Mahiyasi Mahadevi
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पाण्डेय जी की इस कृति का महत्त्व मैं कई दृष्टियों से मानता हूँ। महादेवी साहित्य के सम्बन्ध में हिन्दी–पाठकों की रुचि अब पहले से कई गुना अधिक बढ़ चुकी है, पर उसके कुतूहल के उपशय की सामग्री हिन्दी में अभी प्राय: नहीं के बराबर पाई जाती है। महादेवी के काव्य और गीत साहित्य की व्याख्या अभी तक यदि किसी ने ढंग से की है तो वह केवल पाण्डेय जी ने ही। महादेवी जी की एक–एक कविता, एक–एक गीत केवल अपने–आप में अनमोल मोती नहीं है, वरन् वह एक–एक मोती अपने–आप में अनेक अनमोल मोतियों को छिपाए हैं। और उनमें से प्रत्येक मोती को मोती बनने में जिन अपार साधनाओं और बाधाओं का सामना करना पड़ा है, उनकी व्याख्या किसी भी हालत में सहज–साधारण नहीं है। किसी भी सीप की मोती बनने की प्रक्रिया साधारण नहीं होती, फिर महादेवी मानस के मोती तो साहित्य–संसार में दुर्लभतम और अमूल्य निधि हैं। उनकी प्रक्रिया और भी जटिल है कि उनके लिए केवल स्वाति–नक्षत्र की ही आवश्यकता नहीं है, वरन् स्वाति–नक्षत्र के भी कुछ विशिष्ट ही दुर्लभ क्षणों या सुदुर्लभ संयोग की अत्यन्त आवश्यकता है और वह एक–एक क्षण भी अपने भीतर अन्तर्जीवन की किन रहस्यानुभूतियों का अधियोग सँजोए है, इसका ठीक–ठीक हिसाब लगा सकना आज किसी विद्वत्तम साहित्यालोचकों के लिए भी सहज–सम्भव नहीं रह गया है। इसके लिए चाहिए अन्तरतम की निगूढ़तम अनुभूति और सहज तादात्म्य, जो केवल पाण्डेय जी जैसे आलोचकों में ही सम्भव पाया जा सकता है। अतएव इस ग्रन्थ के भावी समीक्षकों से मेरा नम्र निवेदन है कि यदि वे समीक्षा के पूर्व उपरोक्त सभी तथ्यों पर विशेष ध्यान दिए बिना समीक्षा करने बैठ जाएँगे तो कभी इस अमूल्य रचना के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे। महादेवी जी की रचनाओं को आज एक बिलकुल ही नई दृष्टि से देखने व परखने की आवश्यकता आ पड़ी है। महादेवी जी जैसी कवयित्री का कोई उदाहरण विश्व–साहित्य के इतिहास के किसी भी युग में, किसी भी देश में शायद ही पाया गया है। उनके समान मौलिक चिन्तनशीलता और अछूती कल्पना का कोई उदाहरण कहीं भी सहज–सुलभ नहीं है, केवल भावना के क्षेत्र में ही उन्होंने निराली रसमयता का प्लावन नहीं बहाया है, वरन् वैचारिकता और चिन्तन के क्षेत्र में भी उनके समान प्रौढ़ और आत्मविश्वास–परायण नारी का जोड़ मिलना कठिन है। यह उपलब्धि केवल एक ही जन्म की साधना द्वारा सम्भव नहीं है, इसके लिए युग–युग की सांस्कृतिक चेतना के जन्म–जन्मान्तरीण विकास की अनिवार्य आवश्यकता है। पाण्डेय जी ने इसी कारण ‘सांस्कृतिक पृष्ठभूमि’ नाम से एक अलग अध्याय अपने गहन अध्ययन के फलस्वरूप इस ग्रन्थ में दिया है, जिसकी बहुत बड़ी आवश्यकता थी, साथ ही ‘महादेवी काव्य की पृष्ठभूमि’ शीर्षक से एक दूसरे महत्त्वपूर्ण अध्याय में उन्होंने महादेवी जी के सांस्कृतिक चेतना के विकास पर अतिरिक्त प्रकाश डालने का स्तुत्य प्रयास किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि महादेवी साहित्य के अध्ययन के लिए जिस प्रकार की रचना के नितान्त अभाव का अनुभव पिछले कुछ दशकों में किया जा रहा था, उसकी पूर्ण पूर्ति इस ग्रन्थ द्वारा हो जाएगी। केवल इसी युग के साहित्य–श्रद्धेताओं के लिए नहीं, आनेवाली पीढ़ियों के लिए भी। यह ग्रन्थ वास्तव में पाण्डेय जी की महत्त्वाकांक्षा के अनुरूप ही तैयार हुआ है और हिन्दी आलोचना–क्षेत्र में यह निश्चय ही एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करके रहेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। —इलाचन्द्र जोशी
