Ham zameen pe aasmaan ke phool hain

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Language:

Hindi

Category:

Poetry

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'हम ज़मीं पर आस्माँ के फूल हैं' जनाब विकास शर्मा राज़ का पहला ग़ज़ल-संग्रह है। इनकी शायरी में ग़ज़ल के तख़्लीक़ी वसाइल और बयान के विभिन्न तरीक़ों का ख़ास: माहिरान: इस्तेमाल, ख़ास तौर पर इस्तिआ’र:-साज़ी देखने को मिलती है। साथ ही, किनाए बरतने के अन्दाज़ की इन्फ़िरादियत इनकी शाइ’री की बड़ी ख़ूबी है। इस किताब में ग़ज़ल के मुख़्तलिफ़ मज़ामीन के अनदेखे पहलुओं को नई रचनात्मक स्थितियों और शब्दों में बयान किया गया है।

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ISBN
9789394494046
Pages
123
Avg Reading Time
4 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

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About the Book

'हम ज़मीं पर आस्माँ के फूल हैं' जनाब विकास शर्मा राज़ का पहला ग़ज़ल-संग्रह है। इनकी शायरी में ग़ज़ल के तख़्लीक़ी वसाइल और बयान के विभिन्न तरीक़ों का ख़ास: माहिरान: इस्तेमाल, ख़ास तौर पर इस्तिआ’र:-साज़ी देखने को मिलती है। साथ ही, किनाए बरतने के अन्दाज़ की इन्फ़िरादियत इनकी शाइ’री की बड़ी ख़ूबी है। इस किताब में ग़ज़ल के मुख़्तलिफ़ मज़ामीन के अनदेखे पहलुओं को नई रचनात्मक स्थितियों और शब्दों में बयान किया गया है।

Book Details

  • ISBN
    9789394494046
  • Pages
    123
  • Avg Reading Time
    4 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Ham Zameen Pe Aasmaan Ke Phool Hain marks Vikas Sharma Raaz's arrival as a voice attentive to the architecture of metaphor itself. This debut ghazal collection does not merely rehearse the emotional stations of the genre — it revisits them through oblique expression (kinayah) and layered imagery (istiara-saazi), offering readers familiar themes refracted through uncommon linguistic choices. Where many contemporary ghazal poets lean on inherited imagery, Raaz constructs fresh situations and vocabularies to house old longings, making each couplet feel both rooted and startlingly new.

The collection rewards readers who listen closely to how a single word choice can shift a ghazal's emotional register. Raaz's command over the form's technical possibilities — meter, radif, rhyme — never overshadows the human voice beneath. For those who find pleasure in the gap between what is said and what is meant, this collection offers a sustained exercise in poetic indirection, a reminder that the ghazal's power lies not in declaration but in suggestion.

हम ज़मीं पर आस्माँ के फूल हैं पढ़ते समय किस तरह का अनुभव मिलता है?

यह संग्रह धीमी, चिन्तनशील गति से पढ़ा जाना चाहता है। हर शेर एक रुकावट की माँग करता है — शब्दों के नीचे छुपे अर्थों को सुनने के लिए। किनाए और इस्तिआरे की परतें पहली नज़र में खुलती नहीं; दूसरी-तीसरी बार पढ़ने पर भावनात्मक गहराई उभरती है। यह उन पाठकों को संतोष देगा जो अप्रत्यक्ष अभिव्यक्ति में सुन्दरता खोजते हैं, जो शब्द और अर्थ के बीच के अंतराल में रस लेते हैं।

यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे समझने के लिए क्या ज़रूरी है?

  • जो पाठक उर्दू-हिन्दी शायरी की बुनियादी शब्दावली और ग़ज़ल के तकनीकी तत्वों से परिचित हैं
  • जिन्हें रूपक-निर्माण और अप्रत्यक्ष बयान (किनाया) की बारीकियों में रुचि है
  • जो समकालीन ग़ज़ल में नए भाषाई प्रयोगों की तलाश में हैं
  • जो धैर्यपूर्वक पढ़ सकें और एक शेर को कई कोणों से देखने के लिए तैयार हों

इस संग्रह के विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रूप से क्यों प्रासंगिक हैं?

ग़ज़ल आज भी उत्तर भारत की सांस्कृतिक स्मृति में जीवित विधा है — संगीत, फ़िल्म, मुशायरों में। लेकिन समकालीन समाज में पुरानी भावनाओं को नए शब्दों में कैसे कहा जाए, यह चुनौती है। राज़ यह दिखाते हैं कि परम्परागत विषयों — प्रेम, अलगाव, आत्म-चिन्तन — को नए सन्दर्भों और शब्द-स्थितियों में पुनर्जीवित किया जा सकता है, जिससे ग़ज़ल आज की संवेदना के लिए प्रासंगिक बनी रहे।

इस विषय पर विकास शर्मा राज़ का व्यवहार अन्य शायरों से किस तरह अलग है?

राज़ की विशिष्टता उनकी किनाया-बरतने की इन्फ़िरादियत और इस्तिआरा-साज़ी में है — वे सीधे कहने के बजाय घुमावदार, संकेतात्मक भाषा से काम करते हैं। जहाँ कई समकालीन शायर परम्परागत बिम्ब दोहराते हैं, राज़ हर मज़मून को नई रचनात्मक स्थिति और शब्दावली में ढालते हैं। यह दृष्टिकोण उनकी शायरी को तकनीकी रूप से समृद्ध और भावनात्मक रूप से सूक्ष्म बनाता है।

यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या रह जाता है — भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से?

  • भाषा के प्रति एक नई संवेदनशीलता — कैसे एक शब्द की जगह बदलना पूरे भाव को बदल देती है
  • ग़ज़ल की तकनीकी सम्भावनाओं की गहरी समझ — मीटर, रदीफ़, क़ाफ़िया का जीवन्त प्रयोग
  • यह विश्वास कि परम्परागत विधा में नवीनता सम्भव है, बिना मूल रूप को तोड़े
  • अप्रत्यक्ष अभिव्यक्ति की शक्ति का अनुभव — जो कहा नहीं गया, वही सबसे गहरा असर छोड़ता है

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