Ek Diya Aur Ek Phool
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इ'शरत आफ़्रीन का जन्म 25 दिसम्बर, 1956 को कराची, पाकिस्तान में हुआ। कम-उ’म्री में ही अपना साहित्यिक सफ़र शुरू' करने वाली इ'शरत आफ़्रीन की रचनाएँ महज़ 14 साल की उ'म्र से प्रकाशित होने लगी थीं। उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी से उर्दू भाषा में एम. ए. की डिग्री हासिल की। इ'शरत आफ़्रीन अपनी रचनाओं के ज़रीए' औ'रतों के हक़ में अपनी आवाज़ बुलन्द करने के लिए जानी जाती हैं। अब तक उनकी रचनाओं के तीन संग्रह “कुन्ज पीले फूलों का”, “धूप अपने हिस्से की” और “दिया जलाती शाम” प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी शाइ'री का चौथा संग्रह “परिन्दे चहचहाते हैं” भी जल्द ही आने वाला है। उनकी रचनाएँ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की अधिकतर पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। इन दिनों टेक्सास यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग से जुड़ी हुई हैं और अमेरिका में ही रहती हैं। उर्दू अदब की ख़िदमत के लिए उन्हें कई अदबी अवार्ड्स से नवाज़ा जा चुका है।
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इ'शरत आफ़्रीन का जन्म 25 दिसम्बर, 1956 को कराची, पाकिस्तान में हुआ। कम-उ’म्री में ही अपना साहित्यिक सफ़र शुरू' करने वाली इ'शरत आफ़्रीन की रचनाएँ महज़ 14 साल की उ'म्र से प्रकाशित होने लगी थीं। उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी से उर्दू भाषा में एम. ए. की डिग्री हासिल की। इ'शरत आफ़्रीन अपनी रचनाओं के ज़रीए' औ'रतों के हक़ में अपनी आवाज़ बुलन्द करने के लिए जानी जाती हैं। अब तक उनकी रचनाओं के तीन संग्रह “कुन्ज पीले फूलों का”, “धूप अपने हिस्से की” और “दिया जलाती शाम” प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी शाइ'री का चौथा संग्रह “परिन्दे चहचहाते हैं” भी जल्द ही आने वाला है। उनकी रचनाएँ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की अधिकतर पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। इन दिनों टेक्सास यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग से जुड़ी हुई हैं और अमेरिका में ही रहती हैं। उर्दू अदब की ख़िदमत के लिए उन्हें कई अदबी अवार्ड्स से नवाज़ा जा चुका है।
Book Details
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ISBN9789391080723
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Pages164
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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कविता में यथार्थ को देखने-पहचानने का वीरेन डंगवाल का तरीक़ा अलग, अनूठा और बुनियादी क़िस्म का रहा है। उनकी कविता ने समाज के साधारण जनों और हाशियों पर स्थित जीवन के जो विलक्षण ब्योरे और दृश्य हमें दिए हैं, वे सबसे अधिक बेचैन करनेवाले हैं। कविता की मार्फ़त वीरेन ने ऐसी बहुत-सी चीज़ों और उपस्थितियों के संसार का विमर्श निर्मित किया जो प्राय: अनदेखी थीं। इस कविता में जनवादी परिवर्तन की मूल प्रतिज्ञा थी और उसकी बुनावट में ठेठ देसी क़िस्म के ख़ास और आम अनुभवों की संश्लिष्टता थी। सन् 1991 में प्रकाशित उनके पहले कविता-संग्रह ‘इसी दुनिया में’ से ही ये बातें बिलकुल स्पष्ट हो गई थीं। वीरेन की विलक्षण काव्य-दृष्टि पर्जन्य, वन्या, वरुण, द्यौस जैसे वैदिक प्रतीकों और ऊँट, हाथी, गाय, मक्खी, समोसे, पपीते, इमली जैसी अति लौकिक वस्तुओं की एक साथ शिनाख़्त करती हुई अपने समय में एक ज़रूरी हस्तक्षेप करती है ।
वीरेन डंगवाल का यह कविता-संग्रह–‘दुश्चक्र में स्रष्टा’–जैसे अपने विलक्षण नाम के साथ हमें उस दुनिया में ले जाता है जो इन वर्षों में और भी जटिल, और भी कठिन हो चुकी है और जिसके अर्थ और भी बेचैन करनेवाले बने हैं। विडम्बना, व्यंग्य, प्रहसन और एक मानवीय एब्सर्डिटी का अहसास वीरेन की कविता के कारगर तत्त्व रहे हैं। इन कविताओं में इन काव्य-युक्तियों का ऐसा विस्तार है जो घर और बाहर, निजी और सार्वजनिक, आन्तरिक और बाह्य को एक साथ समेटता हुआ ज़्यादा बुनियादी काव्यार्थों को सम्भव करता है। विचित्र, अटपटी, अशक्त, दबी-कुचली और कुजात कही जानेवाली चीज़ें यहाँ परस्पर संयोजित होकर शक्ति, सत्ता और कुलीनता से एक अनायास बहस छेड़े रहती हैं और हम पाते हैं कि छोटी चीज़ों में कितना बड़ा संघर्ष और कितना बड़ा सौन्दर्य छिपा हुआ है।
Hare Ko Harinaam
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
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‘केवल कवि ही कविता नहीं रचता, कविता भी बदले में कवि की रचना करती है' जैसी अनुभूति को आत्मसात् करनेवाले दिनकर की विचारप्रधान कविताओं का संकलन है 'हारे को हरिनाम', जिसमें उनके जीवन के उत्तरार्द्ध की दार्शनिक मानसिकता के दर्शन होते हैं। इसमें परम सत्ता के प्रति छलहीन समर्पण की आकुलता से भरी ऐसी कविताओं की अभिव्यक्ति हुई है जिनमें मनुष्य मन की विराटता है। हम कह सकते हैं कि ओज और आक्रोश से भरी राष्ट्रीय कविताओं के सर्जक दिनकर की भक्ति-भावनाओं से विह्वल रचनाओं का यह संग्रह संवेदना और आस्था के विरल आयामों से जोड़ने का एक सफल उपक्रम है। और संग्रह का नाम ‘हारे को हरिनाम’ से कुछ मित्रों के चौंकने पर सच स्वीकार करने की साहस-भरी वह मनुष्यता भी, जिसे राष्ट्रकवि दिनकर अपने इन शब्दों में व्यक्त करते हैं–“...किन्तु पराजित मनुष्य और किसका नाम ले? मैंने अपने आपको क्षमा कर दिया है। बन्धु, तुम भी मुझे क्षमा करो। मुमकिन है, वह ताज़गी हो। जिसे तुम थकान मानते हो। ईश्वर की इच्छा को न मैं जानता हूँ, न तुम जानते हो।”
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