Bharat-Afghanistan Sambandh
(0)
Author:
Shri Saroj Kumar RathPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
800
₹ 640 (20% off)
Available
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प्राचीन साहित्य पर आधारित लेखों से प्रेरणा लेते हुए तथा अबतक अज्ञात अभिलेखीय दस्तावेजों पर निर्भर करते हुए इस पुस्तक के शोधकार्य में अधुनातन शोध-शैली को अपनाया गया है और भारत-अफगानिस्तान संबंध पर अकाट्य स्पष्टीकरण एवं सुस्पष्ट निष्कर्ष प्रदान करने का प्रयास किया गया है। बहुमूल्य यूनानी और चीनी स्रोतों का उपयोग करते हुए इस पुस्तक में प्राचीन अफगानिस्तान के भारत से जुड़े दिलचस्प संबंधों को उजागर किया गया है, जिनका संस्कृत-साक्ष्यों के प्रकाश में भी परीक्षण किया गया है। दोनों देशों की दिलचस्प तथा अब तक बहुत कम ज्ञात बातों का ब्योरा इस शोध पुस्तक में है। यूनानी और भारतीय साहित्य इस रोचक तथ्य का समर्थन करता है कि भारत और अफगानिस्तान आधुनिक सीमाओं के सीमांकन से पहले सहस्लाब्दियों तक लगभग सबकुछ साझा करते थे। यह पुस्तक भारत, अफगानिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन में उपलब्ध अभिलेखीय आलेखों के आधार पर भारत-अफगान द्विपक्षीय संबंधों की विवेचना करती है। इस अध्ययन में भारत की अफगान नीति के विकास की प्रयोगसिद्ध अकादमिक व्याख्या देने का प्रयास किया गया है| इसमें इस सवाल की भी पड़ताल की गई है कि किस तरह से तालिबान द्वारा दो बार तख्तापलट और जबरन शासन अवधि के बाहर, बड़ी शक्तियों और पड़ोसी देशों के साथ अफगानिस्तान के बहुपक्षीय संबंधों का भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।
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प्राचीन साहित्य पर आधारित लेखों से प्रेरणा लेते हुए तथा अबतक अज्ञात अभिलेखीय दस्तावेजों पर निर्भर करते हुए इस पुस्तक के शोधकार्य में अधुनातन शोध-शैली को अपनाया गया है और भारत-अफगानिस्तान संबंध पर अकाट्य स्पष्टीकरण एवं सुस्पष्ट निष्कर्ष प्रदान करने का प्रयास किया गया है। बहुमूल्य यूनानी और चीनी स्रोतों का उपयोग करते हुए इस पुस्तक में प्राचीन अफगानिस्तान के भारत से जुड़े दिलचस्प संबंधों को उजागर किया गया है, जिनका संस्कृत-साक्ष्यों के प्रकाश में भी परीक्षण किया गया है।
दोनों देशों की दिलचस्प तथा अब तक बहुत कम ज्ञात बातों का ब्योरा इस शोध पुस्तक में है। यूनानी और भारतीय साहित्य इस रोचक तथ्य का समर्थन करता है कि भारत और अफगानिस्तान आधुनिक सीमाओं के सीमांकन से पहले सहस्लाब्दियों तक लगभग सबकुछ साझा करते थे।
यह पुस्तक भारत, अफगानिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन में उपलब्ध अभिलेखीय आलेखों के आधार पर भारत-अफगान द्विपक्षीय संबंधों की विवेचना करती है। इस अध्ययन में भारत की अफगान नीति के विकास की प्रयोगसिद्ध अकादमिक व्याख्या देने का प्रयास किया गया है| इसमें इस सवाल की भी पड़ताल की गई है कि किस तरह से तालिबान द्वारा दो बार तख्तापलट और जबरन शासन अवधि के बाहर, बड़ी शक्तियों और पड़ोसी देशों के साथ अफगानिस्तान के बहुपक्षीय संबंधों का भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।
Book Details
-
ISBN9789394534674
-
Pages284
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारत की प्राकृतिक सम्पदा, ज्ञान-विज्ञान, कला एवं शिल्प ने हज़ारों वर्षों से विदेशियों को आकर्षित किया है। यहाँ की वाणिज्यिक एवं सांस्कृतिक परम्परा के कारण यहाँ पर अरबी, बैक्ट्रियन, चीनी, डच, अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, यूनानी, हिब्रू, लैटिन, फ़ारसी, पुर्तगाली, तुर्की तथा अन्य भाषाएँ बोली एवं सुनी गईं। संस्कृत आम लोगों की भाषा भले ही न रही हो, परन्तु इसका इस उपमहाद्वीप की हज़ारों भाषाओं के साथ शाब्दिक आदान-प्रदान रहा है। कालक्रम से ये सभी भाषाएँ एक समय में लोकप्रियता एवं सत्ता के शिखर तक पहुँचीं और फिर किसी अन्य भाषा के लिए स्थान ख़ाली कर हट गईं। इस प्रक्रिया में इन भाषाओं का अनेक देशज भाषाओं के साथ सम्पर्क हुआ तथा शब्दों एवं अभिव्यक्तियों का आदान-प्रदान हुआ। समय-समय पर नई भाषाओं का जन्म तथा पुरानी भाषाओं का लोप भी हुआ। प्रस्तुत पुस्तक भारत में भाषाओं के इसी उद्भव-विकास, लोप एवं अवशेष की लम्बी शृंखला की कहानी कहती है।
TREASURE TROVE OF INDIAN KNOWLEDGE
- Author Name:
Shri Prashant Pole
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It is well known that the powers that enslaved India tried to systematically erase our history, which revealed our past glory as they wanted to deprive our nation of enjoying pride in its achievements. Considering it our duty to emerge from the illusionary history written by them, this book highlights the glorious and grand achievements of our ancestors. This collection of India’s achievements in the past by Prashant Pole is based on actual facts. Written lucidly this highly readable book is the Treasure Trove of Indian Knowledge.