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पाण्डेय जी की इस कृति का महत्त्व मैं कई दृष्टियों से मानता हूँ। महादेवी साहित्य के सम्बन्ध में हिन्दी–पाठकों की रुचि अब पहले से कई गुना अधिक बढ़ चुकी है, पर उसके कुतूहल के उपशय की सामग्री हिन्दी में अभी प्राय: नहीं के बराबर पाई जाती है। महादेवी के काव्य और गीत साहित्य की व्याख्या अभी तक यदि किसी ने ढंग से की है तो वह केवल पाण्डेय जी ने ही। महादेवी जी की एक–एक कविता, एक–एक गीत केवल अपने–आप में अनमोल मोती नहीं है, वरन् वह एक–एक मोती अपने–आप में अनेक अनमोल मोतियों को छिपाए हैं। और उनमें से प्रत्येक मोती को मोती बनने में जिन अपार साधनाओं और बाधाओं का सामना करना पड़ा है, उनकी व्याख्या किसी भी हालत में सहज–साधारण नहीं है। किसी भी सीप की मोती बनने की प्रक्रिया साधारण नहीं होती, फिर महादेवी मानस के मोती तो साहित्य–संसार में दुर्लभतम और अमूल्य निधि हैं। उनकी प्रक्रिया और भी जटिल है कि उनके लिए केवल स्वाति–नक्षत्र की ही आवश्यकता नहीं है, वरन् स्वाति–नक्षत्र के भी कुछ विशिष्ट ही दुर्लभ क्षणों या सुदुर्लभ संयोग की अत्यन्त आवश्यकता है और वह एक–एक क्षण भी अपने भीतर अन्तर्जीवन की किन रहस्यानुभूतियों का अधियोग सँजोए है, इसका ठीक–ठीक हिसाब लगा सकना आज किसी विद्वत्तम साहित्यालोचकों के लिए भी सहज–सम्भव नहीं रह गया है। इसके लिए चाहिए अन्तरतम की निगूढ़तम अनुभूति और सहज तादात्म्य, जो केवल पाण्डेय जी जैसे आलोचकों में ही सम्भव पाया जा सकता है। अतएव इस ग्रन्थ के भावी समीक्षकों से मेरा नम्र निवेदन है कि यदि वे समीक्षा के पूर्व उपरोक्त सभी तथ्यों पर विशेष ध्यान दिए बिना समीक्षा करने बैठ जाएँगे तो कभी इस अमूल्य रचना के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे।
महादेवी जी की रचनाओं को आज एक बिलकुल ही नई दृष्टि से देखने व परखने की आवश्यकता आ पड़ी है। महादेवी जी जैसी कवयित्री का कोई उदाहरण विश्व–साहित्य के इतिहास के किसी भी युग में, किसी भी देश में शायद ही पाया गया है। उनके समान मौलिक चिन्तनशीलता और अछूती कल्पना का कोई उदाहरण कहीं भी सहज–सुलभ नहीं है, केवल भावना के क्षेत्र में ही उन्होंने निराली रसमयता का प्लावन नहीं बहाया है, वरन् वैचारिकता और चिन्तन के क्षेत्र में भी उनके समान प्रौढ़ और आत्मविश्वास–परायण नारी का जोड़ मिलना कठिन है। यह उपलब्धि केवल एक ही जन्म की साधना द्वारा सम्भव नहीं है, इसके लिए युग–युग की सांस्कृतिक चेतना के जन्म–जन्मान्तरीण विकास की अनिवार्य आवश्यकता है। पाण्डेय जी ने इसी कारण ‘सांस्कृतिक पृष्ठभूमि’ नाम से एक अलग अध्याय अपने गहन अध्ययन के फलस्वरूप इस ग्रन्थ में दिया है, जिसकी बहुत बड़ी आवश्यकता थी, साथ ही ‘महादेवी काव्य की पृष्ठभूमि’ शीर्षक से एक दूसरे महत्त्वपूर्ण अध्याय में उन्होंने महादेवी जी के सांस्कृतिक चेतना के विकास पर अतिरिक्त प्रकाश डालने का स्तुत्य प्रयास किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि महादेवी साहित्य के अध्ययन के लिए जिस प्रकार की रचना के नितान्त अभाव का अनुभव पिछले कुछ दशकों में किया जा रहा था, उसकी पूर्ण पूर्ति इस ग्रन्थ द्वारा हो जाएगी। केवल इसी युग के साहित्य–श्रद्धेताओं के लिए नहीं, आनेवाली पीढ़ियों के लिए भी।
