Bekud Kiye Dete Hain

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Language:

Hindi

Category:

Poetry

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ये किताब हिन्दुस्तान की सूफ़ी परम्परा की प्रमुख आवाज़ों को सामने लाने की एक कोशिश है। इस किताब में मशहूर शाइर बेदम शाह वारसी की ग़ज़लों, फ़ारसी कलाम, मंक़बत, हम्द, नात, सलाम, मुनाजात, रुबाइयात, क़तआत और पूरबी कलाम का संग्रह है। इस किताब का संकलन एवं सम्पादन सुमन मिश्र ने किया है।

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ISBN
9789394494145
Pages
156
Avg Reading Time
5 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

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About the Book

ये किताब हिन्दुस्तान की सूफ़ी परम्परा की प्रमुख आवाज़ों को सामने लाने की एक कोशिश है। इस किताब में मशहूर शाइर बेदम शाह वारसी की ग़ज़लों, फ़ारसी कलाम, मंक़बत, हम्द, नात, सलाम, मुनाजात, रुबाइयात, क़तआत और पूरबी कलाम का संग्रह है। इस किताब का संकलन एवं सम्पादन सुमन मिश्र ने किया है।

Book Details

  • ISBN
    9789394494145
  • Pages
    156
  • Avg Reading Time
    5 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Bekud Kiye Dete Hain preserves the lyrical legacy of Bedam Shah Warsi, a towering Sufi poet rooted in Varanasi's syncretic spiritual landscape. This collection brings together his ghazals, Persian compositions, manqabat, hamd, naat, salam, munajaat, rubaiyat, qata'at, and Purbi kalam—genres that span devotional longing, mystical inquiry, and vernacular expression. Edited by Suman Mishra, the volume situates Warsi within India's broader Sufi literary tradition, a lineage often marginalised in mainstream literary discourse. The Purbi compositions reflect the poet's embeddedness in eastern Uttar Pradesh's folk idiom, blending high Urdu aesthetics with regional musicality. For readers seeking insight into how Sufi thought articulated itself across linguistic registers—from Persian courtly refinement to Bhojpuri earthiness—this anthology offers rare access to a voice that bridged mystical devotion and everyday speech. Warsi's work embodies the lived reality of Indian Islam's plural, poetic inheritance.

बेकुद किये देते हैं पढ़ने से मुझे कैसा अनुभव मिलेगा?

यह किताब आपको सूफ़ी शायरी की गहराई और आध्यात्मिक तन्मयता में ले जाती है। बेदम शाह वारसी का कलाम भक्ति, इश्क़े-इलाही और मुनाजात की विविध रंगतों से भरा है। फ़ारसी, उर्दू और पूरबी भाषा के मिश्रण में लिखी ग़ज़लें और रुबाइयात आपको ठहराव और सुकून देती हैं। यह पाठ अनुभव धीमा, चिन्तनशील और भावनात्मक रूप से समृद्ध है—जल्दबाज़ी में पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि ठहरकर महसूस करने के लिए।

यह किताब किन पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?

  • सूफ़ी साहित्य और भक्ति परम्परा में रुचि रखने वाले पाठक
  • ग़ज़ल, नात, हम्द और मंक़बत जैसी शायरी विधाओं को समझने के इच्छुक
  • वाराणसी और पूर्वी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत से परिचित होने की चाह रखने वाले
  • उर्दू-फ़ारसी काव्य परम्परा और लोक भाषा के संगम को सराहने वाले साहित्य प्रेमी

इस किताब का विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत की सूफ़ी परम्परा साम्प्रदायिक सद्भाव, बहुलवाद और आध्यात्मिक समावेश का प्रतीक रही है। आज जब पहचान और धर्म को लेकर विभाजन बढ़ रहा है, बेदम शाह वारसी जैसी आवाज़ें हमें याद दिलाती हैं कि हिन्दुस्तानी संस्कृति में इस्लाम, हिन्दू भक्ति और लोक परम्पराएँ एक-दूसरे में गुँथी हुई हैं। यह संग्रह उस जीवंत साझा विरासत को पुनर्जीवित करता है जो मुख्यधारा के साहित्यिक इतिहास में अक्सर उपेक्षित रह जाती है।

बेदम शाह वारसी का इस विषय पर दृष्टिकोण क्या विशिष्ट बनाता है?

वारसी ने फ़ारसी की शास्त्रीय परिष्कृति और पूरबी लोक भाषा के सहज संगीत को एक साथ बुना। उनकी शायरी में दरबारी उर्दू का लालित्य और भोजपुरी की ज़मीनी ताज़गी दोनों मिलती हैं। यह द्विभाषी लचीलापन उन्हें अन्य सूफ़ी शायरों से अलग करता है—वे सिर्फ़ रहस्यवाद के विद्वान नहीं, बल्कि आम जन की आवाज़ भी थे। सुमन मिश्र का सम्पादन इस बहुस्तरीय काव्य को सुलभ बनाता है।

यह किताब पाठक के भीतर भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से क्या छोड़ जाती है?

  • भक्ति और प्रेम की उस गहराई का अनुभव जो भाषा और सम्प्रदाय से परे है
  • भारतीय इस्लाम की उस काव्यात्मक विरासत की समझ जो लोक और शास्त्रीय दोनों परम्पराओं में जीवित है
  • वाराणसी की सांस्कृतिक बहुलता का साक्षात्कार—जहाँ सूफ़ी मज़ार, मन्दिर और घाट एक ही आध्यात्मिक परिदृश्य बनाते हैं
  • यह विश्वास कि शायरी सिर्फ़ कला नहीं, आत्मा की साधना भी हो सकती है

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