Chandrashekhar Ke Bare Mein
- Author Name:
Harivansh
- Book Type:

- Description:
‘चन्द्रशेखर के बारे में’ पुस्तक अपने समय के महत्त्वपूर्ण लेखकों-पत्रकारों, राजनीतिज्ञों और समाज-विज्ञानियों द्वारा किए गए आत्मीय और तटस्थ विश्लेषणों का एक संकलन है। यह संकलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह चन्द्रशेखर की राजनीतिक और रचनात्मक यात्रा के विभिन्न पड़ावों का एक विश्वसनीय लेखा-जोखा है। इन लेखों को पढ़ते हुए आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का संक्षिप्त सफरनामा और उसमें चन्द्रशेखर के जरूरी योगदान से हमारा परिचय होता जाता है।
संकलित आलेखों के क्रम में भले ही हमें कथासूत्र की तरह का कोई संयोजन नहीं मिलता है, मगर यही इस संकलन की खासियत भी है। हम कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति के विविध-रंगी चित्रों और उसमें चन्द्रशेखर के राजनीतिक, सामाजिक व रचनात्मक सरोकारों का एक कोलाज है यह संकलन–और इसलिए इसकी सिर्फ राजनीतिक और सामयिक ही नहीं, रचनात्मक और साहित्यिक महत्ता भी है।
नामवर सिंह, भोला चटर्जी, प्रभाष जोशी, केदारनाथ सिंह, उदयन शर्मा, तवलीन सिंह और एम.जे. अकबर सहित अनेक सुविख्यात कलमकारों ने चन्द्रशेखर के बारे में समय-समय पर लिखा। गांधी और जयप्रकाश नारायण के बाद शायद चन्द्रशेखर ही ऐसे राजनेता हैं, जिनके बारे में सभी धाराओं के अग्रणी लोगों ने सृजनात्मक राय रखी। युवा तुर्क की हैसियत के जमाने में और इमर्जेंसी के बाद चन्द्रशेखर के बारे में काफी कुछ लिखा गया। यह पुस्तक इस लेखन का एक प्रतिनिधि संकलन है।
Uttar Pradesh Ka Swatantrata Sangram : Shravasti
- Author Name:
Pawan Bakshi
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श्रावस्ती कोसल का प्रमुख नगर था। इसे बुद्धकालीन भारत के छह महानगरों—चंपा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत, कोशांबी और वाराणसी में से एक माना जाता था।
आज से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व यह क्षेत्र अत्यंत वनाच्छादित था जिसके चलते स्वतंत्रता आंदोलन में श्रावस्ती एक प्रमुख पड़ाव हुआ करता था और आंदोलनकारियों के लिए विशेष रूप से सुरक्षित माना जाता था। इस कारण और यहाँ के सामान्य जन की स्वातंत्र्य-चेतना के कारण आजादी के आंदोलन में इसकी महती भूमिका रही। 1857 में अंग्रेजों को बहराइच में कड़ा विरोध झेलना पड़ा। यहाँ के सभी छोटे ताल्लुकेदार खुलकर उनके विरुद्ध खड़े हो गए थे। इकौना रियासत का योगदान इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में दर्ज है। वीरांगना रानी ईश्वरी देवी का संघर्ष भी एक उल्लेखनीय घटना थी।
इस पुस्तक में स्वतंत्रता आंदोलन में श्रावस्ती जिले की भूमिका को तथ्यों के साथ स्पष्ट किया गया है। साथ ही यहाँ के भौगोलिक व सांस्कृतिक महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है।
Kisan Aandolan : Dasha Aur Disha
- Author Name:
Kishan Patnayak
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किशन पटनायक की यह पुस्तक भारत के किसान आन्दोलन का उसके सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक और कुछ हद तक सांस्कृतिक आयामों में गहराई से विश्लेषण और मूल्यांकन प्रस्तुत करती