यह ग्रन्थ वास्तव में पाण्डेय जी की महत्त्वाकांक्षा के अनुरूप ही तैयार हुआ है और हिन्दी आलोचना–क्षेत्र में यह निश्चय ही एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करके रहेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
—इलाचन्द्र जोशी
Book Details
-
ISBN9788180312533
-
Pages352
-
Avg Reading Time12 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘मेघदूत’ एक कालजयी कृति ही नहीं प्रेम, प्रकृति और निसर्ग के प्रति कालिदास की अनन्य प्रपत्ति भी है। अपने विशिष्ट स्वर, स्वरूप और न्यास में यह काव्य एक अप्रतिम एवं इन्द्रधनुषी भाव-वितान है, जिसमें कृतिकार की अपूर्व परिकल्पना, मौलिक उद्भावना तथा बिम्बों और वर्णों की जीवन्त छवियाँ सहज ही देखी जा सकती हैं। कालिदास ने अपनी यशस्वी कृति ‘मेघदूत’ के द्वारा जिस रूपक-राज्य का निर्माण किया था—पिछली दो सहस्राब्दियों से उसका निरन्तर विकास और विस्तार होता रहा है। विरही यक्ष के मनोजगत में विद्यमान एक आर्तप्रेमी के प्रणयोत्सुक प्रार्थी भाव को अनुषंग बनाकर—अपनी प्राण-प्रियतमा को भेजे जानेवाले विरहातुर सन्देश को कई रचनाकारों, भाष्यकारों और रूपान्तरकारों और चित्रकारों ने अपने-अपने ढंग से, अलग-अलग शैलियों में निरूपित किया है। प्रसंगानुरूप और प्रसंगान्तर परिदृश्य को अपने विरहकातर निवेदन से मुखर करनेवाली इस कालातीत रचना का अनुगायन और अनुकीर्तन न केवल सदियों से होता रहा है, बल्कि आधुनिक और समकालीन पीढ़ियाँ भी इसमें अपनी रचनात्मक भावांजलि लिए खड़ी रही हैं। अपनी सर्जनात्मक समग्रता के नाते और ‘क्लासिकी’ के गुणों से समृद्ध एवं समादृत ‘मेघदूत’ ने काव्य और काव्येतर माध्मयों के द्वारा सहृदय पाठकों, प्रेक्षकों, गायकों और समीक्षकों की क्षमता और आकांक्षाओं के अनुरूप सुदीर्घ रचना-प्रकिया एवं परम्परा को जीवित रखा है। इसी अनुक्रम में हिन्दी के सुपरिचित विद्वान, आलोचक, कवि एवं रचनाकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने ‘मेघदूत’ के मार्मिक प्रसंगों, अछूते अनुषंगों—और सबसे बढ़कर—रचनाकार की विराट मनोभूमि का स्पर्श एवं अनुभावन अपनी विदग्ध रचना मनीषा के द्वारा किया है। ‘मेघदूत : एक अन्तर्यात्रा’ पुस्तक प्रेमी और प्रकृति के शाश्वत एवं चिरन्तन आधान को सुललित और सर्जनात्मक आयाम प्रदान करेगी—इसमें सन्देह नहीं।
Agnileek Kee Aginkatha
- Author Name:
Prakash Devkulish
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हृषीकेश सुलभ ने लगभग 1975 से लेखन शुरू किया। उनके लगभग 40 वर्षों के परिश्रम, अनुभव, आस-पास की सामाजिक उथल-पुथल पर पैनी दृष्टि और उससे जुड़ा रचनाकार का दायित्वबोध आदि के बाद उपन्यास ‘अग्निलीक’ आया। आलोचक रचनाकार की उस मनःस्थिति की पड़ताल कर पाया है या करता है, जिसने इस रचना को जन्म दिया और जो पूरी रचना- प्रक्रिया में साथ चला या अपनी टिप्पणी रखते समय समीक्षक/आलोचक भी अपनी मनःस्थिति और मान्यताओं की कसौटी से निर्देशित हो जाता है? यह प्रश्न इसलिए कि इन समीक्षाओं के संकलन में एक ही शिल्प, शैली, ट्रीटमेंट, घटनाओं की प्रस्तुति, उनके विस्तार और उनके स्वरूप पर अलग-अलग और कभी-कभी परस्पर विरोधी राय/ऑब्ज़र्वेशन देखने को मिले हैं। यह संकलन, इसलिए, रचनाकार को आलोचकों की चिन्ता और समय-समय पर व्यक्त उनके निदेशों के सम्मान के बाद भी अपनी तपस्या, अपने अनुभव और स्वतःस्फूर्त पर सजग चेतना पर चलने का स्वर देता है। ये आलेख ‘अग्निलीक’ उपन्यास को समझने और व्याख्यायित करने में सहायक तो हैं ही, उपन्यास