Sancharam
(0)
Author:
S. Ramakrishnan, Jillella BalajiPublisher:
Sahitya AkademiLanguage:
TeluguCategory:
Literary-fiction₹
470
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తమిళ సమాజపు ఆనవాలుగా చెప్పబడే నాదస్వర కళకు సంబంధించిందే సంచారం నవల. చరిత్ర ద్వారా నల్లరేగడి నేలల బ్రతుకులనూ, వాటి వైచిత్రినీ వివరిస్తుంది ఈ నవల. ఇప్పటికీ కొనసాగుతున్న కుల వివక్షనూ, జానపద కళల పతనాన్నీ, నిర్భాగ్యులైన రైతుల ఆవేదననూ స్పృశిస్తూ వెళుతుంది సంచారం. నల్లరేగడి నేలల ఆత్మను సంగీతంగా రూపొందించి తమిళ నవలా ప్రపంచంలో నూతన ఒరవడిని సృష్టించారు ఎస్. రామకృష్ణన్.
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తమిళ సమాజపు ఆనవాలుగా చెప్పబడే నాదస్వర కళకు సంబంధించిందే సంచారం నవల. చరిత్ర ద్వారా నల్లరేగడి నేలల బ్రతుకులనూ, వాటి వైచిత్రినీ వివరిస్తుంది ఈ నవల. ఇప్పటికీ కొనసాగుతున్న కుల వివక్షనూ, జానపద కళల పతనాన్నీ, నిర్భాగ్యులైన రైతుల ఆవేదననూ స్పృశిస్తూ వెళుతుంది సంచారం. నల్లరేగడి నేలల ఆత్మను సంగీతంగా రూపొందించి తమిళ నవలా ప్రపంచంలో నూతన ఒరవడిని సృష్టించారు ఎస్. రామకృష్ణన్.
Book Details
-
ISBN9789355485564
-
Pages302
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIN
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‘शहर से दस किलोमीटर’ ही वह दुनिया बसती है जो शहरों की न कल्पना का हिस्सा है, न सपनों का। वह अपने दुखों, अपने सुखों, अपनी हरियाली और सूखों के साथ अपने आप में भरी-पूरी है।
वहाँ खेत है, ज़मीन है, कुछ बंजर, कुछ पठार, कुछ उपजाऊ और उनसे जूझते, उनकी वायु में साँसें भरते लोग हैं, उनकी गाएँ भैसें और कुत्ते हैं; और आपस में सबको जोड़नेवाली उनकी रिश्तेदारियाँ हैं, झगड़े हैं, शिकायते हैं, प्यार है!
शहर से सिर्फ़ दस किलोमीटर परे की यह दुनिया हमारी ‘शहरवाली सभ्यता’ से स्वतंत्र हमारे उस देश की दुनिया है जो विकास की अनेक धाराओं में अपने पैर जमाने की कोशिशों में डूबता-उतराता रहता है। इसी जद्दोजहद के कुछ चेहरे और उनकी कहानियाँ शहर के बीचोबीच भी अपने पहियों, अपने पंखों पर तैरती मिल जाती हैं। यह उपन्यास साइकिल के इश्क़ में डूबे एक जोड़ी पैरों की परिक्रमा के साथ खुलता है जो शहर के बीच से शुरू होती है और उसके दस किलोमीटर बाहर तक जाती है। यह शहर है भोपाल। पहाड़ी चढ़ाइयों और उतराइयों को सड़कों की संयत भाषा में व्याख्यायित करता शहर। सड़कों के किनारे अस्थायी टपरों में बसे लोग, तरह-तरह के कामों में लगे वे लोग जो शहरों में रहते हुए भी शहर से बाहर की अपनी पहचान को सँजोए रहते हैं। साइकिल सबका हाल-चाल दर्ज करती हुई घूमती रहती है। एक स्त्री की साइकिल, जिसका अपना एक इतिहास है, जो शहर की आपाधापी से दूर खेतों में, शहर के उन हिस्सों में बरबस निकल जाती है जहाँ शहर तो है लेकिन उसकी कोई ख़ूबी नहीं है। गाँवों की सरहदों का अतिक्रमण करता शहर यहाँ उन लोगों से बहुत बेरहम व्यवहार करता है जो गाँवों की साधनहीनता से भागकर शहर का हिस्सा होने आए हैं।
Mam Aranya
- Author Name:
Sudhakar Adeeb
- Book Type:

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Description:
वीरवर लक्ष्मण अपने चारों ओर विस्तीर्ण एवं अभ्यन्तर में घुमड़ते-गूँजते अरण्य से जूझते चौदह वर्ष देश निकाला पाए अपने अग्रज श्रीराम के साथ विचरते रहे। रामकथा तो इस धरती के कण-कण और पत्ते-पत्ते पर लिखी गई तथा बहुश्रुत है। परन्तु त्यागमूर्ति लक्ष्मण अधिकतर मौन-से चित्रित किए गए हैं। कुछेक स्थलों पर जब वह अपने सम्पूर्ण तेज के साथ मुखर होते हैं, तो उन्हें उनके मर्यादाप्रिय अग्रज श्रीराम शान्त करा देते हैं। ऐसा अनेक रामायणों में होता आया है।
विचारणीय यह है कि क्या सौमित्र-लक्ष्मण सम्पूर्ण रामकथा में सदैव मौन ही रहे होंगे? क्या उनका अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं रहा होगा? इतना तेजस्वी, इतना कर्मठ और शौर्यवान् योद्धा भला क्या इतना चुपचाप रह सकता है? फिर रामानुज लक्ष्मण का स्वयं का चिन्तन क्या रहा होगा? ये प्रश्न वर्षों तक मेरे मन में आकार लेते रहे। समाधान इस ‘मम अरण्य’ के रूप में उपस्थित हुआ है।...
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