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कहिए कि हिन्दी सिनेमा का नया सुनहरा दौर शुरू हो चुका है। एक बिलकुल नई जगमगाती पीढ़ी समूचे परिदृश्य पर क़ब्ज़ा जमा चुकी है। उसने तमाम शक-शुब्हा नेस्तनाबूद कर अपनी फ़िल्मों में लोकप्रिय चरित्रों की ऐसी बुनियादें डाली हैं जिसने बीसवीं शताब्दी के तमाम प्रतिमानों की चूलें हिला दी हैं। स्थापित प्रतिमानों को ख़ारिज करने की जहमत उठाने में इसकी कोई रुचि नहीं है। वह उन प्रतिमानों को अपने दौर के साथ खड़ा करती है। और उनसे एक क़दम आगे जाकर। कई मायनों में सौ क़दम पीछे रहते हुए भी। वह जिसे प्रथम पुरुष कहा जाता है, कोई चालीस साल बाद अपनी किताबी ज़ुबान की चौहद्दी से बाहर निकला है। आज आशुतोष गोवारीकर, संजय लीला भंसाली, मधुर भंडारकर, राजकुमार हीरानी, करन जौहर और आदित्य चोपड़ा उन फ़िल्मकारों के नाम हैं जिनकी फ़िल्में सिर्फ़ सितारों के नाम से नहीं पहचानी जातीं। आज फिर परिदृश्य सुनहरे दौर की तरह ही भरा-पूरा है। इसमें कोई शक नहीं कि यह एक नए सुनहरे दौर की शुरुआत है। लेकिन बस शुरुआत।
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कहिए कि हिन्दी सिनेमा का नया सुनहरा दौर शुरू हो चुका है। एक बिलकुल नई जगमगाती पीढ़ी समूचे परिदृश्य पर क़ब्ज़ा जमा चुकी है।
उसने तमाम शक-शुब्हा नेस्तनाबूद कर अपनी फ़िल्मों में लोकप्रिय चरित्रों की ऐसी बुनियादें डाली हैं जिसने बीसवीं शताब्दी के तमाम प्रतिमानों की चूलें हिला दी हैं।
स्थापित प्रतिमानों को ख़ारिज करने की जहमत उठाने में इसकी कोई रुचि नहीं है।
वह उन प्रतिमानों को अपने दौर के साथ खड़ा करती है। और उनसे एक क़दम आगे जाकर। कई मायनों में सौ क़दम पीछे रहते हुए भी। वह जिसे प्रथम पुरुष कहा जाता है, कोई चालीस साल बाद अपनी किताबी ज़ुबान की चौहद्दी से बाहर निकला है। आज आशुतोष गोवारीकर, संजय लीला भंसाली, मधुर भंडारकर, राजकुमार हीरानी, करन जौहर और आदित्य चोपड़ा उन फ़िल्मकारों के नाम हैं जिनकी फ़िल्में सिर्फ़ सितारों के नाम से नहीं पहचानी जातीं।
आज फिर परिदृश्य सुनहरे दौर की तरह ही भरा-पूरा है। इसमें कोई शक नहीं कि यह
एक नए सुनहरे दौर की शुरुआत है।
लेकिन बस शुरुआत।
Book Details
-
ISBN9788126714032
-
Pages167
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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