Dil Parinda Hai
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मौजूदा दौर के बेहद लोकप्रिय शायर और नग़मा-निगार शकील आज़मी का जन्म 1971 में, आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश में हुआ। वो 1980 के बाद उभरने वाली जदीद शायरों की पीढ़ी के एक प्रमुख शायर हैं। उनकी शायरी में विषयों की विविधता और नज़्म और ग़ज़ल के रंग-रूप में नए बदलाव देखने को मिलते हैं। उनकी अब तक 11 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें: धूप दरिया (1996) ऐश ट्रे (2000) रास्ता बुलाता है (2005) ख़िज़ाँ का मौसम रुका हुआ है (2010) मिट्टी में आसमान (2012) पोखर में सिंघाड़े (2014) बनवास (2020) आग से बिछड़ा धुआँ (2023) चाँद की दस्तक (हिन्दी - 2015) परों को खोल (हिन्दी - 2017) बनवास (हिन्दी - 2023) शामिल हैं। शकील आज़मी हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में अपने योगदान के लिए भी जाने जाते हैं। वो फ़िल्मों के लिए गीत-लेखन में लगभग दो दशक से सक्रिय हैं और ‘भीड़’ ‘अनेक’ ‘कौन प्रवीण ताम्बे’ और ‘मुल्क’ सहित कितनी ही फ़िल्मों और वेब-सीरीज़ के लिए गीत लिख चुके हैं। वो कैफ़ी आज़मी पुरस्कार, गुजरात गौरव पुरस्कार, गुजरात उर्दू साहित्य अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, बिहार उर्दू अकादमी पुरस्कार और महाराष्ट्र उर्दू साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई साहित्यिक पुरस्कारों से नवाज़े जा चुके हैं। इसके अलावा उन्हें एस.डब्ल्यू.ए. पुरस्कार (2022) झारखंड नेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल जूरी पुरस्कार (2022) और FOIOA पुरस्कार (2021) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का सम्मान भी मिल चुका है।
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मौजूदा दौर के बेहद लोकप्रिय शायर और नग़मा-निगार शकील आज़मी का जन्म 1971 में, आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश में हुआ। वो 1980 के बाद उभरने वाली जदीद शायरों की पीढ़ी के एक प्रमुख शायर हैं। उनकी शायरी में विषयों की विविधता और नज़्म और ग़ज़ल के रंग-रूप में नए बदलाव देखने को मिलते हैं। उनकी अब तक 11 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें: धूप दरिया (1996) ऐश ट्रे (2000) रास्ता बुलाता है (2005) ख़िज़ाँ का मौसम रुका हुआ है (2010) मिट्टी में आसमान (2012) पोखर में सिंघाड़े (2014) बनवास (2020) आग से बिछड़ा धुआँ (2023) चाँद की दस्तक (हिन्दी - 2015) परों को खोल (हिन्दी - 2017) बनवास (हिन्दी - 2023) शामिल हैं। शकील आज़मी हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में अपने योगदान के लिए भी जाने जाते हैं। वो फ़िल्मों के लिए गीत-लेखन में लगभग दो दशक से सक्रिय हैं और ‘भीड़’ ‘अनेक’ ‘कौन प्रवीण ताम्बे’ और ‘मुल्क’ सहित कितनी ही फ़िल्मों और वेब-सीरीज़ के लिए गीत लिख चुके हैं। वो कैफ़ी आज़मी पुरस्कार, गुजरात गौरव पुरस्कार, गुजरात उर्दू साहित्य अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, बिहार उर्दू अकादमी पुरस्कार और महाराष्ट्र उर्दू साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई साहित्यिक पुरस्कारों से नवाज़े जा चुके हैं। इसके अलावा उन्हें एस.डब्ल्यू.ए. पुरस्कार (2022) झारखंड नेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल जूरी पुरस्कार (2022) और FOIOA पुरस्कार (2021) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का सम्मान भी मिल चुका है।
Book Details
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ISBN9789394494633
-
Pages148
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘पहाड़ पर लालटेन’ और ‘घर का रास्ता’ के बाद मंगलेश डबराल के तीसरे कविता–संग्रह ‘हम जो देखते हैं’ का पहला संस्करण 1995 में प्रकाशित हुआ था। इन वर्षों में इस संग्रह के कई संस्करणों का प्रकाशित होना इसका साक्ष्य है कि बाज़ार, उपभोगवाद, भूमंडलीकरण और साम्राज्यवादी पूँजी की बजबजाती दुनिया के बावजूद समाज में कविता के व्यापक और संवेदनशील कोने बचे हुए हैं और उसके सच्चे पाठक भी। यह संग्रह इस कठिन समय में भी ऐसी कविता को सम्भव करता है जो विभिन्न ताक़तों के ज़रिए भ्रष्ट की जा रही संवेदना और निरर्थक बनती भाषा में एक मानवीय हस्तक्षेप कर सके। ये कविताएँ उन अनेक चीज़ों की आहटों से भरी हैं जो हमारी क्रूर व्यवस्था में या तो खो गई हैं या लगातार क्षरित और नष्ट हो रही हैं। वे उन खोई हुई चीज़ों को ‘देख’ लेती हैं, उनके संसार तक पहुँच जाती हैं और इस तरह एक साथ हमारे बचे–खुचे वर्तमान जीवन के अभावों और उन अभावों को पैदा करनेवाले तंत्र की भी पहचान करती हैं। अपने समय, समाज, परिवार और ख़ुद अपने आपसे एक नैतिक साक्षात्कार इन कविताओं का एक मुख्य वक्तव्य है।