है।लेखक की प्रतिष्ठा एक ऐसे समाजवादी चिन्तक और नेता के रूप में है जिसने उदारीकरण-ग्लोबीकरण यानी पूँजीवादी साम्राज्यवाद की सुचिन्तित समीक्षा तथा सतत विरोध किया है। इस पुस्तक में भी किसान आन्दोलन का विश्लेषण मुख्यतः उदारीकरण-ग्लोबीकरण की नीतियों के सन्दर्भ में किया गया है, जिनके चलते भारत की खेती-किसानी तबाही के कगार पर पहुँच गई है और लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसान जीवन पर आए इस अभूतपूर्व संकट के दौर में लेखक ने साम्राज्यवादी पूँजीवाद का प्रतिकार करने के लिए देश में एक स्वतंत्र किसान राजनीति के निर्माण, विकास और संगठन की ज़रूरत पर बल दिया है। किसान राजनीति के अभ्युदय के लिए ज़रूरी वैकल्पिक विचारधारा के सूत्र और संघर्ष के तरीके भी सुझाए हैं।
पुस्तक की यह महत्त्वपूर्ण विशेषता है कि इसमें समाजवादी क्रान्ति के सन्दर्भ में किसान वर्ग की क्रान्तिकारी भूमिका स्वीकार की गई है, जो परम्परागत मार्क्सवादी सिद्धान्त के विपरीत मान्यता है। लेखक का इस विषय का निरूपण पर्याप्त ताज़गी-भरा, प्रेरणाप्रद और प्रामाणिक है, जिससे अध्ययन और शोध की नई ज़मीन तैयार होगी। उदारीकरण-ग्लोबीकरण की सबसे ज़्यादा मार झेल रहे किसानों के पक्ष में जूझनेवाले किसान नेताओं, अन्य परिवर्तनकारी आन्दोलनकारियों और बुद्धिजीवियों के लिए यह एक ज़रूरी किताब है।
Kashmir : Itihas Aur Parampara
- Author Name:
Kumar Nirmalendu
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'नीलमत पुराण' में कहा गया है कि कश्मीर स्वाध्याय एवं ध्यान में मग्न रहनेवाले और निरन्तर यज्ञ करनेवालों की भूमि रही है। यह हिमालय-पर्वतमाला की गोद में बसा एक सुरम्य प्रदेश है। लेकिन अपनी दुर्गम भौगोलिकता के कारण यह बाह्य-जगत् की पहुँच से दूर रहा है।
प्राचीन काल में कश्मीर प्रदेश गन्धार जनपद के अन्तर्गत आता था। सातवीं शताब्दी ई. के प्रारम्भ में यहाँ नाग जाति के कर्कोटक राजवंश का उदय हुआ; जिसके संस्थापक दुर्लभवर्द्धन के समय से कश्मीर का व्यवस्थित इतिहास मिलता है। उनके पौत्र ललितादित्य ने गुप्तोत्तर काल में एक साम्राज्य खड़ा किया; और प्रसिद्ध मार्तण्ड-मन्दिर का निर्माण भी कराया।
1339 ई. तक कश्मीर एक स्वशासित हिन्दू राज्य था। परन्तु मध्यकालीन हिन्दू राजाओं की दुर्बलता और उनके सामन्तों के षड्यन्त्रों के कारण वहाँ का वातावरण अराजक हो गया, जिसका लाभ उठाते हुए 1339 ई. में शाहमीर नामक एक मुसलमान ने कश्मीर के सिंहासन पर कब्जा कर लिया।
कल्हण ने 'राजतरंगिणी' में ललितादित्य से कहलवाया है कि ''इस देश को सुशासित तथा प्रगतिशील बनाये रखने के लिए अन्तर्कलह से बचना आवश्यक है।'' इसके कारण कश्मीर ने भारी कीमत चुकाई है। 'नीलमत पुराण' साक्षी है कि महर्षि कश्यप के समय से ही कश्मीर के स्थानीय लोगों ने विस्थापन की गहरी पीड़ा को महसूस किया है और आधुनिक काल में कश्मीरी हिन्दुओं को विस्थापन ने जितने दर्द दिये हैं, वह तो अकथनीय है।
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