ने ग्रामीण सामाजिक संरचना में होते जिन परिवर्तनों और उसके साथ-साथ स्थापित जिन वैचारिक जड़ताओं को कथा-सूत्र में पिरोया है, ये उसे और आगे ले जाते हैं। इसलिए इनका अध्ययन आवश्यक है। स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-पश्चात गाँवों की विडम्बनाओं को इन समीक्षकों, आलोचकों ने इस उपन्यास के बहाने गम्भीरता से देखा-परखा और अभिव्यक्त किया है। इन आलेखों को समग्रता में देखना साहित्यिक उद्देश्य की पूर्ति करता है, यही कारण है कि इन्हें एक साथ रखकर प्रस्तुत करने की यह कोशिश की गई है। किसी रचना पर टिप्पणी सिर्फ़ उस रचना का भला या बुरा नहीं करती, यह उस विधा की समझ को भी विस्तार देती है। समीक्षाओं का यह संकलन इन्हीं उद्देश्यों से सामने रखा गया है।
Namvar Sanchayita
- Author Name:
Namvar Singh
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यह है हिन्दी के ख्यातिप्राप्त आलोचक डॉ. नामवर सिंह के आलोचनात्मक लेखन का उत्तमांश। नामवर जी हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचक के रूप में स्वीकृत हैं, लेकिन मूलत: वे एक लोकवादी आलोचक हैं। जिस ‘लोक’ को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने काव्य के प्रतिमान के रूप में व्यवहृत किया था और जिसे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने क्रान्तिकारी अर्थ प्रदान किया, उसे वे मार्क्सवाद की सहायता से ‘वर्ग’ तक ले गए हैं। लेकिन यह उनकी बहुत बड़ी विशेषता है कि उन्होंने मार्क्सवाद को विदेशी, संकीर्ण और रूढ़िबद्ध विचार प्रणाली के रूप में ग्रहण नहीं किया है। सच्चाई तो यह है कि साहित्य के नए मूल्य के लिए उन्होंने प्रत्येक मोड़ पर लोक की तरफ़ देखा है। अकारण नहीं कि हिन्दी में वे साहित्य की दूसरी परम्परा के अन्वेषक हैं, जो उस लोक की परम्परा है, जो असंगतियों और अन्तर्विरोधों का पुंज होते हुए भी विद्रोह की भावना से युक्त होता है। नामवर जी की आलोचना हिन्दी में ग़ैर-अकादमिक आलोचना का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। ‘कहानी : नई कहानी’ में उन्होंने व्यक्तिगत निबन्ध की शैली में आलोचना लिखी, जिसमें बात से बात निकलती चलती है और अत्यन्त सार्थक। ‘कविता के नए प्रतिमान’ उनके विलक्षण परम्परा–बोध, गहन विश्लेषण और पारदर्शी अभिव्यक्ति का स्मारक है। इसी तरह ‘दूसरी परम्परा की खोज’ में उन्होंने ऐसी आलोचना प्रस्तुत की है, जो एक तरफ़ अतिशय ज्ञानात्मक है और दूसरी तरफ़ अतिशय संवेदनात्मक। यह सर्जनात्मकता आचार्य द्विवेदी के साहित्य से उनके निजी लगाव के कारण सम्भव हुआ है। नामवर जी की पचहत्तरवीं वर्षगाँठ पर प्रकाशित यह संचयिता महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ओर से हिन्दी जगत् को दिया गया एक उपहार है, जो उसे पिछली शती के उत्तरार्ध के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी आलोचक के अवदान से परिचित कराएगा।
Nath Sampraday
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
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र्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ऐसे वांड़्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। नाथ सिद्धों और अपभ्रंश साहित्य पर उनके शोधपरक निबन्ध पढ़ते समय मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘नाथ सम्प्रदाय’ में गुरु गोरखनाथ के लोक-संपृक्त स्वरूप का उद्घाटन किया गया है। स्वयं द्विवेदी जी के शब्दों में 'गोरखनाथ ने निर्मम हथौड़े की चोट से साधु और गृहस्थ दोनों की कुरीतियों को चूर्ण-विचूर्ण कर दिया। लोकजीवन में जो धार्मिक चेतना पूर्ववर्ती सिद्धों से आकर उसके पारमार्थिक उद्देश्य से विमुख हो रही थी, उसे गोरखनाथ ने नई प्राणशक्ति से अनुप्राणित किय
