सम्मान प्राप्त हुए।

Book Details

  • ISBN
    9788194415053
  • Pages
    139
  • Avg Reading Time
    5 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Hoshiyari Dil-e-Nadan Bahut Karta Hai presents the curated ghazals of Irfan Siddiqui, a poet who has redefined neo-traditional Urdu verse through intellectual precision and formal restraint. Born on 11 March 1939 in Badayun, Uttar Pradesh, Siddiqui belongs to a generation that inherited the classical idiom yet refused its ornamental excesses. Published under the Rekhta Numainda Kalam series by Rekhta Foundation, this collection foregrounds lesser-known voices whose craft merits wider recognition. Siddiqui's ghazals marry mantiq (logic) with medha (intellect), yielding verses that are formally austere yet emotionally resonant. His treatment of longing, desire, and self-awareness avoids sentimentality, instead tracing the inner negotiations of the dil-e-nadan — the naive heart — with clarity and moral complexity. This is ghazal as argument, not just lament.

यह किताब पढ़ते समय मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?

यह संग्रह आपको भावुकता की जगह बौद्धिक स्पष्टता देगा। इरफ़ान सिद्दीक़ी की ग़ज़लें धीमी गति से खुलती हैं, जहां हर शेर एक तर्क की तरह बनता है। पाठक को ठहरकर सोचने का मौका मिलता है — यह जल्दबाज़ी में पढ़ी जाने वाली शायरी नहीं है। संग्रह ख़त्म होने के बाद आप ख़ुद से सवाल पूछते रह जाएंगे, न कि किसी पात्र से हमदर्दी जताते हुए।

यह किताब किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?

  • वे पाठक जो पारंपरिक उर्दू शायरी की शक्ल और आधुनिक विचार का संगम चाहते हैं।
  • जो लोग ग़ज़ल को केवल रोमांस नहीं, बल्कि आत्म-विवेचन का माध्यम मानते हैं।
  • जो रेख़्ता फाउन्डेशन की पहल से कम-प्रसिद्ध लेकिन गहरे शाइरों को खोजना चाहते हैं।
  • जिन्हें उर्दू की बुनियादी समझ है और वे सादगी में गहराई ढूंढ सकते हैं।

इस किताब का विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?

इरफ़ान सिद्दीक़ी उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जिसने विभाजन के बाद उर्दू को भारत में जीवित रखा। आज जब उर्दू को अक्सर केवल मुशायरों या फ़िल्मी गीतों तक सीमित समझा जाता है, सिद्दीक़ी जैसे शाइर याद दिलाते हैं कि यह भाषा बौद्धिक कठोरता और नैतिक जटिलता की वाहक है। उनका काम समकालीन भारतीय पहचान में उर्दू की निरंतरता को रेखांकित करता है।

इस विषय पर लेखक का नज़रिया क्या ख़ास बनाता है?

इरफ़ान सिद्दीक़ी नौ-रवायती (neo-traditional) शायरी के अलमबरदार हैं — वे परंपरा का सम्मान करते हैं लेकिन उसकी नक़ल नहीं करते। उनकी ग़ज़लें मेधा (intellect) और मंतिक़ (logic) से बुनी गई हैं, जहां हर मिसरा एक तर्क की तरह आगे बढ़ता है। वे अलंकरण से बचते हैं और भावना को विचार में बदल देते हैं, जो उन्हें समकालीन शाइरों में अलग पहचान देता है।

यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या रह जाता है?

  • यह समझ कि ग़ज़ल केवल इश्क़ की नहीं, बल्कि आत्म-परीक्षण की विधा भी है।
  • उर्दू शायरी में बौद्धिक संयम और औपचारिक अनुशासन के प्रति नया सम्मान।
  • अपने भीतर के नादान दिल को पहचानने और उससे संवाद करने की इच्छा।
  • यह विश्वास कि कम-ज्ञात आवाज़ें भी साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ा सकती हैं।

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