‘हम जो देखते हैं’ में कई ऐसी कविताएँ भी हैं जो चीज़ों, स्थितियों और कहीं–कहीं अमूर्तनों के सादे वर्णन की तरह दिखती हैं और जिनकी संरचना गद्यात्मक है। किसी नए प्रयोग का दावा किए बग़ैर ये कविताएँ अनुभव की एक नई प्रक्रिया और बुनावट को प्रकट करती हैं, जहाँ अनेक बार विवरण ही सार्थक वक्तव्य में बदल जाते हैं। लेकिन गद्य का सहारा लेती ये कविताएँ ‘गद्य कविताएँ’ नहीं हैं। इस संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ एक गहरी चिन्ता और यहाँ तक कि नाउम्मीदी भी जताती लगती हैं, लेकिन शायद यह ज़रूरी चिन्ता है जो हमारे वक़्त में विवेक और उम्मीद तक पहुँचने का एकमात्र ज़रिया रह गया है। इनकी रचना–सामग्री हमारी साधारण, तात्कालिक, दैनंदिन और परिचित दुनिया से ली गई है, लेकिन कविता में वह अपनी बुनियादी शक़्ल को बनाए रखकर कई असाधारण और अपरिचित अर्थ–स्वरों की ओर चली जाती है। विडम्बना, करुणा और विनम्र शिल्प मंगलेश डबराल की कविता की परिचित विशेषताएँ रही हैं और इस संग्रह में वे अधिक परिपक्व होकर अभिव्यक्त हुई हैं। यह ऐसी विनम्रता है, जो गहरे नैतिक आशयों से उपजी है और जिसमें आक्रामकता के मुक़ाबले कहीं अधिक बेचैन करने की क्षमता है।
Aap Ke Laaye Hue Din
- Author Name:
Vijay Bahadur Singh
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विजय बहादुर सिंह आधुनिक हिंदी के विकास में अपनी सृजनात्मक आलोचना से उल्लेखनीय योगदान देने वाले लेखकों में विजय बहादुर सिंह का नाम अग्रगण्य है। नियमित लेखन के साथ विजय बहादुर सिंह दीर्घ अवधि से शोध और अध्यापन कार्य से भी जुड़े रहे हैं। लेकिन मुख्यतः एक साहित्यालोचक के रूप में विख्यात विजय बहादुर सिंह ने आधुनिक हिंदी कविता और कवियों की सृजनात्मक उपलब्धियों के साथ-साथ हिंदी कथा और उपन्यास साहित्य पर भी अपनी आलोचना प्रस्तुत की है। ‘आलोचक का स्वदेश’ उनके द्वारा रचित चर्चित साहित्यिक जीवनी है। रचनाएँ डॉ. सिंह ने आठ खंडों में ‘भवानी प्रसाद मिश्र रचनावली’, चार खंडों में ‘दुष्यंत कुमार रचनावली’ और आठ खंडों में ‘नंददुलारे वाजपेयी रचनावली’ का निर्दोष और चर्चित संपादन किया। उन्होंने ‘आलोचक का स्वदेश’ नाम से नंददुलारे वाजपेयी की साहित्यिक जीवनी भी लिखी। ‘वृहत्त्रयी’, ‘नागार्जुन का रचना संसार’, ‘कविता और संवेदना’, ‘उपन्यास : समय और संवेदना’, ‘महादेवी के काव्य का नेपथ्य’ आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ हैं। उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं- ‘मौसम की चिट्ठी’, ‘पृथ्वी का प्रेमगीत’, ‘पतझर की बाँसुरी’, ‘भीमबैठका’। पुरस्कार व सम्मान विजय बहादुर सिंह को उनके कृतित्व तथा सृजनात्मक अवदान के लिए ‘रामविलास शर्मा सम्मान’, ‘लोक सम्मान’, ‘श्रेष्ठ कला आचार्य और कौमी एकता सम्मान’, केंद्रीय हिंदी संस्थान के ‘सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार’ तथा मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के ‘भवभूति अलंकरण’ से सम्मानित किया जा चुका है।
Pratinidhi Kavitayen : Manglesh Dabral
- Author Name:
Mangalesh Dabral
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आलोकधन्वा कहते हैं कि ‘मंगलेश फूल की तरह नाज़ुक और पवित्र हैं।’ निश्चय ही स्वभाव की सचाई, कोमलता, संजीदगी, निस्पृहता और युयुत्सा उन्हें अपनी जड़ों से हासिल हुई है, पर इन मूल्यों को उन्होंने अपनी प्रतिश्रुति से अक्षुण्ण रखा है।
मंगलेश डबराल की काव्यानुभूति की बनावट में उनके स्वभाव की केन्द्रीय भूमिका है। उनके अन्दाज़े-बयाँ में संकोच, मर्यादा और करुणा की एक लर्ज़िश है। एक आक्रामक, वाचाल और लालची समय में उन्होंने सफलता नहीं, सार्थकता को स्पृहणीय माना है और जब उनका मन्तव्य यह हो कि मनुष्य होना सबसे बड़ी सार्थकता है, तो ऐसा नहीं कि यह कोई आसान मकसद है, बल्कि सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि यह आसानी कितनी दुश्वार है।
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