Aurat Ki Duniya
- Author Name:
Nasera Sharma
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औरतों, अल्पसंख्यकों और देश-दुनिया के दमित-उत्पीड़ितों के पक्ष में हमेशा अपनी आवाज़ बुलन्द रखनेवाली कथाकार नासिरा शर्मा ने अपने सरोकारों और चिन्ताओं को अपनी कहानियों, उपन्यासों, निबन्धों और साक्षात्कारों में लगातार स्वर दिया है। यह उनके स्तम्भों का संकलन है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर लिखे। स्त्री और उसकी सामाजिक-पारिवारिक स्थिति तो उनके चिन्तन में प्राथमिक रही ही है, पर्यावरण, साम्प्रदायिक सौहार्द, नए पुरुष और स्त्री के आपसी सम्बन्ध, पारिवारिक रिश्ते और हमारे आसपास का तेज़ी से बदलता हुआ परिवेश भी उनकी संवेदना के दायरे में रहा है। इस पुस्तक में संकलित स्तम्भ-लेखन में उन्होंने सम-सामयिक घटनाओं के हवाले से अनेक उन समस्याओं पर अपनी क़लम चलाई है जो समाज और इनसान के वर्तमान और भविष्य से, उसकी नियति से गहरे जुड़े हैं। उल्लेखनीय यह कि वे जो देखती हैं, जो लिखती हैं, उसमें अपनी स्त्री-दृष्टि को पहले रखती हैं। स्त्री, जिसका न सिर्फ़ दुनिया को देखने का तरीक़ा अलग है, बल्कि उसे बरतने और समझने का सलीका भी पुरुष के मुक़ाबले ज़्यादा मानवीय और करुणार्द्र है। इन आलेखों में उनकी यह विस्तृत और संवेदनशील दृष्टि साफ़ दिखाई देती है।
Baton Mein Beete Din
- Author Name:
Namvar Singh
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‘बातों में बीते दिन’ पुस्तक नामवर सिंह के साक्षात्कारों का संकलन है। इस किताब में शामिल साक्षात्कारों का विषय क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। पेरेस्त्रोइका-ग्लासनोस्त और आधुनिकतावाद से लेकर कविता, कहानी, उपन्यास और निजी जीवन तक। साहित्य और देश-दुनिया की नामवर जी की समझ का एक स्पष्ट प्रतिबिम्ब यहाँ मिलता है। उनकी विश्व-दृष्टि का रूपायन इन साक्षात्कारों में हुआ है। पुस्तक तीन खंडों में बँटी हुई है। मध्यम आकार के और विषय केन्द्रित साक्षात्कार पहले खंड में हैं। दूसरे खंड में रचनाकारों और रचनाओं पर केन्द्रित बातचीत है। प्रेमचन्द, सुमित्रानन्दन पंत, त्रिलोचन और अमृतराय तथा सुमित्रानन्दन पंत की कृति ‘गुंजन’ और कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’—इन साक्षात्कारों के केन्द्र में है। तीसरे खंड में महावीर अग्रवाल द्वारा लिये गए नौ साक्षात्कार हैं जो उनके निजी जीवन से लेकर आलोचना और विविध विषयों से सम्बन्धित हैं। आलोचना लिखित हो या वाचिक—उसके पीछे बुनियादी प्रक्रिया है—पढ़ना, विवेचना, विचारना। तर्क और संवाद। नामवर जी के इन साक्षात्कारों में इसका व्यापक समावेश है। इनसे गुजरते हुए हम महसूस करते हैं कि वह किसी रचना को हमेशा नई और अपनी तरह से पढ़ने की कोशिश करते हैं और इस तरह ‘पढ़ते’ हुए वे लगातार नई तरह से ‘सोचते’ और ‘विचारते’ हुए सामने आते हैं। उनकी वाचिक आलोचना मूल्यांकन की ऊपरी सीढ़ी तक पहुँचती है। निकष बनाती है। प्रतिमानों पर बहस करती है। उसमें ‘लिखित’ की तरह की ‘कौंध’ मौजूद होती है। नहीं होता तो बस पूरापन।
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