Arambh Hai Prachand
Author:
Piyush MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
<span lang="HI">हिन्दी</span><span lang="HI"> </span><span lang="HI">फ़िल्मों के गाने अब हिन्दी कविता और उर्दू शायरी का विस्तार</span><span lang="HI">-</span><span lang="HI">भर नहीं रह गए</span>, <span lang="HI">अब वे अपने आप में एक</span><span lang="HI"> </span><span lang="HI">स्वतंत्र विधा हैं</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> उनके लिखने का ढंग अलग है</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> वे अपनी बात भी अलग ढंग से कहते हैं</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> उनकी बिम्बों की योजना</span>, <span lang="HI">शब्दों का चयन और संगीत के साथ उनकी हमक़दमी उन्हें पढ़ी जानेवाली कविता से अलग बनाती है</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> इसलिए उनको पाठ में देखना भी उन्हें जैसे नए सिरे से जानना होता है</span><span lang="HI">।</span></p>
<p><span lang="HI">और ये पीयूष मिश्रा के गाने हैं</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> पीयूष मिश्रा जो अभिनेता हैं</span>, <span lang="HI">संगीतकार हैं</span>, <span lang="HI">और थियेटर के एक बड़े नाम ही नहीं</span>, <span lang="HI">एक मुहावरा रहे हैं</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> ये गाने उन्होंने या तो फ़िल्मों के लिए ही लिखे या अपने लिए लिखे और फ़िल्मों ने उन्हें ले लिया</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> पीयूष मिश्रा की बिम्ब</span><span lang="HI">-</span><span lang="HI">चेतना का विस्तार बहुत व्यापक है</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> वे समाज से</span>, <span lang="HI">देश</span><span lang="HI">-</span><span lang="HI">विदेश की राजनीति से</span>, <span lang="HI">व्यक्ति और समाज के आपसी द्वन्द्व से विचलित रहते हैं</span>, <span lang="HI">उन पर सोचते हैं</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> और इसलिए जब वे किसी दिए गए फ़िल्म</span><span lang="HI">-</span><span lang="HI">दृश्य को अपने गीत की लय में विजुअलाइज करते हैं तो उनकी कल्पना उसकी सीमाओं को लाँघकर दूर</span><span lang="HI">-</span><span lang="HI">दूर तक जाती है</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> वे सामने मौजूद पात्रों के परिवेश को व्यापक सामाजिक</span><span lang="HI">-</span><span lang="HI">राजनीतिक सन्दर्भों में रूपायित करते हैं और पर्दे पर मौजूद दृश्य की साक्षी आँखों को सोचने का एक बड़ा परिदृश्य देते हैं</span><span lang="HI">।</span><span lang="HI"> पीयूष मिश्रा के गीत चरित्रों के संवाद नहीं होते</span>, <span lang="HI">उनकी नियति की व्याख्या होते हैं</span><span lang="HI">। ‘</span><span lang="HI">गैंग्स ऑफ़ वासेपुर</span><span lang="HI">’ </span><span lang="HI">और </span><span lang="HI">‘</span><span lang="HI">गुलाल</span><span lang="HI">’</span><span lang="HI"> जैसी फ़िल्मों के गाने हिन्दी</span><span lang="HI"> </span><span lang="HI">फ़िल्म गीतों के इतिहास का एक अलग अध्याय हैं</span><span lang="HI">।</span>
