Bihar ki Qawwaliyan

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Author:

Raiyan Abulolai

Language:

Hindi

Category:

Poetry

349

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बिहार में क़व्वाली की एक समृद्ध परंपरा रही है। यहाँ की ख़ानक़ाहों ने जहाँ विश्व को शान्ति और सद्भावना का सन्देश दिया है, वहीं यहाँ के क़व्वालों ने इन सूफ़ी संदेशों को अपना स्वर दिया है। बिहार के सूफ़ी-संतों पर बहुत कुछ लिखा गया है, परन्तु यहाँ की समृद्ध क़व्वाली परम्परा को सहेजने का ये पहला प्रयास है। "बिहार की क़व्वालियाँ" नामी इस किताब में बिहार की ख़ानक़ाहों में पढ़ने वाले क़व्वालों के रोचक किस्सों के साथ-साथ, उनके द्वारा पढ़े जाने वाले कलाम को भी शामिल किया गया है। 18 जून 1997 में ख़ानक़ाह सज्जादीया अबुलउलाईया, दानापुर (पटना) में जन्मे रय्यान अबुलउलाई, प्रसिद्ध सूफ़ी शाइर हज़रत शाह अकबर दानापूरी की वंश परंपरा से आते हैं। रय्यान अबुलउलाई एक गंभीर अध्येता है और उनके सैकड़ों आलेख सूफ़ीवाद, सूफ़ी परंपरा के विषय पर छप चुके हैं। वर्तमान में वे रेख़्ता फ़ाउंडेशन के उपक्रम सूफ़ीनामा से संबद्ध हैं।

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ISBN
9789394494435
Pages
211
Avg Reading Time
7 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

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About the Book

बिहार में क़व्वाली की एक समृद्ध परंपरा रही है। यहाँ की ख़ानक़ाहों ने जहाँ विश्व को शान्ति और सद्भावना का सन्देश दिया है, वहीं यहाँ के क़व्वालों ने इन सूफ़ी संदेशों को अपना स्वर दिया है। बिहार के सूफ़ी-संतों पर बहुत कुछ लिखा गया है, परन्तु यहाँ की समृद्ध क़व्वाली परम्परा को सहेजने का ये पहला प्रयास है। "बिहार की क़व्वालियाँ" नामी इस किताब में बिहार की ख़ानक़ाहों में पढ़ने वाले क़व्वालों के रोचक किस्सों के साथ-साथ, उनके द्वारा पढ़े जाने वाले कलाम को भी शामिल किया गया है। 18 जून 1997 में ख़ानक़ाह सज्जादीया अबुलउलाईया, दानापुर (पटना) में जन्मे रय्यान अबुलउलाई, प्रसिद्ध सूफ़ी शाइर हज़रत शाह अकबर दानापूरी की वंश परंपरा से आते हैं। रय्यान अबुलउलाई एक गंभीर अध्येता है और उनके सैकड़ों आलेख सूफ़ीवाद, सूफ़ी परंपरा के विषय पर छप चुके हैं। वर्तमान में वे रेख़्ता फ़ाउंडेशन के उपक्रम सूफ़ीनामा से संबद्ध हैं।

Book Details

  • ISBN
    9789394494435
  • Pages
    211
  • Avg Reading Time
    7 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Bihar ki Qawwaliyan is the first book to document a musical and spiritual tradition that has lived for centuries in Bihar's khanqahs but never before appeared in print. While Bihar's Sufi saints have been written about extensively, the qawwals who gave voice to their messages—singing kalams of peace and devotion—remained undocumented until now. This anthology pairs the stories of these qawwals with the texts of the kalams they performed, preserving a heritage shaped by oral transmission and devotional gatherings. It is not a history of Sufism in Bihar, but a record of the voices that carried it forward—names, anecdotes, and verses that would otherwise have faded. For readers interested in regional devotional music, Sufi literary culture, or the intersection of faith and performance in North India, this book opens a rare window into a tradition that has shaped Bihar's cultural landscape for generations.

यह किताब पढ़कर मुझे कैसा अनुभव होगा?

यह किताब एक संग्रहालय की यात्रा जैसी है जहाँ हर पन्ना एक क़व्वाल की आवाज़, एक ख़ानक़ाह का माहौल, और एक कलाम की गूँज सुनाता है। यह कविता संग्रह नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ है जो आपको बिहार की सूफ़ी परम्परा के भीतर ले जाता है। पढ़ने का अनुभव शांत, चिंतनशील और भावनात्मक रूप से समृद्ध है—जैसे किसी महफ़िल में बैठकर सुनना।

यह किताब किन पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए क्या अपेक्षा रखनी चाहिए?

  • सूफ़ी संगीत और भक्ति परंपराओं में रुचि रखने वाले पाठक
  • बिहार की सांस्कृतिक विरासत को समझने की इच्छा रखने वाले
  • मौखिक परंपराओं और लोक-साहित्य के अध्येता
  • धार्मिक सद्भाव और सूफ़ीवाद के प्रति जिज्ञासु मन

इस किताब का विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?

जब सांप्रदायिक विभाजन की चर्चा बढ़ रही है, तब यह किताब बिहार की उस परंपरा को सामने लाती है जहाँ ख़ानक़ाहों ने शान्ति और सद्भाव का संदेश दिया। यह दस्तावेज़ दिखाता है कि भारतीय संस्कृति में धार्मिक सहिष्णुता और साझा भक्ति की जड़ें कितनी गहरी हैं। यह एक लुप्त होती मौखिक परंपरा को बचाने का प्रयास भी है।

इस लेखक का इस विषय पर दृष्टिकोण क्या खास बनाता है?

यह पहली बार है कि बिहार की क़व्वाली परंपरा को संकलित किया गया है—संतों पर नहीं, बल्कि उन क़व्वालों पर जिन्होंने उन्हें आवाज़ दी। लेखक ने केवल कलाम ही नहीं, बल्कि क़व्वालों के रोचक किस्से भी शामिल किए हैं, जो इस किताब को एक जीवंत सांस्कृतिक अभिलेख बनाते हैं। यह दृष्टिकोण साहित्य और संगीत को एक साथ सहेजता है।

यह किताब पढ़कर पाठक के मन में क्या रह जाता है—भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से?

  • बिहार की सूफ़ी परंपरा की गहराई और विविधता का बोध
  • मौखिक विरासतों को संरक्षित करने की ज़रूरत की समझ
  • धार्मिक सद्भाव और साझा संस्कृति के प्रति सम्मान
  • एक लुप्त होती कला को जानने की संतुष्टि

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