ISBN: 9789387462908
Pages: 96
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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सुर्ख खंजर लिये पीछे है हुजूमे-कातिल
शहरे-जाना से मगर होते भी रुखसत न बनें
क्योंकि ये शहरे-जाना है, परमात्मा का नगर है ये जगत। हमें इसमें जीना है और आनन्दपूर्ण जीना है। ये ग़जलें सुख-दुख के दो किनारों से आगे नये जश्न के सफ़र की तरफ़ ले जा रहीं हैं और उत्सव में जीने का मंगल सन्देश हैं।
Tumhein Pyar Karte Hue : Prem Kavitayen
- Author Name:
Pawan Karan
- Book Type:

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Description:
घृणाजीवी राजनीति और घृणापोषित सामाजिकता के इस दौर में प्रेम! प्रेम के विरुद्ध गँड़ासे और तलवारें लिए खड़ी खाप पंचायतों, लव जेहाद कहकर प्रेम को कहीं भी कटघरे में खड़ा कर देनेवाली राजनीति और प्रेमियों के पीछे दौड़ते एंटी-रोमियो स्क्वैड्स के इस दौर में प्रेम! कहने की ज़रूरत नहीं कि प्रेम और मनुष्य पर फबनेवाली अन्य सकारात्मक गतिविधियों के लिए यह दौर अत्यन्त निराशाजनक है।
लेकिन प्रेम फिर भी होता है। यह जीवन की उन साँसों में एक है जो कितनी भी ठोस शिलाओं के बीच से अपनी प्राणवायु खींच लेती हैं। वह है और रहेगा।
पवन करण की प्रेम कविताओं का यह संग्रह इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई के इन वर्षों की घनी होती घुटन के बीच एक ताजा साँस की तरह आया है। हिन्दी के मौजूदा कविता-बहुल समय में बहुत कम ही ऐसे चित्र मिलते हैं जिनसे कोई बिम्ब हमारे मन में सजीव साकार हो जाता हो।
ये कविताएँ अपनी मांसलता और अपनी ऐन्द्रिय अभिव्यक्ति के चलते प्रेम तथा साहचर्य के ऐसे अनेक चित्र हमें देती हैं जो कल्पना और सृजनात्मकता से वंचित किए जा रहे हमारे समूह-मन के लिए राहत लेकर आते हैं। ये कविताएँ प्रेम के पक्ष में, प्रेम करने की प्रेरणा के तौर पर नहीं, प्रेम को जीने के लिए पढ़ी जानी चाहिए। इन्हें पढ़ते हुए आप अचानक अपने उस वर्तमान के प्रति क्षोभ से व्याकुल भी हो सकते हैं जिसकी हर कोशिश प्रेम के ख़िलाफ़ जा रही है।
Aalap Mein Girah
- Author Name:
Geet Chaturvedi
- Book Type:

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Description:
अपनी प्रतिबद्ध विवेकशील विश्वचेतना में रघुवीर सहाय के बाद की समर्थ हिन्दी कविता समसामयिक, प्रतिभावान युवा कवियों द्वारा इस कदर समृद्ध और अग्रेषित की जा रही है कि अपने पाठक, आस्वादक, समीक्षक और विश्लेषक के सामने अपूर्व, कभी-कभी तरद्दुद और सांसत में डाल देनेवाली, किन्तु शायद हमेशा रोमांचक चुनौतियाँ खड़ी करती जाती है।
गीत चतुर्वेदी की ये कविताएँ राष्ट्र ओर व्यक्ति-दशा ('स्टेट ऑफ़ द नेशन एंड द इंडीविजुअल') की कविताएँ हैं।
उनकी काव्य-निर्मित और शिल्प की एक सिफ़त यह भी है कि वे 'यथार्थ' और 'कल्पित', ठोस और अमूर्त, संगत से विसंगत, रोज़मर्रा से उदात की बहुआयामी यात्रा एक ही कविता में उपलब्ध कर लेते हैं।
इतिहास से गुज़रने का उनका तरीक़ा कुछ-कुछ चार्ली चैप्लिन-सा है और कुछ काल-यात्री (टाइम ट्रैवलर) सरीखा है...
भारतीय समाज के लुच्चाकरण और अमानवीयता पर जो बहुत कम हिन्दी कवि नज़र रखे हुए हैं, गीत चतुर्वेदी उनमें भी एक निर्भीक यथार्थवादी हैं।
—विष्णु खरे
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